क्या महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी?

महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी। जानिए, क्या हैं सच्चाई...

क्या महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी?
गुजरात के मशहूर स्वामीनारायण संप्रदाय के एक मंदिर के स्वामी कृष्णनस्वरुप दास ने पिछले दिनों एक प्रवचन के दौरान कहा कि, यदि महिलाएं मासिक धर्म के दौरान खाना बनाएंगी तो अगले जन्म में वह श्वान पैदा होगी। सोच और समझ का दुर्भाग्य यहीं खत्म नहीं होता तो इसी संस्थान द्वारा संचालित एक हॉस्टल की वॉर्डन ने 60 लडकियों को कपड़े उतारने इसलिए मजबूर किया क्योंकि उन्हें शक था कि पीरियड्स के दौरान कुछ लडकियों ने किचन और मंदिर में प्रवेश किया हैं! हम तो सिर्फ़ कल्पना ही कर सकते हैं कि कितनी अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ा होगा उन 60 लडकियों को! सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह हैं कि इन दोनों ही महानुभावों पर कोई कारवाई नहीं हुई हैं। 
'माहवारी या पीरियड' ये सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में आज भी एक रहस्यमयी शब्द है। महीने के उन दिनों के बारे में लोग न तो खुलकर बात कर पाते हैं और न ही इसके बारे में सही जगह से जानकारी जुटाने की कोशिश करते हैं। तमिलनाडु के एक स्कूल में बारह साल की एक बच्ची को सिर्फ़ पीरियड्स की जानकारी न होने से आत्महत्या करनी पड़ी! उसे स्कूल में ही महावारी आ गयी। जिस वजह से उस बच्ची की यूनिफॉर्म व बेंच पर दाग लग गया था। इस कारण से उसकी टीचर ने पूरी क्लास के सामने उसे इतना जलील किया कि उस बच्ची ने आहत होकर अपनी जान दे दी। बताइये उस बच्ची का क्या कसूर था? यही न कि उसे इस बारे में जानकारी नहीं थी! क्या ये कसूर सिर्फ़ उस बच्ची का था? क्या हम सब उसके लिए बराबरी के गुनाहगार नहीं हैं? 
माहवारी या पीरियड्स से संबंधित आम धारणाएं- 
आम धारणा यह है कि इस दौरान महिलाएं अशुद्ध होती हैं इसलिए उन्होंने मंदिर में नहीं जाना चाहिए और इस दौरान उनके छूते ही कोई चीज अशुद्ध या खराब हो सकती है। इन दकियानुसी बातों से पिछा छुडाने की ज़िम्मेदारी ख़ुद महिलाओं की है, जब तक वो शर्म और झिझक छोड़कर अपनी बेटियों को इस बारे में नहीं बताएंगी तो तमिलनाडु के तरह की घटनाएं होती रहेगी। हैरानी की बात तो ये है कि इन नसीहतों में कहीं भी सेहत से जुड़ी बातें शामिल नहीं होती, अगर कुछ होता है तो वो है बस अंधविश्वाासी व दकियानूसी बातें, जिनका कोई आधार नहीं होता। पेड़-पौधे के सुखने की बात पूर्णतया गलत है। अचार गीला चम्मच डालने से, बनाने में कुछ गलती होने से या फिर ढक्कन बराबर बंद न करने से भी खराब होते हैं। मेरा मानना है कि भगवान ये देखकर प्रसन्न होंगे की इतने दर्द में भी आपने मंदिर आने का प्रयास किया। शायद आपको मंदिर में जाने की बात न जमी हो...