क्या मंदिरों में ड्रेस कोड होना चाहिए??

ईश्वर हर जगह मौजुद है। बड़े-बड़े मंदिरों में भी और छोटे-छोटे मंदिरों में भी। फिर क्यों सिर्फ बड़े-बड़े मंदिर वाले अपने -अपने मंदिरों में ड्रेस कोड लागु करवाना चाह रहे है??


क्या मंदिरों में ड्रेस कोड होना चाहिए??
हम हमारे आस पास कई क्षेत्रों में ड्रेस कोड लागु होते देखते है। जैसे कि हर स्कुल का अपना ड्रेस कोड होता है, तो सेना का अपना और पुलिस की अपनी वर्दी! हर क्षेत्र में ड्रेस कोड का अपना महत्व है। जैसे, स्कूलों-कॉलेजों में ड्रेस कोड होना अच्छी बात है क्योंकि इससे बच्चों में अमीर-गरीब का भेदभाव नहीं होता, सभी बच्चों में समानता का भाव विकसीत होता है। और बच्चे कौन से स्कूल के है, यह पहचान भी हो जाती है। 

हाल ही में वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए महिला श्रद्धालुओं को, विशषकर विदेशी महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर में कई सालों से यह नियम लागू है कि पुरुष श्रद्धालु धोती पहन कर ही पुजा- अर्चना कर सकते है।

भक्तों के मन के भाव-
अब सवाल यह है कि क्या मंदिरों में ड्रेस कोड होना चाहिए? मंदिरों में जो ड्रेस कोड की बात की जा रही है उसके लिए यह तर्क दिया जा रहा है कि मंदिर एक पवित्र स्थान है अतः यहाँ पर आने वाले सभी भक्तों के पहनावे में सादगी झलकनी चाहिए, अश्लीलता नहीं होनी चाहिए। यह तर्क सही है। लेकिन ईश्वर, एक इंसान न होकर एक शक्ति है। वस्त्र चाहे वह पॅन्ट-शर्ट हो या धोती, सादगीपूर्ण हो या अश्लीलता वाले, वास्तव में उस परम शक्ति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ईश्वर तो सिर्फ भक्तों के मन का भाव देखते है।

मौलिक अधिकारों का हनन
इंसान ने क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं, यह हर इंसान का अपना व्यक्तिगत मामला है। यही बात ख्याल में रखते हुए, हाल ही में मद्रास हायकोर्ट ने तमिलनाडु के मंदिरों में ड्रेस कोड लागु करने के आदेश पर रोक लगा दी है। ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि दक्षिणी जिला महिला संघ की सारिका जी ने अपील की थी कि ड्रेस कोड किसी व्यक्ति के अपनी मर्जी के कपडे पहनने के अधिकार का उल्लंघन है। 

छोटे मंदिरों का क्या?
यह हर इंसान जानता है और समझता भी है कि बड़े-बड़े तिर्थस्थानों में जो भगवान है, वे ही भगवान हमारे गांव या शहर के छोटे से छोटे मंदिरों में भी विराजमान है! ईश्वर एक ही है, चाहे वह तिरुपति के बालाजी हो, रामेश्वरम के शंकर जी हो, द्वारका के श्रीकृष्ण जी हो या हमारे शहर के किसी भी मंदिर में विराजमान बालाजी, शंकर जी या श्रीकृष्ण जी! लेकिन इसके बावजुद, हर इंसान को लगता है कि वो जितने बड़े मंदिर में जाएगा, उतना ही उसको ज्यादा पुण्य मिलेगा! हर इंसान जानता है कि जिस शांती एवं एकाग्रता से घर में ईश्वर की पुजा-अर्चना की जा सकती है, उस शांती एवं एकाग्रता से बड़े-बड़े तिर्थस्थानों पर पुजा-अर्चना नहीं की जा सकती! लेकिन ज्यादा पुण्य मीलने की आशा से इंसान बड़े-बड़े तिर्थस्थानों में जाता है! तिर्थस्थानों पर ईश्वर के सिर्फ दो मिनट के दर्शन से ही हमें लगता है कि हमारा जन्म सफल हो गया! इसलिए इन बड़े-बड़े मंदिरों ने कोई भी ड्रेस कोड लगाया तो भी हम उसका पालन ही करेंगे! लेकिन थोडा सा सोचिए, यदि हमारे गांव-शहर के छोटे-छोटे मंदिरों ने ऐसे ड्रेस कोड़ लगाए, तो क्या हम उस ड्रेस कोड़ का पालन करेंगे? मुझे तो लगता है कि इन मंदिरों में जाने वालों की संख्या ही कम हो जाएगी। क्योंकि अमीर लोग तो सिर्फ मंदिर जाने के लिए स्पेशल ड्रेस सिलवा लेंगे या किराए से ले लेंगे। लेकिन गरीब लोगों का क्या? दूसरे, आज कई बच्चे है जो परिक्षा देने जाते वक्त, कई युवा है जो इंटरव्यु देने जाते वक्त, कई लोग अपने नजदीकी रिश्तेदार को अस्पताल ले जाते वक्त, इन छोटे-छोटे मंदिरों में माथा टेकते है। कई बुजुर्ग तो नियम से हर रोज मंदिर जाते है। ड्रेस कोड़ लागु होने के बाद, क्या ये सभी उतनी सहजता से इन मंदिरों में जा पाएंगे? इस बात के मुद्देनजर छोटे मंदिर ड्रेस कोड़ नहीं लगा सकते! सोचने वाली बात है कि क्या छोटे मंदिरों के भगवान को अश्लीलता चलती है? या सादगी सिर्फ बड़े मंदिरों के भगवान को ही पसंद है?

