क्या मटके पर औंधा लोटा रखने से अपशकुन होता हैं?

मेरे घर पर एक परिचिता आई हुई थी। उसने मुझ से कहा, “ज्योति, तुम मटके पर लोटा औंधा क्यों रखती हो? मटके पर लोटा औंधा नहीं रखना चाहिए। लोटे में थोड़ा सा ही सही लेकिन पानी जरुर रखना चाहिए। नहीं तो अपशकुन होता हैं!”

क्या मटके पर औंधा लोटा रखने से अपशकुन होता हैं?
मेरे घर पर एक परिचिता आई हुई थी। उसने मुझ से कहा, ''ज्योति, तुम मटके पर लोटा औंधा क्यों रखती हो? मटके पर लोटा औंधा नहीं रखना चाहिए। लोटे में थोड़ा सा ही सही लेकिन पानी जरुर रखना चाहिए। नहीं तो अपशकुन होता हैं!'' 
''मटके पर लोटा हम अपनी सुविधानुसार कैसे भी रखे, उससे शकुन अपशकुन कैसे हो सकता हैं?'' मैं ने पूछा। ''ब्लॉगर क्या बन गई, हर बात में तर्क लगाती हो! मेरी माँ, दादी ही क्या, पड़ दादी भी ऐसा ही बोलती थी कि मटके पर औंधा लोटा नहीं रखना चाहिए। अपशकुन होता हैं। अरे, कुछ तो होता ही होगा तब ही तो ऐसे कहती थी। मैं तो बड़े-बुजुर्गों द्वारा कही हुई बाते मानती हूं...इसलिए तुम्हें भी अपना समझ कर बोल दिया। अब मानना नहीं मानना तुम्हारे उपर हैं।'' 
ये जो परिचिता थी वो उम्र में मुझ से बड़ी थी। उनका स्वभाव बहुत ही अच्छा होने से उनकी और मेरी बहुत पटती थी। इसलिए हम आपस में सभी तरह की बाते कर लेते थे। 
''चाचीजी, मैं भी बड़े-बुजुर्गों द्वारा कही गई बातों का पालन करती हूं। लेकिन मुझे लगता हैं कि जो रीति-रिवाज अच्छे है उनका तो पालन किया जाए लेकिन जो गलत है उन्हें बदला जाए। बदलाव संसार का नियम है। जिसे आगे बढ़ना है उसे समय के साथ चलना ही होगा।'' 
''कौन सा रिवाज सही हैं और कौन सा रिवाज गलत हैं इसका फैसला तुम कैसे करोगी? जो रिवाज सदियों से चलते आ रहे हैं, जाहिर हैं कि वे सही हैं इसलिए ही इतने सालों से चलते आ रहे हैं!''  
''मैं आपकी इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूं कि यदि कोई रिवाज सालों से चल रहा हैं इसलिए वो सही ही हैं। हमारे बुजुर्गों को उस समय के हिसाब से जितनी जानकारी उपलब्ध थी, जितने साधन उपलब्ध थे, उन जानकारी और साधनों के हिसाब से उन्होंने अपने कार्य किए। तब वे सही थे। लेकिन उन्हीं कार्यों को नई पीढ़ी रिवाज हैं कह कर पागलों की भांति पकड़कर बैठ जाती हैं वो गलत हैं। हम जब भी सोचते है तो पहले यह पूछते है कि गीता क्या कहती है? पुराणों में क्या है? समस्या आज की, शास्त्र कल का! उनका मेल क्या है? गैलिलिओ के सामने सवाल पैदा हुआ कि जमीन चपटी है कि गोल? बाइबल खोल कर देख सकता था। उसमे जीसस ने लिखा है कि जमीन चपटी है। बात खत्म हो जाती। लेकिन उसने खोजा तो पाया कि जमीन गोल है। पुरानी किताबे कहती है कि चांद सूरज से बड़ा है लेकिन चांद सूरज से छोटा निकला! जब तक हिंदुस्तान की प्रतिभा शास्त्र के विपरीत नहीं है, पुराने रीति-रिवाजों से दीमक की तरह चिपकी हुई है तब तक डार्विन, एडिसन, न्यूटन, डॉ. एपिजे अब्दुल कलाम पैदा नही होंगे। हमें पुराने रीति-रिवाजों से मुक्त होना होगा। नई वैज्ञानिक सोच पैदा करनी होगी। 