कई लोग कहेंगे कि खाना बनाने तक तो ठीक हैं लेकिन पीरियड्स के दौरान मंदिर में नहीं जाना चाहिए। यह बात अपने दिमाग में फिट कर लीजिए कि माहवारी के समय दुषित रक्त बाहर निकलता हैं लेकिन उससे नारी स्वयं दुषित नहीं होती। जैसे कि मल-मुत्र आदि दुषित चीजे शरीर से बाहर निकलने पर इंसान दुषित नहीं होता! यदि हम एक पल के लिए मान भी ले कि इस समय नारी दुषित होती हैं इसलिए उसने मंदिर में नहीं जाना चाहिए तो हम यहां भी दोहरी मानसिकता के शिकार हैं। एक तरफ़ तो हम कहते हैं कि ईश्वर कण-कण में हैं। वो हर जगह मौजुद हैं। यहां तक कि खंभे में भी भगवान (नरसिंह अवतार) हैं और दुसरी तरफ़ हम कहते हैं कि सिर्फ़ मंदिर में ही भगवान हैं इसलिए माहवारी के समय मंदिर में नहीं जाना चाहिए! रजस्वला नारी मंदिर में नहीं गई तो भी क्या बाकि जगह वो बिना हाथ लगाएं रह सकती हैं? जरा सोचिए... 
आज भी महिलाओं की बड़ी संख्या सैनिटरी नैपकिन की बजाय गंदे पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं, जिससे कई तरह की बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है। 10-12 साल की उम्र में ही बच्चियों को पीरियड्स आ रहे हैं, ऐसे में यदि उन्हें सही जानकारी नहीं दी जाएगी, हाइजीन के बारे में नहीं बताया जाएगा, तो आगे चलकर उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। 
आम धारणाओं के पीछे का सच-
दरअसल इन चार-पांच दिनों में नारी का शरीर थोड़ा कमज़ोर हो जाता है। कई स्त्रियों को तो असहनीय दर्द भी होता है। अत: यह बात ध्यान में रखते हुए, शायद हमारे बड़े-बुजुर्गों ने यह परंपरा शुरू की होगी कि इसी बहाने नारी को थोड़ा आराम मिलेगा। क्योंकि नारी को सबसे ज्यादा काम किचन में ही होता हैं। खाना नहीं बनायेंगी तो थोड़ा सा आराम मिलेगा। लेकिन अच्छी पहल का भी परिणाम उल्टा ही हुआ! रजस्वला नारी को अपवित्र माना जाने लगा और उससे चौके-चूल्हे के काम छोड़ कर बाकि सभी काम करवाये जाने लगे! 
• क्या महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी? 
दरअसल मासिक चक्र या रजस्वला होना एक नैसर्गिक क्रिया है, जो पूरी तरह से शरीर के गर्भावस्था के लिए तैयार होने की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। चिकित्सीय दृष्टिकोन से नारी का ठीक समय पर रजस्वला होना एक स्वस्थ व्यक्ति होने का संकेत है। जिस रज से इंसान (चाहे वह नर हो या नारी) का शरीर बनता है उसे ही हम अपवित्र कैसे मान सकते है? वास्तव में रजस्वला होना प्रकृति का नारी को दिया हुआ एक महावरदान है! इसी वरदान की वजह से नारी माँ बन सकती है!! जो नारी माँ नहीं बन सकती उसे समाज जीने नहीं देता और माँ बनने के लिए माहवारी की जो आवश्यक क्रिया हैं उसे ही अशुभ मान कर महिलाओं को प्रताडित किया जाता हैं। ये तो यहीं बात हुई कि चीत भी मेरी और पट भी मेरी! महिलाओं को माँ बनना भी जरुरी हैं लेकिन वो यदि पीरियड्स से होती हैं तो उसे अशुद्ध मानते हैं। समाज की ये कैसी दोहरी मानसिकता हैं? महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी। ऐसा कह कर महिलाओं को डराया जाता हैं। वास्तव में, अगले जन्म में इंसान का किस रुप में जन्म होगा और उसका आधार क्या हैं, विज्ञान के लिए भी यह एक अबुझ पहेली हैं! जब विज्ञान ही इस मामले में अनजान हैं तो हमारे ये तथाकथित पंडित किस आधार पर कहते हैं कि महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी!!! ऐसे धर्मगुरु जिनके लाखों अनुयायी हैं, उनके ऐसे बेतुके बयानों से महिलाएं मानसिक अत्याचार का शिकार होती हैं! क्या उनका ये धर्म नहीं हैं कि वे अपने भक्तों को सही रास्ता दिखाएं? 

