ओ माय गॉड...तुमने निचली जाती की महिला को काम पर रखा!!!

जब अलग-अलग क्षेत्रों के ढ़ेर सारे निचली जाती के लोगों की सेवाएं लेते वक्त हमारा धर्म भ्रष्ट नहीं होता तो फ़िर सिर्फ़ निचली जाती की महिला को काम पर रखने पर हमारा धर्म भ्रष्ट कैसे होता है?

ओ माय गॉड...तुमने निचली जाती की महिला को काम पर रखा!!!
कुछ दिनों पहले मैंं ने निचली जाती की महिला को काम पर रखा। धीरे-धीरे यह बात मेरी सहेलियों को पता चल गई। भई, कामवाली बाई के बारे में सबसे पहले सहेलियों को ही तो पता चलेगा न! मेरे पीठ पिछे वो मेरे बारें में बातें बनाने लगी। लेकिन वो सहेलियाँ ही क्या, जो सिर्फ़ पीठ पिछे बातें करें! सहेलियाँ तो आमने-सामने मिलने पर भी खुलकर बात कर सकती है। अत: जैसे ही हम लोग मिले, सभी सहेलियाँ मिलकर मेरी खिंचाई करने लगी। वो मेरी ओर कुछ अजीब सी नजरों से देखने लगी। जैसे मैंने बहुत बड़ा गुनाह किया हो!
“ओ माय गॉड...तुमने निचली जाती की महिला को काम पर रखा!!!”
मैंने पूछा,“क्यों, क्या हुआ? मुझे कामवाली बाई की जरुरत थी। इस महिला का स्वभाव बहुत अच्छा है, ये काम बहुत साफ़-सफ़ाई से और अच्छा करती है। ऐसे में इसे काम पर रखने में क्या अड़चन है?”
“अरे...वो सब तो ठीक है। लेकिन जात-पात भी कोई मायने रखती है कि नहीं? हम तो चाहे कुछ भी हो जाएं...गंदे बर्तन और कपड़ों का ढ़ेर पड़ा रहे तो रहे...घर गंदा रहे तो रहे...लेकिन हम भुल कर भी निचली जाती वाली को काम पर नहीं रखते!”
“आखिर निचली जाती के लोगों में ऐसी क्या खराबी है, जो आप लोग उन्हें काम पर नहीं लगाते?”
"ख़राबी निचली जाती के लोगों में नहीं है। ख़राबी उनकी जात में है। निचली जाती के लोग अच्छे नहीं होते। हमारे खानदान में आजतक किसी ने उन्हें काम पर नहीं रखा। इसलिए हमें भी हमारे बुजुर्गों के पदचिन्हों पर चलते हुए इन लोगों को काम पर नहीं रखना चाहिए।"
एक सहेली थोड़ी मुंहफट थी। वो कहने लगी,"थोड़ा सा पढ़-लिख लिए इसका ये मतलब नहीं होता कि हम हमारे संस्कार ही भुल जाएं। इन्हें काम पर रखने से धर्म भ्रष्ट होता है,समझी!"
“क्या तुम लोग होटल में खाना खाते हो?”
"हां...खाते है।"
“क्या होटल में खाना खाने से धर्म भ्रष्ट नहीं होता?”
“होटल में तो सभी लोग कभी न कभी खाना खाते ही है। होटल में खाना खाने से धर्म कैसे भ्रष्ट हो सकता है?”
“क्या आप में से किसी ने भी होटल के मालिक से कभी उसकी जात पूछी है? या यह खाना जिसने बनाया वो निचली जाती का तो नहीं है, यह पूछा है?”
''अं..ऐसा भी कभी पूछा जाता है क्या? होटल में तो सामान्यत: निचली जाती के ही लोग काम करते है।"
“अब आप लोग मुझे एक बात समझाइए, यदि होटल में निचली जाती के लोगों के हाथ का बना हुआ खाना खाने से धर्म भ्रष्ट नहीं होता तो फ़िर ये लोग जब हमारे घर में काम करते है तब हमारा धर्म कैसे भ्रष्ट हो सकता है?”
मेरे इस सवाल का उनके पास कोई जबाब नहीं था। एक सहेली ने कहा कि “वो चाहे कुछ भी हो लेकिन हमें निचली जातीवालों को काम पर नहीं रखना चाहिए, बस...!!”
अब इन लोगों को समझाने के लिए मेरे पास शब्द ही नहीं थे। क्योंकि समझाया उन्हें जाता है, जो समझना चाहे! उनकी धर्म भ्रष्ट होने की बात पर मुझे एक किस्सा याद आ गया।
माँ ने छह साल के बच्चे को पीटते हुए कहा,''नालायक! तू ने भंगी के घर की रोटी खाई, तू भी भंगी हो जाएगा। तू ने तो धर्म भ्रष्ट कर लिया।'' बच्चे ने मासुमियत से कहा,''माँ! मैने तो सिर्फ़ एक बार ही उनके घर की रोटी खाई और मैं ख़राब हो गया। लेकिन वे लोग तो हमारे घर की बची हुई रोटी बरसों से खा रहे हैं...मां, वो लोग ब्राम्हण क्यों नहीं हुए??''
जरा सोचिए,
• जिस मिट्टी के मटके का पानी हम पीते है, वो हो सकता है निचली जाती के लोगों ने बनाया हो।
• जो गाय या भैंस का दूध हम पीते है, उसे जो नौकर दुहते है वो निचली जाती के हो सकते है।
• जो फूलों का हार हम भगवान को चढ़ाते है, वो निचली जातीवाले ने बनाया हो सकता है।
• जो अनाज हम खाते है, वो अनाज पैदा करनेवाले भी निचली जाती के हो सकते है।
• अस्पताल में जिस डॉक्टर से हम इलाज करवाते है, कई बार वो डॉक्टर भी निचली जाती के रहते है।
• जिन बड़ी-बड़ी स्कुलों में हमारे बच्चे पढ़ते है, हो सकता है उनको पढ़ानेवाले अध्यापक निचली जाती के हो।
• बड़े-बड़े नेता, अभिनेता, खिलाड़ी जिनके साथ सेल्फी लेने में हम गौरवान्वित महसूस करते है, कई बार वे भी निचली जाती के रहते है।

जब इतने सारे निचली जाती के लोगों की सेवाएं लेते वक्त हमारा धर्म भ्रष्ट नहीं होता तो फ़िर सिर्फ़ निचली जाती की महिला को काम पर रखने पर हमारा धर्म भ्रष्ट कैसे होता है? जरा सोचिएगा ज़रुर...!!!!!!