शुद्ध व्यापारिक दृष्टिकोन
कई बार पढ़ने में आता है कि शनि शिंगणापुर में धोती के किराए के नाम पर, वास्तव में भक्तों को लुटा जाता है। बाजार में एक धोती की जो वास्तविक किंमत रहती है, उससे कई गुना ज्यादा कींमत सिर्फ किराए के रुप में वसूल हो जाती है! जब ऐसी खबरें पढ़ने मिलती है तब समझ में आता है, इन ड्रेस कोड़ के पिछे का असली मकसद!! भक्तों की भावनाओं का दोहन कर, मुनाफा कमाने का शुद्ध व्यापारिक दृष्टिकोन!

यह मेरे अपने विचार है, जरुरी नहीं कि आप इससे सहमत ही हो। आपको क्या लगता है, क्या मंदिरों में ड्रेस कोड होना चाहिए??

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COMMENTS

BLOGGER: 25
  1. आपके विचारों से पूर्णत: सहमत हूँ ! यह सर्वथा अनुचित प्रतिबन्ध है ! लेकिन दर्शनार्थियों को भी इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि मंदिर जाते समय शालीन वस्त्र धारण करें !

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    1. साधना जी, सही कहा आपने।

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    2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. मंदिरों में ड्रेस कोड का कोई औचित्य नहीं.लोग भक्तिभाव से मंदिरों में शीश नवाने जाते हैं.
    नई पोस्ट :
    लेखक से बड़ा होता किरदार

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  3. आपकी लिखी रचना, "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 25 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. दिग्विजय जी, मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-01-2016) को "मैं क्यों कवि बन बैठा" (चर्चा अंक-2232) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आदरणीय शास्त्री जी, मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  6. मंदिरों में ड्रेस कोड जरूरी नहीं लेकिन वहां ऐसे कपड़े पहनने चाहिए जिनसे शालीनता झलकती हो। फूहड़ लगने वाली ड्रेस नहीं।

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  7. शालीनता और फूहड़ता के पैमाने व्यक्ति की सोच के हिसाब से बदल जाते हैं. किसी को जींस फूहड़ नजर आती है तो किसी को साड़ी अश्लील. मंदिरों के प्रवेश-द्वार पर बैठने वाले प्रहरी की अक्ल ही शालीन-अशालीन तय करती है. उदार हिंदू धर्म-स्थलों पर कपड़ों को लेकर बेमतलब कट्टरता की मैं बड़ी भुक्त-भोगी हूँ क्योकि सफ़र में मुझे साड़ी बड़ी असुविधा-जनक लगती है और प्रहरी महिलाओं को मैं इसी कारण अधार्मिक लगती हूँ. कपड़ों को मुद्दा बनाना ही गलत है क्योंकि मंदिर में सब कोई अपनी संस्कृति के हिसाब से सही कपडे ही पहन कर जाता है

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    1. पर्मेश्वरी जी, मंदिरों में कपडों को मुद्दा बनाना ही गलत है। इसी बात के तरफ तो बड़े-बड़े तिर्थस्थानों के पंडे-पुजारियों का ध्यानाकर्षण करने की आवश्यकता है। इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से मेरा यह छोटा सा प्रयास है। मुझे पता है कि ये पंडे- पुजारी मेरा ब्लॉग नहीं पढ़ेगे! लेकिन कम से कम आम जनता तो इस बात का विरोध कर सके यहीं मेरा उद्देश है।

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  8. क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं, यह हर इंसान का अपना व्यक्तिगत मामला है ,परन्तु ये बात स्वयं भी सोचना चाहिए कि अवसर के उपयुक्त ही वस्त्र पहने .....