वैसे भी रीति-रिवाज़ और नियम दोनों में फर्क है। समाज बिना रीति-रिवाजों के चल सकता है लेकिन बिना नियमों के नही चल सकता। जिन नियमों को हम भावावेश में पकड़े रहते है वे रिवाज़ बन जाते है। जैसे की भारत में रास्ते का नियम है कि आप बाएं चलिए। किसी देश में रास्ते का नियम हो सकता है कि आप दाएं चलिए। यह कोई रिवाज नही है। हम अपनी सुविधा के लिए नियम बनाते है। जीवन जीने के लिए नियमों का पालन करना ज़रूरी है लेकिन जब हम इन नियमों को रीति-रिवाज़ बना कर बिना सोचे-समझे आंखे बंद करके उनका पालन करते हैं तो वो गलत हैं।'' 
''बाप रे तु तो शुरु ही हो गई...ये तो बता कि मटके पर लोटे में पानी भर कर रखने में तुझे क्या गलत लगता हैं?''   
''पहले किचन में नल नहीं होते थे। इसलिए हमारे बुजुर्ग यदि पीने का पानी मटके में से निकालना हैं, तो मटके के उपर लोटे में पानी रखते थे ताकि उस पानी से हाथ धो कर साफ़ कर सके। लेकिन अब किचन में हाथ धोने के लिए नल रहते हैं। अत: जब भी हमें मटके में से पानी निकालना हैं तब हम नल के पानी से ही हाथ धोते हैं। अब मटके के उपर लोटे में जो पानी रखा हैं उस पानी का हम क्या करते हैं? चुंकि वह पानी खुला रखा हुआ था तो हम उस पानी को पीने के या खाना बनाने के काम में नहीं लेते। वो पानी हम फेंक देते हैं। दिन भर इस तरह थोड़ा-थोड़ा कर-कर बहुत सारा पानी फेंक देते हैं। क्या आपको पता हैं कि देश में 16 करोड़ 30 लाख लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने के लिए साफ़ पानी नहीं मिलता! और हम हैं कि अपशकुन होने के डर से कई लीटर पानी यूं ही हर रोज बरबाद कर देते हैं? यह कहां की समझदारी हैं? मटके पर लोटे में पानी भर कर रखने से सिर्फ़ पीने का पानी ही बरबाद नहीं हो रहा तो बिजली भी बरबाद हो रहीं हैं क्योंकि आजकल ज्यादातर घरों में आर ओ लगा हुआ हैं। इसलिए समय के अनुसार सोच समझ कर शकुन-अपशकुन के फेर में न पड़ते हुए, हमारे बुजुर्ग कोई कार्य ऐसा करते थे तो क्यों करते थे और हम भी यदि रिवाज समझ कर उस कार्य को ठीक वैसे ही करते रहेंगे तो उसके क्या नुकसान होंगे इन सब बातों पर गौर करके ही हमें समय के साथ कदमताल करनी चाहिए।''
"हां ज्योति, तुम बिल्कुल सही हो। अब मैं भी मटके पर लोटा पानी भर कर नहीं, औंधा ही रखुंगी!''