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COMMENTS

BLOGGER: 17
  1. आप सावधान इंडिया की तरह सदैव ज्ञानवर्धक लेख लेकर आती हैं, ज्योति दी।
    परिवर्तन सृष्टि का नियम है प्राचीन परंपराओं में भी सुधार होते रहना चाहिए, न की उन्हें बिल्कुल निरर्थक समझा जाए।
    पहले लोग कहा करते थे कि बरगद, पीपल और नीम के वृक्ष न काटे जाएँँ ,उसमें देवी- देवताओं का निवास है अथवा पोखरे के पास न जाओ नहीं तो चुड़ैल पकड़ लेगी ,तो स्पष्ट है कि जहां वृक्षों की रक्षा के लिए ऐसा कहा गया, वहीं सुनसान स्थल पर बने तालाब में डूबने के भय से चुड़ैल का सृजन किया गया था।

    आप इसी तरह से नारी जगत का मार्गदर्शन करती रहे।

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    1. इतनी त्वरित और बढ़िया टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, शशि भाई।

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  2. हम अक्सर सुनी सुनाई बातों को बिना उनके कारण जाने मानने लगते हैं और आने वाली पीढ़ी को भी ऐसे ही करने की सलाह देने लगते हैं। यही कारण है कि ऐसे धर्म गुरु ऐसी बातें करते हैं करते हैं। मुझे यकीन है कि यह बातें वही हैं जो वो बचपन से सुनते आये हैं और बिना कारण जाने मानते आये हैं। लोगों को सोचना होगा कि उन्हें किस तरह के लोगों के कथन को मानना है। माहवारी एक प्राकृतिक क्रिया है। इसे लेकर न जाने क्यों इतना हव्वा बनाया हुआ है। सामयिक विषय पर बेहद सटीक टिप्पणी।

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  3. 21 दिनी प्रक्रिया
    गर्भाशय में लगातार जमा होते रहता है लहू
    यदि गर्भधारण हो गया तो
    गर्भस्थ शिशुु के लिए वह लहू गद्दे का काम करता है
    और वह लहू उसका शुरुआती भोजन होता है
    यदि गर्भधारण नही हुआ तो पाँच दिनों में वह लहूू
    बाहर निकल जाता है..
    एक सर्वथा स्त्रियोचित प्राकृतिक कार्य है
    साफ सफाई जरूरी है
    सादर..

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  4. वाह!बहुत खूब ज्योति ! शायद इन दिनो स्त्रियों को आराम की जरुरत होती हैं ,इसीलिये ये नियम होगे कि उन्हें खाना न बनाकर आराम करना है और वो ही बाद में अंधविश्वास में बदल गए ..। जरूरत है इस सोच को बदलने की ।

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  5. अंधपरम्पराओं से भरी वर्जनाओं की पीठ पर आपके इस लेख के हथौड़े से की गई चोट के लिए नमन आपको ... हम इनके इस अवस्था में मंदिरों में जाने की पैरवी कर के और भी इन अंधपरम्पराओं को बल देने की भूल करते हैं वैसे ...
    हाँ, इस के प्रति नई पीढ़ियों को जागरूक कर के इसकी झेंप से वंचित करना होगा , ताकी भावी पीढ़ी कम से कम अपनी इस विशेषता पर झेंपने के बजाए इसकी मानव नस्ल की रचना वाली महत्ता के कारण गर्व महसूस कर सके ...

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  6. मासिक धर्म से जुड़ी खोखली भ्रांतियों को बेनकाब करता शानदार लेख....
    आज प्रगतिशील समाज को ये समझना जरूरी है कि मासिक धर्म आने का कारण आखिर है क्या...और मंदिर या सार्वजनिक स्थानों में न जाने का कारण है कि किसी प्रकार के इन्फेक्शन से बचाव... क्योंकि इस दौरान महिलाओं के हार्मोन्स चेंज होने से इम्यून सिस्टम कमजोर रहता है इसलिए उनकी स्वास्थ्य सुरक्षा की दृष्टि से ये विचारधारा रखी गयी जो भ्रांति मात्र बन गयी बहुत अच्छा विषय पर ज्ञानवर्धक लेख लिखने हेतु बहुत बहुत बधाई एवं धन्यवाद ज्योति जी !