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  9. सही कहा। विचारणीय प्रस्तुति।

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  10. I am a modern girl with modern thinking. However, I think there should be dress code as of late i had rather not so good sight of girls and their dresses

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  11. बेईमानी के अखाड़े हैं ये धार्मिक स्थल , लूटते हैं दोनों हाथों से और अनपढ़ लोग लुटते हैं ख़ुशी ख़ुशी ! मंगलकामनाएं आपको

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  12. सही प्रश्न उठाया । यह एक व्यापक बहस का मुद्दा है । झटसे कोई निर्णय नहीं सुनाया जा सकता ।

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  13. आपके ब्लॉग को "ब्लॉगदीप" में शामिल किया है ।
    http://pksahni.blogspot.com

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    1. ब्लॉगर भाई प्रदिप जी, मेर ब्लॉग "ब्लॉगदीप" में शामिल करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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  14. Sometimes people just don't have the sense to dress appropriately for an occasion. A dress code may help to avoid indecent dressing.

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    1. सोमाली जी, ड्रेस कोड लगाने से कुछ हद तक अश्लीलता पर रोक लग सकती है लेकिन क्या ड्रेस कोड छोटे मंदिर भी लगा पायेंगे?

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  15. नहीं मंदिरों में ड्रेस कोड की आवश्‍यक्‍ता नहीं है। पर सबको यह जरूर ध्‍यान रखना चाहिए कि कपड़े शालीन हों।

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  16. No.There is no need of dress code in temples.Its a very important issue on which we have to think.

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  17. बहुत सही विचार प्रस्तुत किये आपने ज्योति जी। इश्वर प्रेम की भावना का प्रतीक है। वेश-भूषा से उनका क्या लेना-देना। ये तो हम मनुष्य हैं मन के विकारों से भरे जो सबको अपनी विचारधारा पर चलने के लिया मजबूर करते हैं।

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  18. Very Nice Post....

    लेकिन आप अभी भी अपनी Website में बहुत सी गलतियाँ कर रहें है | Really आपको अपने Blog में बहुत से सुधार करने की जरूरत है. For Get Success In Blogging Please visit : http://techandtweet.in

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  19. बहुत ही उम्दा विषय पर प्रश्न उठाया। ऐसी पहल के लिए धन्यवाद।

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मुठिया,1,पत्नी,1,पत्र,1,पपीता,1,परंपरा,2,परवरिश,6,पराठे,1,परीक्षा,2,परेशानी,1,पल्ली उत्सव,1,पवित्र,1,पवित्रता,2,पसंदीदा शिक्षक को पत्र,1,पानी,1,पानी कैसे पीना चाहिए,1,पापड़,3,पालक,1,पालक के नमक पारे,1,पालक बडी,1,पाश्चात्य संस्कृति,1,पिता,2,पुण्य,2,पुरानी मान्यताएं,1,पुलवामा हमला,1,पूडी,1,पूरी,1,पेढे,1,पैड्मैन,1,पैनकेक,1,पैरेंटीग,1,पोर्न मूवी,1,पोषण,1,पोहा,2,पोहे के कुरकुरे,1,प्याज,3,प्याज की चटनी,1,प्यार,1,प्यासा कौआ,1,प्रत्यूषा,1,प्रद्युम्न,1,प्रसन्न,1,प्राणियों से सीख,1,प्रियंका रेड्डी,1,प्री वेडिंग फोटोशूट,1,फर्रुखाबाद,1,फल,1,फल और सब्जी खरीदने से पहले,1,फलाहार,1,फल्लिदाने,1,फादर्स डे,2,फूल गोभी के परांठे,1,फेसबुक,2,फैशन,1,फ्रिज,1,फ्रिज में सब्जी,1,फ्रेंडशीप डे,1,फ्रेंडशीप डे शायरी,1,बकरीद,1,बची हुई सामग्री का उपयोग,1,बच्चे,8,बच्चे की ज़िद,1,बच्चें,1,बछबारस,1,बटर,1,बड़ा कौन?,1,बढ़ती उम्र,1,बदला,1,बधाई संदेश,4,बरबादी,1,बर्फी,2,बलात्कार,9,बहू,2,बाजरा,1,बाल दिवस,1,बाल शोषण,2,बाहर का खाना,1,बिमारियों की असली वजह,1,बिल्ली के गले में घंटी,1,बिस्किट,1,बिस्कुट,1,बुढ़ापा,1,बुर्ज 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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: क्या मंदिरों में ड्रेस कोड होना चाहिए??
क्या मंदिरों में ड्रेस कोड होना चाहिए??
ईश्वर हर जगह मौजुद है। बड़े-बड़े मंदिरों में भी और छोटे-छोटे मंदिरों में भी। फिर क्यों सिर्फ बड़े-बड़े मंदिर वाले अपने -अपने मंदिरों में ड्रेस कोड लागु करवाना चाह रहे है??
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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