आवश्यकता हैं ‘बेटी पढ़ाओ’ की तर्ज पर ‘बेटा पढ़ाओ’ अभियान की...

हम बेटियों को तो हर चीज सिखाने की पूरी-पूरी कोशिश करते हैं लेकिन जैसे ही बेटो की बात आती हैं, हम ये कह कर पीछे हट जाते हैं कि वो तो बेटा हैं...बेटों को तो सिर्फ़ कमाने लायक बना दिया कि हमारी ज़िम्मेदारी खत्म! लेकिन यहीं पर हम से गलती हो जाती हैं।

  आवश्यकता हैं ‘बेटी पढ़ाओ’ की तर्ज पर ‘बेटा पढ़ाओ’ अभियान की...
आजकल ‘बेटी पढ़ाओ’ अभियान की चारों ओर खुब चर्चा हैं। सहीं भी हैं...पढ़ेगी बेटी तो ही बढ़ेगी बेटी। नारी को समाज में समान दर्जा दिलाने के लिए, नारी अत्याचार पर रोक लगाने के लिए ‘बेटी पढ़ाओ’ अभियान बहुत ज़रुरी हैं। पढ़ने में आया हैं कि काशी हिन्दु विश्वविद्यालय (बीएचयु) का आईआईटी विभाग लड़कियों को आदर्श बहू बनने की ट्रेनिंग देगा और इसके लिए तीन माह का कोर्स चलाया जाएगा। जरा सोचिए...हम बहू तो आदर्श चाहते हैं लेकिन क्या दामाद भी आदर्श नहीं होना चाहिए?

इसलिए मुझे लगता हैं कि ‘बेटी पढ़ाओ’ के साथ-साथ ‘बेटा पढ़ाओ’ अभियान की भी आज बहुत आवश्यकता हैं। हम बेटियों को तो हर चीज सिखाने की पूरी-पूरी कोशिश करते हैं लेकिन जैसे ही बेटो की बात आती हैं, हम ये कह कर पीछे हट जाते हैं कि वो तो बेटा हैं...बेटों को तो सिर्फ़ कमाने लायक बना दिया कि हमारी ज़िम्मेदारी खत्म! लेकिन यहीं पर हम से गलती हो जाती हैं। क्या हम कभी यह सोचते हैं कि जिंदगी जीने के लिए लड़कियों को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं तो लड़कों की भी जिंदगी में कुछ परेशानियां आ सकती हैं…जिसके लिए उन्हें बुनियादी बाते सिखाना ज़रुरी हैं? सिर्फ़ किताबी ज्ञान से जिंदगी अच्छे से नहीं जी जाती। न ही गूगल जिंदगी जीने के पाठ पढ़ा सकता हैं! ये बुनियादी बाते हमें अपने बेटों को घर में खुद ही सिखानी होगी।

आजकल लोग बहुएं तो चाहते हैं नौकरी वाली ताकि घर चलाने में बेटों का हाथ बटाएं। तो बेटों को भी तो उसी हिसाब से तैयार करना चाहिए न, ताकि वे अपनी पत्नी की मदद कर सके!

