बुढापा: बोझ नहीं, बढ़िया भी हो सकता हैं...!!

आज पत्र-पत्रिकाओं में नई पिढी द्वारा बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचारों के किस्से प्रकाशित हो रहे हैं। किंतु यह सिक्के का एक ही पहलु हैं। यदि कुछ बातों का ख्याल रखा जाए तो बुढापा: बोझ नहीं, बढ़िया भी हो सकता हैं...!!

बुढापा: बोझ नहीं, बढ़िया भी हो सकता हैं...!!
बुढ़ापा, जिंदगी का एक ऐसा अंतिम पड़ाव हैं, जिसमें मनुष्य को सिर्फ़ प्यार चाहिए होता हैं। बुजुर्गों को केवल अपने बच्चों का साथ चाहिए होता हैं लेकिन ज्यादातर बुजुर्गों को वो भी नसीब नहीं होता। बुजुर्गों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस निश्चिंत किया गया हैं। लेकिन वास्तव में वर्तमान में बुजुर्गों को जितना सम्मान मिलना चाहिए, उतना मिलता नहीं हैं। आखिर क्या हैं इसकी वजह? आज पत्र-पत्रिकाओं में नई पिढी द्वारा बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचारों के किस्से प्रकाशित हो रहे हैं। किंतु यह सिक्के का एक ही पहलु हैं। यदि बुजुर्ग आज की भागदौड वाली और मशीनी जीवन की विवशता समझे, सामंजस्य बैठाएं और बच्चों की महत्वाकांक्षाओं को स्विकारे तो ऐसी स्थिती ही पैदा नहीं होगी! 'पीकू' फिल्म में भास्कर बैनर्जी खुद के स्वार्थ के लिए अपनी युवा बेटी के भविष्य और सुख की चिंता तो दूर की बात उसकी शादी भी नहीं होने देता। उसकी बेटी का ध्यान हरदम अपने जिद्दी और सनकी पिता पर रहता हैं। वह दफ्तर जाकर कुर्सी पर ढंग से बैठ भी नहीं पाती कि पिता का फोन आ जाता हैं और वो अपना कामधाम छोड घर की ओर भागती हैं। यदि बुजुर्ग 'पीकू' फिल्म के भास्कर बैनर्जी की तरह शोषक की तरह व्यवहार करेंगे तो बुढ़ापा जरुर बोझ बनेगा।

अब जरा दो ख़बरों पर नजर डालिए-
पहली- 12 हजार करोड़ रुपए की मालकियत वाले रेमंड ग्रृप के मालिक विजयपत सिंघानिया पैदल हो गए। बेटे ने पैसे-पैसे के लिए मोहताज कर दिया!
दूसरी- मुम्बई की आशा साहनी 6 अगस्त 2017 को बेटे का इंतजार करते-करते कंकाल बन गई। बेटा जब डेढ़ साल बाद अमेरिका से भारत आया तो उसे माँ का कंकाल मिला।

विजयपत सिंघानिया और आशा साहनी, दोनों ही अपने बेटों को अपनी दुनिया समझते थे। पढ़ा-लिखाकर योग्य बना कर उन्हें आकाश की बुलंदियों को छुते देखना चाहते थे। दोनों की इच्छा पूरी हो गई। आशा का बेटा विदेश में आलिशान जिंदगी जीने लगा और सिंघानिया के बेटे गौतम ने पिता का कारोबार संभाल लिया। फिर गलती कहां हुई? आशा साहनी कंकाल क्यों बन गई और विजयपत सिंघानिया बुढ़ापे में सड़क पर क्यों आ गए? सिंघानिया ने मुकेश अंबानी के राजमहल से उंचा जेके हाउस बनवाया था, लेकिन अब किराए के फ्लैट में रहने क्यों मजबूर हैं? क्या दोष सिर्फ़ उनके बच्चों का हैं?

