बहनों, ऋषि पंचमी का व्रत करने से पहले जरा सोचिए...

क्या आप ऋषि पंचमी का व्रत करती हैं? यदि हां, तो व्रत करने से पहले यह लेख ज़रुर पढ़िए...!

बहनों, ऋषि पंचमी का व्रत करने से पहले जरा सोचिए...
क्या आप ऋषि पंचमी का व्रत करती हैं? यदि हां, तो व्रत करने से पहले यह लेख ज़रुर पढ़िए...! कोई भी व्रत करने के पिछे मुख्य कारण होता है, व्रत करने वाले इंसान के मन की श्रद्धा एवं आस्था और उस परिवार की आज तक वो व्रत करने की परिपाठी। वैज्ञानिक कारण जैसे शरीर स्वस्थ रहने के लिए भी व्रत किए जाते हैं लेकिन ज्यादातर व्रत पहले वाले कारणों से ही किए जाते हैं। हर व्रत की कहानी में वो व्रत क्यों करना चाहिए और उस व्रत के करने से क्या-क्या फ़ायदे होते हैं यह बतलाया जाता हैं। आज हम बात करेंगे ऋषि पंचमी के व्रत की।

ऋषि पंचमी के व्रत की दो-तीन कथाएं हैं। दोनों-तीनों कथाओं के अनुसार माहवारी के समय महिलाएं अपवित्र हो जाती हैं। इसलिए उन्हें धार्मिक कार्यों में भाग नहीं लेना चाहिए, रसोई घर में नहीं जाना चाहिए और घर के बर्तनों को एवं कपड़े आदि को भी हाथ नहीं लगना चाहिए। मतलब माहवारी के समय महिलाओं को अपने स्वयं के घर में अछुत बन कर रहना चाहिए। चाहे कितनी भी प्यास क्यों न लगी हो इस समय महिलाओं ने अपने हाथ से पानी लेकर नहीं पिना चाहिए। यदि माहवारी के समय इन नियमों का पालन करते वक्त अनजाने में उनसे कोई गलती हुई हो...तो ऋषी पंचमी का व्रत कर सप्तऋषि की पूजा करके महिलाएं उस दोष से या उस पाप से मुक्ति पा सकती हैं।

जरा सोचिए...क्या सचमुच में माहवारी के समय हम अपवित्र हो जाती हैं? हम जब कोई गलत काम करते हैं तब उसका दोष या पाप हमें लगता हैं। माहवारी आने में हमने कौन सा गलत काम किया? उलट माहवारी के समय कई महिलाओं को कितने असहनीय दर्द से गुजरना पड़ता हैं, उस दर्द का एहसास सिर्फ़ वो महिला ही समझ सकती हैं। ये धर्म के ठेकेदार उस दर्द को नहीं समझ सकते! एक तो शारीरिक असहनीय तकलीफ़ और उपर से माहवारी में अछुत बन कर रहना और साथ ही में इस ग्लानी में जीना कि माहवारी आने से हम से कोई बहुत बड़ा पाप हो गया हैं! नारी के सहनशक्ति की यह इंतहा ही हैं। यदि हम महिलाओं का बस चले तो कोई भी महिला माहवारी से होना नहीं चाहेगी! सबसे दुखदाई बात यह हैं कि पढ़ी-लिखी महिलाएं भी इन बातों पर विश्वास करके अपनेआप को गुनहगार समझ कर यह पाप धोने के लिए ऋषी पंचमी का व्रत करती हैं!

जरा सोचिए, यदि किसी महिला को माहवारी नहीं आई तो वो 'माँ' भी नहीं बन पाएगी! इस सच्चाई की ओर हम जान-बुझ कर आंखे क्यों बंद कर देते हैं? यदि कोई महिला 'माँ' नहीं बन सकी तो समाज उसे ‘बांझ’ कह कर ताने मार-मार कर जीते जी मार देता हैं। समाज उसका जीना हराम कर देता हैं। एक महिला ही यह समझ सकती हैं कि 'माँ' न बन पाने का दु:ख क्या होता हैं? समाज से, परिवार से उसे कैसे-कैसे ताने सहने पड़ते हैं? कई बार तो ऐसी महिला को उसका पति तलाक तक दे देता हैं! अब आप ही बताइए कि यदि नारी के जीवन की पूर्णता ही उसके 'माँ' बनने में हैं तो जिस माहवारी के कारण वो 'माँ' बन सकती हैं, वो माहवारी अपवित्र कैसे हो सकती हैं? जिस रज से इंसान (चाहे वह नर हो या नारी) का शरीर बनता हैं उसे ही हम अपवित्र कैसे मान सकते हैं? जरुरत सिर्फ़ इस बात की हैं कि इस समय नारी को थोड़ा सा आराम मिले एवं वो साफ़सफाई का ध्यान रखें।

अत: बहनों, माहवारी आने से हमें कोई दोष नहीं लग सकता हैं। वास्तव में रजस्वला होना या माहवारी आना यह प्रकृती का नारी को दिया हुआ बहुत बड़ा वरदान हैं जिसके कारण ही नारी माँ बन सकती हैं। इसे अपवित्र मान कर ‘माँ’ को कलंकित न करें! बहनो, नारी का पूरा अस्तित्व और उसका पूरा नारित्व जिस माहवारी से जुड़ा हैं वो माहवारी कभी भी अपवित्र नहीं हो सकती। 

