कहानी- दर्द का रिश्ता

प्रतिमा को मेरी ऐसी कौन सी राज की बात पता चली कि जिसके कारण उसकी गलतफहमी दूर हो कर उसका और मेरा एक दर्द का रिश्ता कायम हो गया।

कहानी- दर्द का रिश्ता
मैं जैसे ही एक दुकान से शॉपिंग कर बाहर आई तो मेरी नजर सामने ही बन रहे मॉल पर गई। वहां पर 10-15 मज़दूर काम कर रहे थे। उनमें एक औरत पहचानी-पहचानी सी लग रही थी। उसका ध्यान मेरी ओर नहीं था। दिमाग पर जोर डाल ही रही थी कि एकदम से याद आ गया कि अरे, ये तो मेरी बचपन की सबसे प्यारी, बहुत ही अजीज़ सहेली प्रतिमा हैं! हम कक्षा दसवीं तक साथ में पढ़े थे। हमारे घर भी पास-पास ही थे। इसलिए गर्मी की छुट्टियों में भी एक दिन भी हमारा ऐसा नहीं जाता था कि हम आपस में न मिले हो...हम एक बार खाना न खाकर रह सकते थे लेकिन एक-दूसरे से मिले बिना नहीं रह सकते थे! दसवी के बाद मेरे पापा का ट्रान्सफर हो गया और हम नागपुर आ गए। हमारे बीच कुछ सालों तक पत्र-व्यवहार चालू था। लेकिन बाद में मैं पढ़ाई में व्यस्त होती गई और हमारा संपर्क टूट गया। आज पूरे 20 सालों बाद मैं उसे देख रही थी। 

मैं अपने-आप को रोक नहीं पाई और उसे जोर से आवाज़ लगाई, ''प्रतिमा....'' अपना नाम सुन कर उसने पलट कर देखा। वो भी मुझे देखते से ही पहचान गई। 
''शिल्पा, तुम? सॉरी...आप?''  
''सॉरी की बच्ची...ये 'आप' क्या हैं? मैं तू से आप कब और कैसे हो गई?'' ''आप अब शहर की जानी-मानी डॉक्टर हो! मैं आपको तू कह कर कैसे बुला सकती हूं?''  
''तूम्हें पता हैं कि मैं डॉक्टर हूं?''  
''हां, मुझे पता हैं। मुझे नागपुर आएं अभी चार महीने ही हुए हैं। लेकिन मेरे मोहल्ले के लोगों से आपकी और आपके पति देव की तारीफ़ सूनी हैं। अब आपका सरनेम बदलने से पहले मैं पहचान नहीं पाई थी लेकिन कल ही एक नेत्रजांच शिबिर के बड़े से बोर्ड पर नाम के साथ आपका फ़ोटो छपा था। तब मैं पहचान पाई। मैं सोच ही रही थी कि आप से मिलने आउंगी लेकिन आज अचानक हमारी मुलाकात हो गई।'' 
''अब यदि तू ने मुझे आप कहा तो मैं तुम से बात नहीं करुंगी!''  
''अच्छा बाबा, गलती हो गई...सॉरी!'' ऐसा कहकर उसने अपने हाथों से दोनों कान पकडे। उसने ये इस अंदाज़ में कहा कि हम दोनों ही खिलखिला कर हंस पड़ी। 
''अब बता तू यहां कैसे?'' मैं ने पूछा। 
''तुझे तो पता हैं कि मेरे पापा बहुत शराब पीते थे। इसी शराब ने उनकी जान ले ली। मेरा भाई भी बुरी संगत में पड़ कर शराब पीने लगा। मम्मी तो पहले से ही बीमार रहती थी। पापा के जाने से और भाई के व्यवहार से वो और भी बीमार रहने लगी थी। घर की माली हालत बहुत ख़राब हो गई थी। इसलिए मैं ने दसवी के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और दूसरों के घरों में काम करने लगी। एक बार जिस घर में मैं काम करती थी वो मेमसाब बाहर गई हुई थी तो साहब ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की...उस दिन तो मैं किसी तरह बच गई लेकिन इज्जत का हवाला देकर मेरे भाई और माँ ने फ़िर मुझे काम पर नहीं जाने दिया और मेरी शादी कर दी।''