इस सवाल के जबाब के लिए हमें अपने जिंदगी जीने के तरीके पर गौर करना होगा। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए हम बचपन में ही उन्हें अपने से दूर भेज देते हैं। जब बच्चे बचपन से ही हमारे साथ नहीं रहे तो उनमें अपनेपन की भावना कहाँ से पनपेंगी? माना की बच्चे के लिए अच्छी शिक्षा जरुरी हैं लेकिन कम से कम दसवी कक्षा तक तो बच्चे को अपने पास रखना चाहिए न ताकि हम उनमें अपने संस्कार डाल सके। उनके साथ वक्त बिता सके। हम बच्चों को हर भौतिक सुख-सुविधा देने के चक्कर में खुद उनसे दूर होते चले जाते हैं। उपर से तुर्रा यह कि हम तो बच्चों के लिए ही जी रहे हैं! बस एक बार वे अपने जीवन में सेटल हो जाएं बस! यदि यह सहीं हैं तो बच्चों के कामयाब होने के बाद हमें जीने की क्या जरुरत हैं? आशा साहनी और विजयपथ सिंघानिया दोनों के बच्चे कामयाब थे! तो उस हिसाब से अब दोनों को जीने की कोई जरुरत ही नहीं थी! फ़िर दोनों को बच्चों से कैसी शिकायत? क्यों हमें लगता हैं कि उनके बच्चों ने उनके साथ गलत किया? भई, जिंदगी अनमोल हैं। जब अपनी जिंदगी का मोल हम खुद नहीं समझ पाएं तो बच्चे क्यों हमारी जिंदगी को महत्व देंगे? गरीबी से ज्यादा अमीरी अकेलापन देती हैं। करोड़ों के फ्लैट की मालकिन आशा साहनी के साथ उनकी ननद, भौजाई, जेठ, जेठानी के बच्चे पढ़ सकते थे..? क्यों खुद को अपने बेटे तक सीमित कर लिया? सही उम्र में क्यों नहीं सोचा कि बेटा अगर नालायक निकल गया तो कैसे जिएंगी? जब दम रहेगा, दौलत रहेगी, तब सामाजिक सरोकार जुडे रहेंगे, उम्र थकने पर तो अकेलापन ही हासिल होगा। व्हाट्सएप, फेसबुक के सहारे जिंदगी नहीं कटने वाली। जीना है तो घर से निकलना होगा, रिश्ते बनाने होंगे। दोस्ती गांठनी होगी। पड़ोसियों से बातचीत करनी होगी। आज के फ्लैट कल्चर वाले महानगरीय जीवन में सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि यदि आपकी मौत हो गई तो क्या कंधा देने वाले चार लोगों का इंतजाम आपने कर रखा है..? जिन पड़ोसियों के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा रखा था, जिन्हें कभी आपने घर नहीं बुलाया, वो भला आपको घाट तक पहुंचाने क्यों जाएंगे..?

याद कीजिए फिल्म बागबान। बागबान के राज मल्होत्रा (अमिताभ बच्चन) बेटों से बेइज्जत हुए, लेकिन दूसरी पारी में बेटों से बड़ी कामयाबी कैसे हासिल की, क्योंकि उन्होंने एक अनाथ बच्चे (सलमान खान) को अपने बेटे की तरह पाला था, उन्हें मोटा भाई कहने वाला दोस्त (परेश रावल) था, नए दौर में नई पीढ़ी से जुड़े रहने की कूव्वत थी।

विजयपत सिंघानिया के मरने के बाद सब कुछ तो वैसे भी गौतम सिंघानिया का ही होने वाला था, तो फिर क्यों जीते जी सब कुछ बेटे को सौंप दिया..? क्यों संतान की मुहब्बत में ये भूल गए कि इंसान की फितरत किसी भी वक्त बदल सकती है। जो गलती विजयपत सिंघानिया ने की, आशा साहनी ने की, वो हमें नहीं करनी चाहिए। रिश्तों और दोस्ती की बागबानी को सींचते रहना चाहिए, ये जिंदगी हमारी है, बच्चों की बजाय पहले खुद के लिए जिंदा रहना होगा। हम जिंदा रहेंगे, बच्चे जिंदा रहेंगे। अपेक्षा किसी से भी मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं।