• जमाने के साथ सोच बदलना ज़रुरी हैं
हमारी सामाजिक व्यवस्था ही कुछ ऐसी हैं, जिस में हम लड़कियों को घर के काम जैसे खाना बनाना, कपड़े धोना, साफ सफाई करना आदि सिखाते हैं और लड़कों से घर से बाहर के काम करवाते हैं। आजकल लड़कियाँ तो बाहर के काम संभाल रही हैं। लेकिन हम लड़कों को घर के काम नहीं सिखाते। परिणामत: कुछ लड़कों को रसोई में कौन से डिब्बे में चीनी रखी हैं और कौन से डिब्बे में नमक रखा हैं यह तक पता नहीं होता। जिन्हें पता हैं उनसे हम स्वयं कभी चाय तक नहीं बनवाते। तो ऐसे में यदि कभी उसे अकेले रहने की नौबत आई तो हमारा लाडला बेटा अपने लिए एक कप चाय तक नहीं बना पाता। आजकल एकल परिवारों के चलन की वजह से ऐसे मौके बार-बार आते हैं। दूसरे आजकल बच्चों को पढ़ाई के लिए घर से दूर भेजना ही पड़ता हैं। होस्टल में बच्चों को अपना काम खुद ही करना पड़ता हैं। कुछ जगह खाना बराबर मिल जाता हैं तो कुछ जगह पर खाना बिल्कुल भी अच्छा नहीं मिलता। यदि हमने अपने बेटे को थोड़ी बहुत रसोई से पहचान करवाई, दो-चार सब्ज़ियाँ और रोटी बनाना सिखाया होता तो वो अपने हाथ से बना कर खा तो सकते थे। किस किताब में लिखा हैं कि लड़कियाँ हवाई जहाज़ नहीं उडा सकती और लड़के रसोई में गोल-गोल रोटी नहीं बना सकते? बड़े-बड़े शेफ लड़के हैं जबकि हमारी सामाजिक सोच के हिसाब से वहां पर लड़कियाँ होनी चाहिए थी। आज संजीव कपूर, हरपाल सिंह सोखी, हरी नायक, और विकास खन्ना इन लोगों की गिनती भारत के टॉप शेफ में होती हैं। यदि उनके घर वाले रसोई में काम करना लड़कियों का काम हैं ऐसा कहते तो क्या वे इस मुकाम पर पहुंच पाते? अत: किसी भी काम के लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि ये काम लड़के का नहीं हैं या ये काम लड़की का नहीं हैं। आज हमें जमाने के साथ सोच बदलने की जरुरत है।

• लड़के होने का मतलब श्रेष्ठ होना नहीं हैं
हमें अपने घर का वातावरण इस तरह का रखना होगा कि हमारे बेटों के मन में यह भावना न पनपे कि वे लड़कियों से श्रेष्ठ हैं। इसके लिए जो बंदिशे हम लड़कियों पर लगाते हैं जैसे कि रात को समय से घर आना आदि वैसी ही बंदिशे हमें लड़कों पर भी लगानी होगी। लड़के होने का मतलब श्रेष्ठ होना नहीं हैं बल्कि ज्यादा जिम्मेदार होना हैं। यदि किसी लड़की को उनके मदद की जरुरत हैं तो वे उसे पूरा सहयोग करें।

• महिलाओं का सम्मान करना
आजकल के बेटों को ये सिखाना बहुत ज़रुरी हैं कि किसी महिला का सम्मान वे कैसे करे। क्योंकि अक्सर देखने में आता हैं कि लड़के पापा की बात तो झट से मान लेते हैं लेकिन मम्मी की बात पर वो उतना ध्यान नहीं देते हैं। इससे उनके मन में यह भावना पनपती हैं कि महिलायें उतने सम्मान की हक़दार नहीं हैं।

• लड़कियाँ भी उन्हीं की तरह एक इंसान हैं
बेटों को यह बात अच्छी तरह समझाएं कि लड़कियाँ भी उन्हीं की तरह एक इंसान हैं, उन्हें भी भावनाएं हैं, अत: वस्तु समझकर उनका इस्तेमाल न करें। किसी भी लड़की पर गंदे कॉमेंट्स न करे, उनसे छेड़छाड़ न करें, उनके साथ किसी भी तरह की बदतमीजी न करे। हमेशा ध्यान रखे कि तुम किसी लड़की के साथ जैसा बर्ताव कर रहें हो वैसा ही बर्ताव यदि किसी लड़के ने तुम्हारी बहन के साथ किया तो तुम्हें कैसा लगेगा? ऐसा सोचने पर तुम गलत काम करने से अपने आप को रोक पाओगे।

• घर का काम करना कमजोर होने का प्रतीक नहीं हैं
हमारी सामाजिक व्यवस्था में घरेलू कार्यों को कमतर माना जाता रहा हैं। इसलिए लड़कियों को कमजोर मानते हुए उन्हें घर के और लड़कों को बाहर के काम सौपें जाते हैं। लेकिन यह सोच सर्वथा गलत हैं कि घर के कार्यों में कम मेहनत लगती हैं। फिटनेस एक्सपर्ट भी मानते हैं कि ऑफ़िस में लगातार कुर्सी पर बैठ कर कार्य करने की बजाए घर के कार्यों में ज्यादा मेहनत लगती हैं और कैलरी भी ज्यादा खर्च होती हैं। इसलिए घर का काम करना कमजोरी का नहीं, ताकत का प्रतीक हैं।