Keywords: customs and traditions, Superstition, Blind faith, Matake par lota, Pot

COMMENTS

BLOGGER: 14
  1. लोटा में पानी रखने का दृष्टिकोण हो सकता है उस युग में तार्किक रहा हो। यह संभव है कि तब लोग हाथ स्वच्छ किए बिना लोटे को मटके में डाल पीने के लिए जल नहीं निकाल ले, इसके लिए पहले से ही बाहर लोटा भर पानी रखा गया हो कि पहले वे उससे हाथ साफ कर ले फिर उसे घड़े में डाले। तब हैंडल वाली वस्तुएं कम रही हो।
    जिसे शगुन- अपशगुन से जोड़ दिया गया हो। परंतु अब इसकी आवश्यकता नहीं है। लेकिन हाथ स्वच्छ रखने की तो आवश्यकता आज भी है कोरोना वायरस को लेकर सबसे पहले यही बताया जा रहा है।
    सुंदर और सार्थक लेख, ज्योति दी।
    परिवर्तन ही सृष्टि का नियम है।

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    1. शशि भाई, इतनी त्वरित टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। हाथ धोने की जरूरत तो हर समय रहेगी ही। लेकिन अब हाथ धोने के लिए जगह जगह नाल होने से लौटे में पानी भर कर रखने की जरूरत नहीं हैं।

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  2. उपयोगी सृजन, परन्तु रुढ़िवादी होना ठीक नहीं है।

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 16 मार्च 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. मेरी रचना को सांध्य दैनिक मुखरित मौन में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, यशोदा दी।

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  4. बिल्ई सही कहा ज्योति आपने...।सही में आप बहुत ही अच्छे विषय लेकर आती हैं । शायद पहले हाथ धोने के लिए ही लोटे में पानी रखते हों ।

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  5. सहमत आपकी बात से ... प्रश्न करने में बुराई नहि ... होना चाहिए ... तर्क भी ढूँढा जाए पर पुराना है तो रूडी है ... ये कहना ठीक नहीं ...

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  6. प्रिय ज्योति जी, नल और पानी भरे लोटे का तर्क एकदम सही दिया है। पुराने अनेक रीति रिवाज आज के परिपेक्ष्य में भी सही है परंतु समय के परिवर्तन के साथ साथ नियम रूढ़ नहीं होने चाहिए।उपयोगी लेख, शुभकामनाएँ ।

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  7. बिलकुल सही रीति रिवाज वही जो निश्चित रूप से आज के समय के हिसाब से भी उचित लगे, नहीं तो उन्हें ढोना कहीं से भी उचित नहीं
    इसी बहाने बहुत अच्छी बात निकल कर सबके सामने बहुत अच्छी तरीके से आपने समझकर प्रस्तुत की है
    बहुत अच्छा लगा, जागरूक प्रस्तुति

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  8. आपकी बात से सहमत हूँ। रिवाज जब बने होंगे तब उनके पीछे कुछ कारण रहा होगा लेकिन अब चूँकि हमारा जीवन जीने का तरीका बदल गया है तो इन रिवाजों में भी बदलाव जरूरी है। विचारोत्तेजक लेख।

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  9. बहुत सुंदर विवेचन ! ऐसी बहुत सी बातें समय के साथ अप्रासंगिक हो गयी हैं पर आदतन उनका निर्वाह होता चला जाता है।

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  10. सुन्दर,सार्थक और चिन्तनपरक लेख ज्योति जी । सदैव की भांति सुन्दर सृजन ।

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  11. जमीन गोल है
    चांद छोटा है
    आपके तर्क मेरे काम आएंगे
    कई जगह मैं फस जाता हूँ अब शायद कम जगह फसूं।
    रीति रिवाजों की लीक पीटना अनुचित है
    अगर वो आज के समय के अनुसार है तो बुराई नहीं।
    बहुत ही सुंदर, ज्ञानवर्धक लेख।
    नई रचना- सर्वोपरि?

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  12. बहुत ही सुन्दर ज्ञानवर्धक तर्कपूर्ण लेख ...
    सगुन अपसगुन कुछ नहीं जरूरत के हिसाब से रिवाज और प्रथा बन गयी...आपने बहुत ही अच्छे से रखे हैं अपने विचार... और साथ ही पानी की बर्बादी के विषय में जागरूक भी किया है...
    शानदार लेख के लिए बहुत बहुत बधाई आपको।

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: क्या मटके पर औंधा लोटा रखने से अपशकुन होता हैं?
क्या मटके पर औंधा लोटा रखने से अपशकुन होता हैं?
मेरे घर पर एक परिचिता आई हुई थी। उसने मुझ से कहा, “ज्योति, तुम मटके पर लोटा औंधा क्यों रखती हो? मटके पर लोटा औंधा नहीं रखना चाहिए। लोटे में थोड़ा सा ही सही लेकिन पानी जरुर रखना चाहिए। नहीं तो अपशकुन होता हैं!”
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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