लघुकथा- ...और इज्जत बच गई!!!

पाँच-पाँच लड़को के बीच अपनी इज्जत बचती न देख शिल्पा ने ऐसा क्या किया कि पाँचों खुद ही उससे दूर हो गए...!!!

लघुकथा-  ...और इज्जत बच गई!!!
''शिल्पा बेटा, आज अंकित काम पर नहीं आया हैं। ये ले एक्टिवा की चाबी और घर जाकर मेरा टिफिन लेकर आ।'' कपड़े के दुकानदार ने अपने दुकान की सेल्स गर्ल से कहा। शिल्पा पेशोपेश में पड़ गई। मालिक को मना नहीं कर सकती थी और मालिक के घर जाने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी। कारण था मालिक का बेटा अमर। अमर जब भी दुकान पर आता, शिल्पा को ख़राब नजर से घुरता। किसी न किसी बहाने से उसे छुने की कोशिश करता। कई बार वो सोचती कि ये नौकरी छोड़ दु! लेकिन नौकरी की उसे सख्त जरुरत थी। जब वो छोटी थी तब ही उसकी माँ का देहांत हो गया था। दो साल पहले पिता को लकवा मार गया। उसके दो छोटे भाई-बहन हैं। पूरे चार लोगों का परिवार चलाने की ज़िम्मेदारी उस पर हैं। इसलिए अमर की गंदी हरकतों को नज़रअंदाज़ करना उसकी मजबूरी थी। दूसरी नौकरी भी तो आसानी से नहीं मिलती। वैसे मालिक का स्वभाव बहुत ही अच्छा था। वो उसे बेटी की तरह मानते थे। हरदम 'शिल्पा बेटा' कह कर ही पुकारते। मालिक के तरफ देख कर और यह सोच कर वह अमर की गंदी हरकते सहन कर लेती कि दुकान पर बाकि लोगों की उपस्थिति में वो सुरक्षित हैं। लेकिन अब घर जाने की बात...

''शिल्पा बेटा, क्या हुआ? कहाँ खो गई? ये चाबी पकड़ न!'' मालिक की आवाज़ से उसकी तंद्रा तुटी। उसने बेमन से चाबी ली और टिफिन लाने मालिक के घर गई। घर की डोअर बेल बजाने पर दरवाज़ा अमर ने ही खोला। उसे देख कर ही शिल्पा को थोड़ा डर लगा।

''क्या बात हैं? कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा? आज मेरी जान खुद ही चल कर मेरे घर आई हैं! क्यों आ गई न मेरी याद?''
''आज अंकित काम पर नहीं आया हैं इसलिए बाबूजी ने मुझे टिफिन लाने भेजा हैं। माँ जी कहाँ हैं, उनसे कहो की टिफिन दे दे।'' 
''मम्मी किचन में हैं। किचन में जाकर टिफिन ले लो।'' 
किचन के तरफ़ जाते हुए उसने देखा कि हॉल में अमर के चार दोस्त बैठे हुए हैं। शिल्पा को उनके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान महसूस हुई। नारी को ईश्वर ने एक ऐसी अनोखी शक्ति दी हैं कि उसको पुरुषों के गंदे इरादे जल्दी समझ में आ जाते हैं। ''माँ जी...माँ जी...'' पुकारते हुए वो किचन में घुसी तो वहाँ पर कोई नहीं था। जैसे ही वो वापस आने के लिए मुडी तो अमर और उसके दोस्त रास्ता रोक कर खड़े हो गए। ''माँ जी कहाँ हैं?'' शिल्पा ने पुछा। ''मम्मी मंगलपाठ में गई हैं। 4-5 घंटे के पहले नहीं आएगी।'' उसके सभी दोस्त अट्टाहास लगाने लगे। ''वा...व्व…अमर आज तो मजा आ जाएगा... घर में हमारे अलावा और कोई नहीं हैं।''

शिल्पा अपने बचाव के लिए किचन में से कोई सामान उठाती तब तक अमर ने उसका हाथ पकड़कर अपनी ओर खिंचा। वो और उसके दोस्त शिल्पा को पकड़ कर अंदर के कमरे में ले गए। मदद के लिए चिल्लाने का तो कोई फ़ायदा ही नहीं था। क्योंकि इतने बड़े बंगले के सभी खिड़की दरवाज़े उसके दोस्तों ने पहले ही बंद कर दिए थे। तेज आवाज़ में टी. व्ही. पर म्यूज़िक लगा दिया था ताकि बाहर कोई भी आवाज़ न जाएं। उन्होंने उसे घसीटकर पलंग पर पटक दिया। जहां तक हो सके शिल्पा अपनेआप को उन राक्षसों से बचाने की कोशिश करने लगी। एक लड़के ने उसकी कुर्ती गले के पास से पकड़ कर खींची तो कुर्ती फट गई। पाँच-पाँच लड़कों के आगे वो अपनेआप को असहाय महसूस करने लगी। जल्द ही उसकी समझ में आ गया कि अब उसकी इज्जत कोई नहीं बचा सकता! अचानक शिल्पा जोर से चिल्लाई...आओ...आओ अब मैं बिल्कुल भी विरोध नहीं करुंगी!...लेकिन बाद में सभी लोग आत्महत्या कर लेना!!

