ज्यादा मूल्यवान क्या हैं, जिंदगी या समय?

ज्यादा मुल्यवान क्या हैं, जिंदगी या समय? समय बचाने के चक्कर में यदि जिंदगी ही नहीं रही तो समय का क्या करेंगे? सोचिएगा जरुर...

ज्यादा मुल्यवान क्या हैं, जिंदगी या समय?
ज्यादा मूल्यवान क्या हैं, जिंदगी या समय? मुझे पूरा विश्वास हैं कि आप कहेंगे कि जिंदगी ज्यादा मूल्यवान हैं। जिंदगी रहीं तो ही समय का उपयोग कर पायेंगे! यदि जिंदगी ही नहीं बची तो समय का क्या करेंगे? लेकिन दोस्तों, कई बातों की तरह इस मामले में भी हमारी कथनी और करनी में फर्क हैं। वास्तविक जिंदगी में हम जिंदगी से ज्यादा समय को मूल्यवान समझते हैं। इसलिए ही तो समय बचाने के लिए जिंदगी दाँव पर लगा देते हैं! आप कहेंगे कि नहीं...ऐसा कैसे हो सकता हैं? हर किसी को अपनी जान, अपनी जिंदगी प्यारी होती हैं। चाहे इंसान हो या जानवर हर कोई जीना चाहता हैं। बड़े-बड़े अस्पतालों में दर्द से कराहते लोग भी जीना चाहते हैं। हम ज्यादा से ज्यादा समय तक जिंदा रहना चाहते हैं, इसका मतलब ही हैं कि हमारी नज़रों में जिंदगी बहुत ज्यादा मूल्यवान हैं। और मजे की बात यह हैं कि हर कोई यह सब जानते-समझते हुए भी जाने-अनजाने ही सही सिर्फ दो मिनट का समय बचाने के लिए अपनी जिंदगी दाँव पर लगाता हैं! आइए, जानते हैं कैसे...

आज छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी की ज़ुबान पर ये वाक्य हमेशा रहते हैं कि हमारे पास समय नहीं हैं। हम इतने व्यस्त हैं कि मरने की भी फ़ुरसत नहीं हैं! मुझे बताइये, क्या मरने के लिए अलग से समय निकालना पड़ता हैं? मौत तो इतने दबे पांव आती हैं कि किसी को भी कानों कान ख़बर तक नहीं होने देती। फिर भी हम कहते हैं कि मरने की भी फ़ुरसत नहीं! इसलिए इस क़ीमती समय को बचाने के लिए हम हमारी जिंदगी को दाँव पर लगाते हैं। शोध बताते हैं कि इस बचे हुए समय का ज्यादातर लोग कुछ भी सदुपयोग नहीं करते...वे इसे यूं ही व्यर्थ गवां देते हैं!

• क्या आपको पता हैं कि पहले के मुकाबले आजकल बच्चे ज्यादा बीमार क्यों पड़ रहे हैं? छोटे-छोटे बच्चों में गंभीर किस्म के पेट के रोग क्यों हो रहे हैं? किसी को लीवर की बीमारी तो किसी को किडनी की। समझ में नहीं आता कि जब विज्ञान इतनी तरक्की कर रहा हैं, इलाज के साधन पहले से बेहतर हैं, तो फिर छोटे-छोटे बच्चों को इतनी बिमारियां क्यों हो रही हैं? इसका मुख्य कारण हैं हमारी समय बचाने की मानसिकता के कारण बच्चों की बाहर का उल्टा-सीधा कुछ भी खाने की आदत! बच्चों को भूख लगने पर क्या चाहिए? दो मिनट वाले नुडल्स या फिर दे दिया फोन पर बर्गर, पिज्जा या शाही पनीर का ऑर्डर! जबकि सभी को पता हैं कि ये सब चीजें हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक हैं। बच्चों को बाजार की ये सब चीजें खाने की आदत भी तो हम ही डालते हैं क्योंकि घर पर नाश्ता बनाने का समय हमारे पास नहीं हैं! समय मूल्यवान हैं भाई!

• चंद मिनट बचाने के लिए हम अपनी जान हथेली पर रख कर सिग्नल तोड कर, रॉंग साइड से ओव्हरटेक करते हुए अपनी गाड़ी सबसे आगे दौडाते हैं...उस वक्त हमारे गाडी की स्पीड देख कर ऐसा लगता हैं कि मानो दुनिया के सबसे व्यस्त इंसान हम ही हैं। हमें गाड़ी सबसे आगे दौडाने की इतनी जल्दी रहती हैं कि इस चक्कर में कोई हादसा होकर हमारी जान भी चली जाएं तो हमें पर्वा नहीं रहती। समय मूल्यवान हैं भाई!

• हमारे पास फोन पर बात करने का भी समय नहीं हैं। इसलिए ही तो एकदम व्यस्ततम चौराहा पैदल पार करते वक्त भी हमारा फोन पर बात करना शुरु रहता हैं। हम सोचते हैं की पैदल चलते वक्त यदि चलने के साथ-साथ फोन पर बात भी हो जाएं तो कितने समय की बचत होगी...हैं न! समय का सदुपयोग करना चाहिए...समय मूल्यवान हैं भाई!

