अस्पतालों में बच्चों की मौत के लिए कौन हैं जिम्मेदार???

अस्पतालों में बच्चों की मौतें; मौतें न होकर मिट्टी के खिलौने टूट रहे हो...अरे भई, खिलौने भी टुटते हैं तो दिल में दर्द होता हैं...ये तो जीते-जागते बच्चे थे! कौन हैं इन मौतों का जिम्मेदार?

अस्पतालों में बच्चों की मौत के लिए... हम सब हैं जिम्मेदार!!


इन ख़बरों पर गौर कीजिए...
दिल्ली के शालिमार बाग स्थित मैक्स अस्पताल ने जीवित बच्चे को मृत बताया!
गोरखपुर के BRD अस्पताल में 36 बच्चों की मौत!
फर्रुखाबाद में 49 बच्चों की मौत!!
• झारखंड के दो बड़े अस्पतालों में पिछले पांंच महीनों के अंदर 300 बच्चों की मौत!!!

ऐसी दिल दहलाने वाली और दिमाग को झंझोड़ने वाली ख़बरे पढ़ कर और देख-सुन कर भी हम सब इतने शांत कैसे और क्यों है, यहीं बात मेरी समझ में नहीं आ रही हैं...!! जैसे इन बच्चों की मौतें; मौतें न होकर मिट्टी के खिलौने टूट रहे हो...अरे भई, खिलौने भी टुटते हैं तो दिल में दर्द होता हैं...ये तो जीते-जागते बच्चे थे! किसी माँ-बाप के जीगर के टुकड़े...कितनी नाजों से पाला होगा उनके माँ-बाप ने उन्हें...उनकी मौत पर कितने खून के आँसू रोएं होंगे वे...!! सचमुच कभी-कभी लगता हैं कि कितने संवेदनाहीन हो गए है हम। यदि ये घटना हमारे अपने बच्चे के साथ होती या किसी बड़े नेता के बच्चे के साथ होती तब शायद हमारे या बड़े-बड़े नेताओं के कान पर जू रेंगती! अभी तो सभी के लिए इन बच्चों की मौतें सिर्फ़ आंकड़े बन कर रह गई हैं। यहां इतने मरे...और वहां उतने मरे...बस! कुछ समय पहले जापान के एक ख़बर की हमारे मीडिया में बहुत चर्चा थी। जिसके अनुसार जापान में सिर्फ़ एक बच्ची स्कूल जा सके इसलिए स्पेशल एक ट्रेन उसके गांव तक आती थी। सिर्फ़ एक बच्ची के लिए ट्रेन! इतना महत्व दिया जाता हैं जापान में देश की एक आम बच्ची को और हमारे यहां सैकडों बच्चों के जान की कोई किंमत नहीं हैं। यहां पर सभी लोग सिर्फ़ एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में व्यस्त हैं।

सरकार की विफलता
हम इक्किसवी सदी में जी रहें हैं। हम तेजस जैसे लड़ाकू विमान बना रहे हैं, पनडुब्बियां बना रहे हैं। मुंबई में 3600 करोड़ की लागत से शिवाजी की मूर्ति और गुजरात में 2500 करोड़ की लागत से सरदार पटेल की मूर्ति बन रही हैं। लेकिन हमारे अस्पतालों में जीवनोपयोगी ज़रुरी ‘ऑक्सिजन’ की कमी हैं। निस्संदेह ये दोनों हमारे गौरव थे और सदा रहेंगे भी। इनका मोल इन पैसों से भी बढ़ कर था। लेकिन यह भी उतना ही सच हैं कि ये दोनों महापुरुष यदि आज जिंदा होते तो यहीं कहते कि अस्पताल बनाओं और अस्पतालों में ज़रुरी चीजें मुहैया करवाओ। वास्तव में अस्पतालों में बच्चों की मौतें सरकार की विफलता दर्शाती हैं। ये मौतें सभी अंतरिक्ष उडानों और मंगल यान के माथे पर लिखी हुई शर्म हैं। ये मौतें ‘सीरियल मर्डर’ करने का पुख्ता इंतजाम हैं। जिसमें, अस्पतालों ने इन बच्चों के हत्या की सुपारी ली हुई हैं। विकास के दावों एवं अच्छे दिनों के लुभावने सपनों के बावज़ूद यदि ऑक्सीजन की कमी की वजह से या डॉक्टरों की लापरवाही की वजह से इतने बच्चों की मौतें होती हैं तो धिक्कार हैं ऐसे विकास पर...धिक्कार हैं ऐसे अच्छे दिनों पर! नहीं चाहिए देश को ऐसा विकास और ऐसे अच्छे दिन!! 