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  7. प्रिय ज्योति जी , हमारी दादी इस मासिक चक्र के बारे में बहुत दिलचस्प चीजें बताया करती थी | उनके परिवार में एक कोना और बिस्तर , परिवार की इस चक्र से गुजरने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षित रहता था |
    इस स्थिति में अनायास महिला एक मानसिक और शारीरिक वेदना से गुजरती है और उपर से वर्जनाएं और वाहियात , भ्रामक रीती- रिवाज और किंवदंतियाँ इस पीड़ा को बहुत बढ़ा देती हैं | बहुत अच्छा लिखा आपने |
    आज बहुत कुछ बदल चुका है | मेरी दादी से मेरी बेटी तक बहुत सुखद परिवर्तन आ चुके हैं | ज्यादा कुछ नहीं , बस सफाई जरूरी है| यही सर्वोपरी है अपने लिए भी दूसरों के लिए भी | सादर सस्नेह --

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  8. आज के युग में भी जब तमिलनाडु और गुजरात में हुई घटनाएं सुनने को मिलती हैं तो कभी कभी शंका होने लगती हैं कि -क्या हम सचमुच शिक्षित हैं। आज भी इस विषय पर जागरूकता की आवश्यकता हैं और आपका ये लेख इस कार्य में अपनी बेहतर भूमिका निभाएगा ,बहुत ही उन्दा ज्ञानवर्धक लेख ज्योति जी ,सादर नमन

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17 -3-2020 ) को मन,मानव और मानवता (चर्चा अंक 3643) पर भी होगी,
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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    1. मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, कामिनी दी।

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  11. सही कहा है आपने बहना! हमारे पूर्वजों ने पाँच दिन स्त्री को आराम करने के लिए तय किए थे, हमारे समाज ने उसे कुप्रथा में बदल दिया। पढ़े-लिखे लोग भी इस अंधविश्वास में लिप्त है। बहुत सुंदर और सार्थक लेख लिखा बहना।

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  12. ऐसे मठाधीशों और उनके मंदिरों का बहिष्कार करना चाहिए, जो ऐसे ओच्छी, नासमझी की बातें कर नारी जाति का अपमान करते हैं , उनसे दूरी ही एकमात्र उपाय है
    बहुत अच्छी जागरूक प्रस्तुति

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  13. स्वामीनारायण के श्वान सम्प्रदाय को यह कविता भेज दीजिए:-
    https://vishwamohanuwaach.blogspot.com/2018/09/blog-post_29.html?m=1

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  14. अन्धविश्वास पर प्रहार करता सार्थक लेख

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रोटी,1,ज्वेलरी,1,झारखंड,1,झाले-वारणे,2,झूठ,1,टमाटर,1,टमाटर सूप,1,टिप्स कॉर्नर,36,टी.व्ही. और सिनेमा,1,ठंडे पेय,6,ठेचा,1,डर,1,डैंड्रफ,1,डॉक्टर,2,डॉटर्स डे,2,डोसा,1,ड्राई फ्रूट,1,ड्राई फ्रूट्स लड्डू,1,ढाबा स्टाइल सब्जी,1,ढोकले,1,तरबूज,2,तरबूज के छिलके का हलवा,1,तलाक,1,ताजे नारियल की बर्फी,1,तिल,3,तिल की कुरकुरी चिक्की,1,तिल के लड्डू,1,तिल गुड़ की रेवड़ी,1,तेल,1,तेलंगाना,1,तोहफ़ा,1,त्यौहार,1,थंडा पानी,1,दक्षिणा,1,दर्द का रिश्ता,1,दवा,1,दशहरा,1,दशहरा की शुभकामनाएं,1,दशहरा शायरी फोटो,1,दही,5,दही वाली लौकी की सब्जी,1,दही सैंडविच,1,दहेज,3,दाग-धब्बे,1,दान,1,दासी,1,दिपावली बधाई संदेश,3,दिवाली,1,दिशा,1,दीपावली शुभकामना संदेश,1,दीवाली रेसिपी,1,दुध पावडर,1,दुबई,1,दुबई यात्रा,1,दुर्गा माता,1,दुल्हा,1,दुश्मन,1,दूध,2,देशभक्ति,3,देशभक्ति शायरी,2,देहदान,1,दोस्त,2,धनिया,1,धर्म,3,धर्मग्रंध,1,धार्मिक,34,नजर,1,नजर कैसे उतारु,1,नदी में पैसे,1,नन्ही परी,1,नमक पारे,1,नमकीन,1,नवरात्र,2,नवरात्र स्पेशल,2,नवरात्रि,3,नवरात्रि की शुभकामनाएं,1,नवरात्रि शायरी फोटो,1,नवरात्री रेसिपी,8,नववर्ष,2,नववर्ष की 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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: क्या महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी?
क्या महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी?
महिलाओं ने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौरान खाना बनाया तो अगले जन्म में वे श्वान पैदा होंगी। जानिए, क्या हैं सच्चाई...
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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