बुजुर्गों को GPS की तरह होना चाहिए न कि CCTV कैमरे की तरह-
असल में बुजुर्गों को GPS की तरह होना चाहिए। हम आजकल सफ़र में रास्ता पता करने के लिए जिस तरह GPS का प्रयोग करते हैं, ठीक उसी तरह। यह हमें अलग-अलग तरह के जितने भी रास्ते उपलब्ध हैं, सबके बारें में बताता है और उसमें भी सबसे सुविधाजनक कौन सा रास्ता हो सकता है, इस बारे में भी जानकारी देता है। लेकिन रास्ते बताते समय यह जिद नही करता कि मैंने जो राह बताई हैं, हम उसी को चुनें। यदि हमने कोई नया रास्ता पकड़ा या भटककर दो या तीन चौराहे आगे चले गए, तो यह GPS बिना नाराज हुए, बिना भुनभुनाए फिर नए सिरे से रास्ता दिखाना आरंभ कर देता हैं। मतलब भटकाव की स्थिती में यह हमें एहसास कराता है कि निश्चिंत रहे, मैं आपके साथ हूं। बुजुर्गों को इस GPS की तरह होना चाहिए। बच्चों को सही दिशा दिखाने वाले, पर केवल हमारी ही सुने ऐसी जिद न रखने वाले भी।
बुजुर्गों को CCTV कैमरे की तरह नहीं होना चाहिए। जिस तरह यह कैमरा सिस्टम हर छोटी बड़ी हलचल पर बारीक नजर रखता है, इसका हमेशा डर लगा रहता है, उसी तरह ज्यादातर अभिभावकों की निगाह भी बच्चों पर हरवक्त बनी रहती है। बच्चों को हरवक्त दबाव या तनाव महसुस होता है।
CCTV का डर लगा रहता है, इसके विपरित GPS एक विश्वास है कि वह है हमारे साथ।

अपनी खुबी को पहचानकर उसे संवारे-
सोचिए, जब एक खिलाडी रिटायरमेंट के बाद मैनेजर, कोच, एंपायर या कमेंटेटर हो सकता हैं...एक सेवानिवृत नौकरशाह किसी आयोग का अध्यक्ष हो सकता हैं...एक रिटायर्ड फिल्मी अदाकार रियलिटी शो का जज हो सकता हैं...उम्र के 65-70 साल बाद भी कोई व्यक्ति किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री हो सकता हैं, देश का प्रधानमंत्री हो सकता हैं...तो क्या आप इतने गए-बीते हैं कि कुछ भी नहीं हो सकते? अजी, कुछ न कुछ तो हो ही सकते हो!!! इसलिए जीवन में कभी भी निराशा के ''न'' को और बुढापे के ''ब'' को स्थान न दें। हर इंसान में एक न एक खुबी जरुर होती हैं। उस खुबी को पहचानकर उसे संवारे। यदि बागवानी का शौक हैं तो बागवानी कीजिए, पढाई का शौक हैं तो सोसायटी के बच्चों को पढाएं, हरियाणा के 73 साल के बुजुर्ग सतबीर ढिल्लो छात्राओं को हर रोज सुरक्षित स्कूल पहुँचाते हैं, अमेरिका के अटलांटा के डेविड डचमै दूसरों के बच्चों को खिलाने रोज अस्पताल जाते हैं, इसी तरह के कोई भी काम जो हमे सुविधाजनक लगते हैं वो करके हम सम्मानजनक जिंदगी जी सकते हैं। बस, आवश्यकता हैं उस नजरिए से सोचने की...

बुढ़ापे को बढिया बनाने के लिए ये करना होगा-
1) बुढ़ापे के लिए कुछ धन संचय कर कर जरुर रखें। जीते जी अपनी पूरी संपत्ति अपने बच्चे के नाम भूल कर भी ना करें चाहे आपको अपने बच्चे पर खुद से भी ज्यादा विश्वास क्यों न हो! मरने के बाद तो सब बच्चों का ही हैं।
2) दो-तीन दोस्त तो भी ऐसे बनाएं जो हर स्थिती में आपके साथ हो।
3) अपने बच्चों के जीवन में दखलअंदाजी न करें। उन्हें अपने तरीके से अपना जीवन जीने दीजिए।
4) अपने स्वास्थ्य का ध्यान स्वयं रखे। पौष्टिक भोजन करे। व्यायाम को अपनी जिंदगी में खास स्थान दीजिए।
5) बच्चों से अनुचित अपेक्षा न पालें। उनकी भी अपनी जिंदगी हैं। हो सके तो घर के छोटे-छोटे काम स्वयं करें ताकि बेटे-बहू को भी थोडी मदद हो और आपके हाथ-पैरों का व्यायाम भी हो। 

यदि सिर्फ़ इतनी सी बातों का ख्याल रखा जाए तो बुढ़ापा: बोझ नहीं, बढ़िया भी हो सकता है… लेंस ट्रांसप्लांट से साफ़ दिखता है, नए दांतों से सहज चबता है, हियरिंग ऐड से सब सुनता है! इस तरह हम बुढ़ापे में भी जीवन जीने का आनंद ले सकते हैं!!
इमेज- गूगल से साभार

Keywords: Old age, the burden, old age is not the burden on society, elderly are treasure not a burden, International Day of older Persons  