• जोरू का गुलाम नहीं, ट्रू लाइफ पार्टनर बने
आज भी यदि कोई पुरुष घर की रसोई में काम करता या अपनी पत्नी के कामों में हाथ बंटाता दिख जाता हैं, तो उसे जोरु का गुलाम कह कर उसका मज़ाक उड़ाया जाता हैं। लेकिन बेटों को समझाएं कि जब घर दोनों का हैं तो घर के सभी कार्यों की ज़िम्मेदारी भी दोनों की बराबरी की बनती हैं। इस में गुलाम और मालिक वाली बात कहां से आ गई? तुम जोरु का गुलाम नहीं, ट्रू लाइफ पार्टनर बनना।

इसलिए मुझे लगता हैं कि यदि हमने हमारे बेटों को घर में थोड़ी सी बुनियादी शिक्षा दी...तो उनकी जिंदगी कुछ हद तक खुशहाल बनेगी और नारी पर हो रहे अत्याचारों में भी कमी आएगी!

Keywords: Daughter teaches campaign, need of son teaches campaign, education, upbringing

COMMENTS

BLOGGER: 11
  1. Bahut hi Sahi Kaha aapne.aisi Soch rakhkar hi hamara samaj aage badh payega.ladke aur ladkiyo me kaam ke silsile me koi farak ni Karna Chahiye.

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  2. मैं आप की बातो से १००%सहमत हूँ ,मेरी भी विचारधारा कुछ ऐसी ही है बेटो को सही मार्गदर्शन की बहुत आवश्यकता है हम हमेशा से अधूरी परवरिश करते आ रहे है इसीलिए समाज में संतुलन नहीं बन पा रहा है। एक सशक्त लेख ,स्नेह

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  3. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. प्रिय ज्योति तुम्हारा ये लेख निसन्देह एक सकारात्मक सोच का सुंदर उदाहरण है ।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (28-12-2018) को "नव वर्ष कैसा हो " (चर्चा अंक-3199)) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. Wah didi App ne kaphi accha lekh likha Sahi hai meri App se sahmat hu

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  7. मेरी रचना को चर्चा मंच में स्थान देने हेतु बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  8. सहमत हूँ ज्योति जी, बेटों को भी घर के कामों की शिक्षा देनी चाहिए, इससे जो एक चलन चल गया है कि घर के काम दोयम दर्जे के हैं उस पर भी रोक लगेगी | जीवनसाथी का अर्थ ही दोनों का हर काम को मिल बाँट कर करना होना चाहिए |

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  9. बहुत सटीक....
    बेटियों से ज्यादा बेटों को सिखाने पढाने की आवश्यकता है....ताकि वह एक जिम्मेदार नागरिक बनें व घर के कामों को तुच्छ समझकर औरतों का अनादर न करें...टू लाइफ पार्टनर बनना सीखें ...बहुत ही बढिया... लाजवाब...
    नववर्ष की शुभकामनाएं...

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  10. बहुत ही सुन्दर लेख ज्योति बहन सकारात्मक सोच समेटे
    सादर

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नाम

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: आवश्यकता हैं ‘बेटी पढ़ाओ’ की तर्ज पर ‘बेटा पढ़ाओ’ अभियान की...
आवश्यकता हैं ‘बेटी पढ़ाओ’ की तर्ज पर ‘बेटा पढ़ाओ’ अभियान की...
हम बेटियों को तो हर चीज सिखाने की पूरी-पूरी कोशिश करते हैं लेकिन जैसे ही बेटो की बात आती हैं, हम ये कह कर पीछे हट जाते हैं कि वो तो बेटा हैं...बेटों को तो सिर्फ़ कमाने लायक बना दिया कि हमारी ज़िम्मेदारी खत्म! लेकिन यहीं पर हम से गलती हो जाती हैं।
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
https://www.jyotidehliwal.com/2018/12/aavshyakata-hai-beta-padhao-abhiyan-ki.html
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