हम भी हैं जिम्मेदार
अस्पतालों में इन बच्चों की मौत के लिए क्या सिर्फ़ सरकार और अस्पतालों के डॉक्टर और अस्पताल प्रबंधन ही ज़िम्मेदार हैं? क्या आप, मैं और हम सब कहीं न कहीं इन मौतों के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं? हम हमारी उर्जा, हमारा पैसा और हमारा वक्त जिन कामों में लगाना चाहिए उन कामों में न लगा कर व्यर्थ के कामों में लगा रहे हैं। उसी का परिणाम हैं कि एक बलात्कारी और शराबी राम रहीम...बाबा राम रहीम बन जाता हैं; लालू जैसे लोग अरबपति बन जाते हैं; भ्रष्टाचारी लोग चुनाव जीत कर संसद में जा बैठते हैं। कटप्पा ने बाहुबली को क्यो मारा यह राष्ट्रीय सवाल बन जाता हैं लेकिन इतने बच्चों की मौतों पर पूरे राष्ट्र को जैसे सांप सुंघ जाता हैं। क्या हो गया हैं मेरे देश को? एक बलात्कारी बाबा को बचाने लाखों लोग सड़को पर उतर आते हैं और बाबा को सजा सुनाते ही लोग गुस्से से पागल होकर करोड़ों की संपत्ति का विनाश कर देते हैं। सरकारी संपत्ति को हानी पहुँचाते समय यह भी नहीं सोचते कि वास्तव में सरकारी संपत्ति सरकार की कहलाती ज़रूर हैं लेकिन उस संपत्ति के असली हकदार देशवासी स्वयं हैं। देशवासियों के खून-पसीने की कमाई से सरकारी संपत्ति का निर्माण होता हैं। यह बात हम सभी को मालुम होते हुए भी गुस्से में पागल होकर हम हमारी ही संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं।

जापान की ही एक दूसरी ख़बर पढ़ने में आई थी कि जापान के इतिहास में पहली रेल दुर्घटना तब हुई जब ड्रायव्हर को पता चला कि ट्रेन एक मिनट देरी से चल रही हैं। उसे डर लगा कि इस देरी के लिए उससे जबाब मांगा जाएगा! इस डर के चलते उसने ट्रेन की स्पीड तय मानको से ज्यादा बढ़ा दी और परिणामस्वरूप रेल दुर्घटना हो गई। मेरा ये कहने का तात्पर्य यह कदापि नहीं हैं कि डॉक्टरों पर ऐसा दबाव हो कि उनसे मरीज़ की जान ख़तरे में आ जाए। लेकिन डॉक्टरों पर और अस्पतालों के प्रबंधकों पर कुछ तो दबाव हो ताकि वे अपना काम ज़िम्मेदारी से करें!

हम सब अभी चूप हैं क्योंकि ये बच्चे हमारे नहीं हैं। आवाज उठाइए... नहीं तो कल ये हादसे हमारे बच्चों के साथ भी हो सकते है।

मेरे देशवासियों, अब समय आ गया हैं कि हमें सहीं बातों के लिए आगे आना होगा। देश का हर बच्चा चाहे वह किसी भी जाती का हो और कितना भी ग़रीब हो...उसके जान की फ़िक्र पूरे देश को करनी होगी। यदि सरकार के पास और अस्पताल प्रबंधकों के पास अस्पताल में जरुरी सामान के लिए पैसा नहीं हैं तो मंदिरों की तर्ज पर अस्पतालों के सामने भी दानपेटी रखने कि शुरवात करनी होगी ताकि दानदाताओं द्वारा दिए हुए दान से हर मरीज़ की जान बच सके...