अत: जागो बहनों...जागो! क्या हम महिलाएं जानबुझकर माहवारी से होती हैं? दुनिया का यह एकमात्र पाप हैं जो महिलाएं करती तो नहीं हैं लेकिन उन्हें पापी मान कर दंडित भी किया जाता हैं!! बहनों, जब हमने पाप किया ही नहीं तो उस पाप के निवारण हेतु व्रत कैसा? एक बार फ़िर से यहीं कहना चाहती हूं कि बहनो, ऋषि पंचमी का व्रत करने से पहले एक बार सोचिएगा ज़रूर कि क्या माहवारी से होकर आपने कोई गलती या पाप किया हैं?

यह मेरे अपने विचार हैं। जरुरी नहीं कि आप इससे सहमत ही हो। बहनो, आपको क्या लगता हैं कि माहवारी से होकर हमने कोई बहुत बड़ा पाप किया हैं जिसके निवारण हेतु हमें ऋषि पंचमी का व्रत करना चाहिए? 

Keywords: Rishi Panchami vrat, Fast, menstruation,  superstition beliefs with scientific reasons, menstrual cycle in hindi, menstrual period, science and superstitions

COMMENTS

BLOGGER: 17
  1. बिल्कुल सही बात ।ऐसे अंधविश्वासपूर्ण और प्रतिगामी व्रत का विरोध किया जाना चाहिए । व्रत त्यौहार हमारी खुशी के लिए होने चाहिए न कि दकियानुसी विचारों को बढ़ावा देने के लिए ।

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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. आदरणीय ज्योति जी आपने बिल्कुल सत्य बात लिखी है ,
    जो प्रकृति का नियम है उसे अपवित्र कैसे माना जा सकता है । मैं आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ।

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  4. जी, हाँ ज्योति जी हम पूरी तरह से आपसे सहमत,और हम ये व्रत करते भी नहीं।आपकी साहसिक एवं सराहनीय लेख के लिए आभारी है हम।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (24-08-2017) को "नमन तुम्हें हे सिद्धि विनायक" (चर्चा अंक 2706) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. बिलकुल सही कह रही है आप | माहवारी होना पाप नहीं है | हम किसी ऐसे व्रत का समर्थन कैसे कर सकते हैं जिसमें स्त्री के नैसर्गिक चक्र को पाप की संज्ञा दी जाए | प्रचिलित अंध विश्वास के प्रति आँखें खोलती आपकी पोस्ट के लिए बहुत शुक्रिया ज्योति जी .... वंदना बाजपेयी

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  7. बहुत ही सारगर्भित लेख लिखा है आपने....
    कई जगहों पर यह रिवाज देखने को मिलता है...माहवारी को छूत माना जाता है...
    कहीं तो उन दिनों बहू को अपने कमरे में भी नही जाने दिया जाता ...जमीन पर सुलाया जाता है...दुख की बात ये है कि बेटियों पर यह नियम लागू नहीं होता..... आपका लेख पढकर शायद स्थिति में कुछ सुधार हो ।

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    1. सुधा, इस नियम के मामले में जहां तक मैं ने अपने आस-पास देखा हैं बहू और बेटी दोनों पर समान मात्रा में ही लागू होता हैं। आपकी टिप्पणी पढ़ कर ही दिमाग में आया कि शायद यह एकलौता नियम हैं जो बहू और बेटी दोनों पर समान मात्रा में लागू होता हैं।

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  8. सार्थक पोस्ट 😊🙏कई उपवास और प्रथाएं ऐसे है जो बस परिपाटी की तरह ढोये जा रहे है ।

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  9. प्रथाओं/परम्पराओं में व्याप्त अंधविश्वासों के प्रति समयानुकूल विचार की स्थापना करता विचारणीय लेख।

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  10. समय तय करता है प्रथा की प्रासंगिकता ...

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  11. हाँ, सही कहा आपने ये इकलौता नियम है जो बहू और बेटियों पर समान रूप से लागू होता है। पता नहीं वैज्ञानिक सच्चाइयों को हम कब तक नकारते रहेंगे। मैं आपके विचारों से सहमत हूँ।

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  12. बेनामी2/7/18, 7:53 am

    Ye aap galat kah rahe ho,me sahamant nahi Hun ,aap ishwar ke khilaf ja kar sabko narak me bejne ki vyvastha kar rahe ho,aap ko to muje lagta hai ki aap ishwar ko yani ke bhagwan ko mante nahi ho,aap nastik lagta ho.

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    उत्तर
    1. ईश्वर हैं और वो बहुत बड़ी शक्ति हैं। लेकिन उसे व्रत उपवास के आडंबर की जरूरत नहीं हैं। दूसरी बात यह हैं कि जब माहवारी से होकर नारी ने कोई गुनाह किया ही नहीं हैं तो उसके निवारण हेतु व्रत उपवास क्यों?

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: बहनों, ऋषि पंचमी का व्रत करने से पहले जरा सोचिए...
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