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'रेप प्रूफ पैंटी' 15 अगस्त 8 मार्च अंकुरित अनाज अंगदान अंगुठी अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस अंधविश्वास अंधश्रद्धा अंधश्रध्दा अंश अग्रवाल अचार अच्छी पत्नी चाहिए तो... अच्छे काम अजब-गजब अतित अनमोल वचन अनुदान अनुप जलोटा अन्न अन्य अन्याय अपेक्षा अप्पे अमरुद अमरूद की खट्टी-मीठी चटनी अमीरी अमेजन अरुणा शानबाग अरुनाचलम मुरुगनांथम अवार्ड असली हीरो अस्पतालों में बच्चों की मौत आंवला आंवला लौंजी आइसक्रीम आईसीयू ग्रेंडपा आज के जमाने की अच्छाइयां आजादी आज़ादी आतंकवादी आत्महत्या आत्मा आदित्य तिवारी आम आम का अचार आम का पना आम का मुरब्बा आम की बर्फी आम पापड़ आरक्षण आलू इंसान इंस्टंट डोसा इंस्टंट स्नैक्स इंस्टट ढोकला इडली इन्डियन टाइम इमली इरोम शर्मिला ईद ईश्वर ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना उटी उपमा उपवास उपहार उमा शर्मा ऋषि पंचमी एक सवाल ऐनी दिव्या ऐश ट्रे ऑनलाइन और इज्जत बच गई कंघा कच्चे आम कच्चे आम का चटपटा पापड़ कद्दु कद्दु के गुलगुले कन्यादान करवा-चौथ कल्याणी श्रीवास्तव कहानी कांजी कानून कामवाली बाई कालीन किचन टिप्स किटी पार्टी किराए पर बीवियां कुंडली मिलान कुरकुरे कूकर केईएम् अस्पताल कॉर्न कॉर्न इडली कौए क्षमा खजूर खत खबर खरबूजा खांडवी खाद्य पदार्थ खाना खारक खारी गरम खुले में शौच खुशी खेल गणेश चतुर्थी पर शायरी गणेश चतुर्थी प्रसाद रेसिपी गरम मसाला गर्दन दर्द गर्भाशय गलत व्यवहार गलती गाजर गाजर के लड्डू गाजर-मूली के दही बडे गाय गुजरात गुड टच और बैड टच गुलगुले गुस्सा गृहस्वामिनी गोरखपुर गोल्फ गौरी पराशर घंटी घिया घी घी की नदी चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति चकली चटनी चाय चाय मसाला चावल चावल के पापड़ चाशनी चीज चीला चूर्ण छोटी बाते छोटे लेकिन काम के टिप्स छोटे-छोटे काम के टिप्स जज्बा जनसंख्या जन्मदिन जन्मदिन की शुभकामनाएं जन्माष्टमी जमाना जाट आंदोलन जात-पात जाम जिंदगी जीएसटी जीरो ऑइल रेसिपी जोक्स जोयिता मंडल ज्वेलरी झारखंड झाले-वारणे झूठ टिप्स कॉर्नर टी.व्ही. और सिनेमा ठंडे पेय ठेचा डॉक्टर डॉटर्स डे ढोकले तरबूज ताजे नारियल की बर्फी तिल के लड्डू तेलंगाना थंडा पानी दक्षिणा दवा दही दहेज दासी दिपावली बधाई संदेश दिशा दीपावली शुभकामना संदेश दुध पावडर दुर्गा माता दुल्हा दुश्मन दूध देशभक्ति देहदान दोस्त धनिया धर्म धर्मग्रंध धार्मिक नदी में पैसे नन्ही परी नवरात्र नवरात्र स्पेशल नवरात्री रेसिपी नववर्ष नववर्ष की शुभकामनाएं नाइंसाफी नानी नारी नारी अत्याचार नारी शिक्षा नाश्ता निंबु का अचार निचली जाती निर्णयक्षमता निर्भया निवाला नींबू नेत्रदान नेपाल त्रासदी नेल आर्ट पकोडे पक्षी पढ़ा-लिख़ा कौन? 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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: बुढापा: बोझ नहीं, बढ़िया भी हो सकता हैं...!!
बुढापा: बोझ नहीं, बढ़िया भी हो सकता हैं...!!
आज पत्र-पत्रिकाओं में नई पिढी द्वारा बुजुर्गों पर हो रहे अत्याचारों के किस्से प्रकाशित हो रहे हैं। किंतु यह सिक्के का एक ही पहलु हैं। यदि कुछ बातों का ख्याल रखा जाए तो बुढापा: बोझ नहीं, बढ़िया भी हो सकता हैं...!!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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