• हमें लाईफ में सब कुछ इंस्टंट चाहिए। घर में समय बचाने के लिए ही तो आजकल बाहर खाने का प्रचलन बढ़ रहा हैं। शहरों के होटलों में छुट्टियों के दिन चले जाइए...ऐसा लगता हैं जैसे शहर का हर बंदा होटल में ही खाना खा रहा हैं! ज्यादातर महिलाएं घर में अचार, मुरब्बा और मसाले नहीं बनाती हैं। जब सब कुछ बाजार में रेडिमेड मिलता हैं तो घर में समय कौन बरबाद करें? लेकिन बाहर के खाने में कौन सा तेल, घी या मसाला इस्तेमाल हो रहा हैं...कौन से केमिकल मिलाए जा रहे हैं...वे हमारी सेहत के लिए फायदेमंद हैं भी या नहीं...साफसफाई का ख्याल रखा जा रहा हैं कि नहीं...किस तरह के पानी में खाना पकाया जा रहा हैं...इन सब बुनियादी और ज़रुरी बातों की तरफ हम ख्याल ही नहीं देते। क्यों? क्योंकि इन फ़ालतू की बातों की ओर ख्याल देने का हमारे पास समय नहीं हैं। समय मूल्यवान हैं भाई!

दोस्तों, यह हमारी फास्ट लाइफस्टाइल, जिंदगी से ज्यादा समय को मूल्यवान समझने की हमारी मानसिकता बहुत जानलेवा हैं। यह फास्ट लाइफस्टाइल कितनी खतरनाक हैं इसका पता हमें तब चलता हैं जब हमारा कोई अपना बहुत बड़े हादसे का शिकार होता हैं या उसे कोई गंभीर बीमारी होती हैं।

यूरोप के लोगों को फास्ट लाइफस्टाइल के नुकसान समझ में आ गए हैं। इसलिए उन्होंने पिछले कुछ समय से फास्ट फूड और फास्ट लाइफस्टाइल से तौबा करते हुए ‘गो स्लो मूवमेंट’ शुरु की हैं। ताकि जिंदगी जीने के मजे ले सके। इसके लिए वहां पर कई लोगों ने मल्टीटास्किंग यानी एक ही वक्त में कई काम करने की आदत छोड़ी हैं। उन लोगों ने घर में खाना बनाना शुरु कर दिया हैं। ब्रेड भी अब बाजार से खरीदने की बजाय घर में ही बेक की जा रहीं हैं। घरों में सब्जियां उगाई जा रहीं हैं। वे लोग कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल और गैजेट्स से दूरी बना रहे हैं ताकि इन चीजों पर समय व्यतित करने की बजाय अपने लोगों से कुछ बात की जा सके।

यहां पर भी यहीं जरुरत हैं। हमें जिंदगी का मूल्य समझना होगा। फास्ट फूड और बाजार के मसालों और अचार आदि से दूरी बनाकर घर की रसोई में नए प्रयोग करने होंगे। यकीन मानिए, हमारे बच्चे फिर से स्वस्थ होने लगेंगे। समय बचाने के चक्कर में यदि जिंदगी ही नहीं रही तो समय का क्या करेंगे? एक बार सोचिएगा ज़रुर...

Keywords: Life, Time, importance of life, importance of time

COMMENTS

BLOGGER: 12
  1. हमेशा की तरह एक प्रेरक लेख है दी...समय का मूल्य ज़िदगी से बढ़कर नहीं...बहुत बढ़िया👌

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (02-06-2018) को "अब वीरों का कर अभिनन्दन" (चर्चा अंक-2989) (चर्चा अंक-2968) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत ही महत्वपूर्ण लेख...
    सही कहा जिन्दगी से बढ़कर कुछ भी नहीं ...
    समय बचाने के चक्कर में हम लोग जिन्दगी को खतरे में डाल रहे हैं।बहुत सुन्दर एवं ज्ञान वर्धक लेख...

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  4. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति कमजोर याददाश्त - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

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  5. प्रेरक लेखक। हम सेकंड बचाने के चक्कर में कई दिनों का नुक्सान कर देते हैं। उम्मीद है लोग बाग़ इस लेख को पढेंगे और इस विषय में सोचेंगे। बचपन में एक कहावत सुनी थी कि जल्दी का काम शैतान का होता है। ये सटीक कहावत थी। बस लोग बाग़ इसे भूलते जा रहे हैं।

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  6. मेरे हिसाब से दोनों ही मूल्य वान हैं। समय भी और जिंदगी भी क्योंकि दोनों को ही ज़ाया नहीं किया जा सकता।

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    1. जमशेद जी, मुल्यवान तो दोनों ही हैं। लेकिन ज्यादा मुल्यवान क्या हैं? ज्यादा मुल्यवान तो जिंदगी ही हैं न? यदि जिंदगी ही नहीं रही तो हम समय का क्या करेंगे?

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  7. सही कहा ज्योति जी ,आगे भागने की दौड़ में सेहत से समझौता करना गलत है ...जीवन सबसे महत्वपूर्ण है , समय बचाने का अर्थ ये नहीं की अपना स्वास्थ्य या जीवन ही दांव पर लगा दे , प्रेरक लेख

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  8. सच है जीवन से बढ़कर कुछ नही, लोग ढोंग करते है कि उनके पास समय नही है, सही जीने के लिए समय तो निकालना ही होगा ।

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