''तेरा पति तुझे मारता-वारता तो नहीं न?'' मैं ने ऐसा इसलिए पूछा क्योंकि उसके पापा उसकी मम्मी को हमेशा मारते थे। इस कारण प्रतिमा के मन में डर बैठ गया था कि जब उसकी शादी होगी तब कहीं उसका पति भी तो उसे नहीं मारेगा? मैं हमेशा उसे दिलासा देती थी कि देखना तेरा पति तुझे कभी नहीं मारेगा...वो तुझे बहुत प्यार करेगा क्योंकि तू हैं ही इतनी अच्छी। 
''वो क्यों मारेगा मुझे? उसके बराबरी का कमाती हूं! सिर्फ़ साल-दो साल में एकाध बार गुस्सा आने पर मार देता हैं। अब उतना तो चलता हैं। क्योंकि वो मेरे पापा जैसे बार-बार मम्मी को मारते थे वैसे नहीं मारता! वैसे वो बहुत अच्छा हैं। बस तेरे जैसा मान-सम्मान नहीं हैं मेरा। तेरे पास तो नाम, शोहरत, इज्जत, बंगला, गाड़ी, नौकर-चाकर सब कुछ हैं...मैं तो एक छोटे से दो कमरे के मकान में रहती हूं।'' 
वो अपनी कहानी बता ही रही थी कि इतने में गाड़ी का हॉर्न बजा। देखा तो मेरे पति देव थे। उन्होंने प्रतिमा पर एक तिरस्कार भरी नजर डाली तो मैं डर गई। मैं ने इशारों में ही प्रतिमा से बाय कहा और गाड़ी में आकर बैठ गई। गाड़ी में बैठते से ही ये मुझे डांटने लगे, ''एक डॉक्टर होकर तुम्हें इतनी सी भी तमीज नहीं कि सड़क पर खड़े होकर एक कामवाली बाई से इतना हंस-हंस कर बाते कर रहीं थी? अपनी नहीं तो कम से कम मेरी इज्जत का ही ख्याल रख लेती! तुमने एक बार भी नहीं सोचा कि तूम शहर के जाने-माने डॉक्टर अनिल की बीवी हो! क्या सोचेंगे लोग मेरे बारे में? हे भगवान, कब अक्ल आयेगी इस औरत को?'' ये सब इन्होंने इतने गुस्से से और जोर से बोला था कि प्रतिमा को सब सुनाई दे गया। मैं अपमान का घूंट पीकर रह गई। 
मैं मन ही मन सोचने लगी कि प्रतिमा ने कितनी सहजता से कह दिया कि मैं भी बराबरी का कमाती हूं। कमाती तो मैं भी हूं। लेकिन मेरे पति की नजरों में मैं डॉक्टर होने के पहले एक औरत हूं और उनकी बीवी हूं...जिसकी हैसियत उनके सामने कुछ भी नहीं! डॉक्टर होने से मेरी औरत वाली हैसियत नहीं बदलने वाली! इसलिए एक डॉक्टर होने के बावजूद मुझे अपने पति से इज्जत नहीं मिलती! 
कुछ दूरी पर खड़ी होकर हमारी ओर देख रही प्रतिमा को मेरे मान-सम्मान की असलियत पता चल गई थी। वो मेरा दर्द समझ चुकी थी। सच में, दर्द का रिश्ता तुरंत बन जाता हैं और ये रिश्ता बहुत मजबूत भी होता हैं।

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COMMENTS

BLOGGER: 15
  1. उत्तर
    1. इतनी त्वरित टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, दिग्विजय भाई। सही कहा आपने कि नारी की असलियत यहीं हैं।

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  2. बाहर समाज में मिला मान-सम्मान उतना महत्व नहीं रखता जितना घर मे अपनोंं से मिला मान-सम्मान...पर यह भी कटु सत्य है समाज का कि पति अपनी पत्नी को अपमानित करके उसी की नजर में सम्मानित रहना चाहता है...
    सही कहा दर्द का रिश्ता और भी मजबूत होता है
    कटु सत्य पर आधारित बहुत ही सुन्दर कहानी

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  3. यही हमारे समाज की असलियत है ज्योति ।

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  4. Bahut hi khubsoorti se aapne samajh aur Kuchh mardo ki sachchai bayan kiya hai...
    Shor but potential story.

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  5. बहुत दिल को छूने वाली कहानी ज्योतिजी

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  6. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में " सोमवार 30 सितम्बर 2019 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. मीना दी, मेरी रचना को "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  7. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (01-10-2019) को     "तपे पीड़ा  के पाँव"   (चर्चा अंक- 3475)  पर भी होगी। 
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. मेरी रचना को "चर्चा मंच" में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  8. Bahut hi kadvi sachchai lekin khubsurat tarike se pesh kiya apne

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  9. दिल को छू गई ये कहानी ... कितना कुछ होता है जो छुपा रखता है ... किसी आवरण के पीछे ...
    पर सच है दर्द का रीश्ता गोटा है जो कोमन प्लेटफोर्म पर रहता है ...
    दिल का रिश्ता दर्द ही है ...

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  10. स्त्री -पुरुष की बराबरी का सवाल उठाती मार्मिक कहानी ...बधाई ज्योति जी

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नाम

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: कहानी- दर्द का रिश्ता
कहानी- दर्द का रिश्ता
प्रतिमा को मेरी ऐसी कौन सी राज की बात पता चली कि जिसके कारण उसकी गलतफहमी दूर हो कर उसका और मेरा एक दर्द का रिश्ता कायम हो गया।
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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