इतना कह कर वह खुद ही अपने कपड़े खोलने लगी। अचानक शिल्पा का बदला हुआ यह रुप देख कर पाँचों के कुछ भी समझ में नहीं आया। कोई लड़की खुद ही सामूहिक बलात्कार करवाने के लिए कैसे तैयार हो सकती हैं? 
''हम क्यों आत्महत्या करेंगे? हम लड़के हैं...हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता...इज्जत तो तेरी जाएगी...समाज में तू कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी...आत्महत्या तो तुझे करनी पड़ेगी!!!''

''हाँ, इज्जत तो मेरी जायेगी लेकिन तुम तो जिंदगी से हाथ धो बैठोगे...आओ, मैं खुद तुम लोगों को...आओ और...और... फिर तुम सभी लोग खुद ही आत्महत्या कर लोगे क्योंकि...क्योंकि... मुझे एड्स हैं!!!''

'एड्स' शब्द सुनते ही पाँचों को सांप सूंघ गया! पाँचों झट से दूर सरक गए...। शिल्पा फ़िर से चिल्लाई...''आओ, एड्स पीडिता के साथ.......'' लेकिन कोई भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ।

अब शिल्पा धीरे से उठी। अपने कपड़े बराबर किए और सधे हुए कदमों से चलकर दरवाजा खोलकर बाहर आ गई। किसी ने भी उसे नहीं रोका! रास्ते में शिल्पा सोच रही थी कि यदि ऐन वक्त पर उसे इतना बड़ा झूठ नहीं सूझता तो उसकी इज्जत नहीं बचतीं!!

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COMMENTS

BLOGGER: 17
  1. ज्योति जी , बहुत सुंदर सार्थक ,संदेशप्रद कहानी , आज ऐसी भयावाह स्थिति हो गयी है कि लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए शारीरिक व् मानसिक रूप से मजबूत होना पड़ेगा तभी वो इस दुश्प्रव्त्ति वाले लोगों का सामना कर सकती हैं |

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  2. बहुत सही लिखा आज कल की परिस्थितियों को देख लड़कियों को खुद के बचाव के रास्ते खुद ही तलाशने होंगे

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  3. विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक सन्तुलन नहीं खोना चाहिए ...एक अनुभवी सीख। ज़रूरत है कि माता पिता अपनी बेटियों को शरीर के साथ मानसिक रूप से भी मजबूत बनाएँ, तभी एक बेटी अपना अस्तित्व स्वयं बनाए रख पाएगी। साधुवाद

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (21-09-2018) को "गाओ भजन अनूप" (चर्चा अंक-3101) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

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  5. मनुष्य का दिमाग तत्परता से काम करे तो कोई मुशकिल नही।
    बहुत खूब लिखा हैं।

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  6. Very instruvtive and enlightening story 👌👌

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  7. त्वरित उपचार
    साहसी बाला
    सादर

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  8. बहुत ही प्रेरक कहानी है।
    आज के संदर्भ में एकदम सार्थक।
    वर्तमान परिस्थितियों में समाज के भेड़ियों से सुरक्षित रहने के लिये स्त्रियों को आत्मरक्षा के तरीके सीखना अति आवश्यक है।

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  9. बहुत ख़ूब , महिलाओं को अपनी रक्षा के उपाय स्वयं ही सोचने होंगे । बहुत ख़ूब

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  10. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन युगदृष्टा श्रीराम शर्मा आचार्य जी को सादर नमन : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  11. शिल्पा ने अपने सतर्क दिमाग के कारण खुद को बचा लिया। लेकिन ऐसे लड़कों की गंदे मानसिकता के बारे में क्या। इसे कौन बदल देगा? समाज के लिए एक बड़ा सवाल है। ज्योतिजी बहुत अच्छी तरह से लिखित लघु कहानी।

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  12. बहुत ही सुन्दर प्रेरक लघुकथा....आज के ऐसे नरपिशाचों से बचने के लिए शारिरिक और मानसिक
    प्रबलता होनी आवश्यक है प्रभावशाली भाषाशैली में लिखित लाजवाब कहानी...

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: लघुकथा- ...और इज्जत बच गई!!!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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