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COMMENTS

BLOGGER: 12
  1. बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं | एक बच्चे की मौत पूरे परिवार को कभी न भरने वाला जख्म दे देती है |आश्चर्य है की इस पर आम जनता मौन है |आपने सही कहा ज्योति जी कि केवल अखबार पढ़ कर अपने घर में शोक् मना लेने स कुछ नहीं होगा ... जनता को बच्चों के लिए सड़कों पर आना होगा | अभी सरकार ने एक अच्छा कदम उठाते हुए मैक्स (दिल्ली ) का लाइसेंस रद्द किया है | ऐसे हजारों कठोर कदम उठाने की जरूरत है ... ताकि बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य के लिए अस्पताल ले जाते समय माता -पिता के मन में खौफ न हो | .... एक जरूरी आलेख

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (11-12-2017) को "स्मृति उपवन का अभिमत" (चर्चा अंक-2814) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत सटीक....
    सही कहा हम सब जिम्मेदार हैं इन हादसों के लिए....
    ऐसे हादसों के बाद भी हम मौन हैंं।
    बहुत ही दमदार, प्रभावशाली आलेख....

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  4. कितना संवेदनाहीन हो गया है हमारा समाज,यह स्थिति हमें किस ओर ले जा रही है विचार किये बिना निस्तार नहीं.

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  5. असल में पूरा सिस्टम ... समाज की दिशा और हम खुद जिम्मेदार हैं ... नैतिकता कहीं नार नहीं आती ... भाग रहे हैं सब एक दूजे के ऊपर चढ़ते हुए ...

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  6. सत्ता के केंद्रों का संवेदनाविहीन होते जाना , अति व्यावसायिकता की आंधी , समाज का संवेदनशील मुद्दों पर चालाक चुप्पी धारण करना और उदासीनता आदि ऐसी परिस्थिति के निर्मित होने में सहायक हैं। एक ओर सरकारें इवेंट मैनेजमेंट पर अरबों रुपये बहाती है दूसरी ओर स्वास्थ्य क्षेत्र का बज़ट काम किया जाता है। मुद्दे की बात इतनी सी है कि हमने जिन्हें व्यवस्था सौंप दी है वे अक्षम हैं हमारा जीवन में सहूलियतें ला पाने में। हमने बेशर्मी से व्यवस्था को अपना बचाव करते हुए देखा और सुना है। विचारणीय व सारगर्भित लेख।

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  7. आदरणिया ज्येष्ठा ज्योति देहलीवाल जी आज बहुत दिनो बाद आपके ब्लॉग पर आया हूँ अस्पतालो मे मासूम बच्चो की मौतो पर लेख पढ़ा निश्चित ही हृदय विदारक है ये स्तिथीया ।। मै बी.जे.पी.का सपोटर होते हुवे भी सरकार की इस कमी पर सरकार की निंदा करता हूँ ।। आजकल मैने लिखना इस लिये छोड़ दिया कि --
    बहुत हो चुका अंधो के आगे
    हर रोज मेरा वो रोना
    कलम घिस गयी लिखते लिखते
    बचा ना कोई कोना
    पढ़े लिखे अनपढ़ गँवार से
    बोलो फिर क्या कहना
    बहरो के आगे गीतो को समझो
    बिन मतलब है गाना

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  8. सच में हमारे देश में मूलभूत सुविधाओं की अब भी बहुंत कमी है और हम कह रहे हैं देश विकास कर रहा है। पहले घर को बनाया जाता है,फिर सजाया जाता है। घर की दीवारें कच्ची हैं, प्लास्तर उखड़ा है, छत टपक रही है और हम उसे आधुनिक उपकरणों से सजा रहे हैं तो हम सा मूर्ख कोई और नहीं ....

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  10. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: अस्पतालों में बच्चों की मौत के लिए कौन हैं जिम्मेदार???
अस्पतालों में बच्चों की मौत के लिए कौन हैं जिम्मेदार???
अस्पतालों में बच्चों की मौतें; मौतें न होकर मिट्टी के खिलौने टूट रहे हो...अरे भई, खिलौने भी टुटते हैं तो दिल में दर्द होता हैं...ये तो जीते-जागते बच्चे थे! कौन हैं इन मौतों का जिम्मेदार?
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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