Keywords: Maid, lower caste, Superstitious beliefs with scientific reasons, Blind belief, religion, 

COMMENTS

BLOGGER: 33
  1. अरे...वो सब तो ठीक है। लेकिन जात-पात भी कोई मायने रखती है कि नहीं? हम तो चाहे कुछ भी हो जाएं...गंदे बर्तन और कपड़ों का ढ़ेर पड़ा रहे तो रहे...घर गंदा रहे तो रहे...लेकिन हम भुल कर भी निचली जाती वाली को काम पर नहीं रखते!” गलत सोच है ये और विडम्बना ये है कि आज के ज़माने में भी !!

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  2. धन्यवाद ज्योंति जी । आपका एक और बेहतरीन लेख पढकर बहुत अच्छा लगा । आज कल लोग अपने आप को बनते तो बहुत एडवांस है लेकिन मानसिकता उनकी अभी भी पिछडी हुई है । हाल ही में मेरे पडोस मे रहने वाली आन्टी से भी मैने आया को लेकर ऐसे ही तुच्छ सोच वाली बात करते हुए सुना जबकि आन्टी महिला कॉलेज में पढाती है । उनकी बाते सुनकर मुझें बहुत बुरा लगा । उम्मीद है आप का यह लेख पढकर लोग अपनी सोच बदले ।

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    1. बबिता, इसी उम्मीद में तो यह लेख लिखा है।

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  3. बहुत ही सुन्दर ढंग से समझाया आपने की जात-पात ही सब कुछ नही वास्तव में हैम सब एक दूसरे के पूरक हैं ।

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  4. मेरे साथ भी ऐसा अनुभव हुआ है। आप कितना भी समझा लें वो बात समझने को राजी नहीं होते हैं। बस उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ी इस जात-पात के सामजिक कोढ़ से मुक्ति पा लेगी।

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  5. विकास जी, इसके लिए हमे ही प्रयत्न करने होंगे। क्योंकि होता यही है कि जब खुद के घर की बात आती है तो अच्छे अच्छे पढ़े लिखे भी दकियानूसी सोच दिखाने लगते है।

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  6. जिसके दिमाग में जात-पात, ऊँच-नीच का कीड़ा होता है वह जब-तब उसे काटता रहता है

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  7. These caste system has done and still doing much harm to our society!

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  8. माँ ने छह साल के बच्चे को पीटते हुए कहा,''नालायक! तू ने भंगी के घर की रोटी खाई, तू भी भंगी हो जाएगा। तू ने तो धर्म भ्रष्ट कर लिया।'' बच्चे ने मासुमियत से कहा,''माँ! मैने तो सिर्फ़ एक बार ही उनके घर की रोटी खाई और मैं ख़राब हो गया। लेकिन वे लोग तो हमारे घर की बची हुई रोटी बरसों से खा रहे हैं...मां, वो लोग ब्राम्हण क्यों नहीं हुए??''
    इसी बात पर तालियाँ.....

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  9. आप की उत्तम सोच ही अवश्य समाज में बदलाव ला सकती है...
    दिनांक 13/04/2017 को...
    आप की रचना का लिंक होगा...
    पांच लिंकों का आनंदhttps://www.halchalwith5links.blogspot.com पर...
    आप भी इस चर्चा में सादर आमंत्रित हैं...
    आप की प्रतीक्षा रहेगी...


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  10. बहुत अच्छी बात शेयर की है आपने.....
    परन्तु अब नीची जाति वालों के लिए आरक्षण होने की वजह से मुझे लगता है इन्हे छोटे मोटे काम की जरुरत ही नहीं रहेगी अब तो ये ही ऊँची जाति वालों को काम पर रखेंगे और मामला एकदम उलट जायेगा...
    जाति-पाति की इसी सोच के कारण योग्यता छोड़ आरक्षण अपनाया जा रहा है...
    जो देश के विकास में अवरोधक है....

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    1. सुधा, सही कहा तुमने कि जाति-पाति की इसी सोच के कारण योग्यता छोड़ आरक्षण अपनाया जा रहा है...! लेकिन वास्तव में हो यह रहा है आरक्षण के कारण जब निचली जाती के लोग बडे-बडे पदों पर बैठते है तो उंची जाती के लोग उनकी जी हुजरी करने तैयार हो जाते है। लेकिन जब घरों में निचली जाती की कामवाली बाई रखना हो तो इन्हें मंजूर नहीं होता।

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  11. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "नयी बहु - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  12. वाह !!ज्योति जी ,बहुत अच्छा विषय और लेख। इन सामाजिक बुराइयों की जडें बहुत गहरी हैं ,तथाकथित पढे लिखे लोग भी इन्ही विचारों से ग्रसित हैं। बदलाव तो लाना ही होगा ।

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  13. ज्योति जी बहुत शानदार लेख, अभी भी हमारा समाज जाति-धर्म के चक्कर में फसा हुआ है...आपके पोस्ट पढ़ने से उनकी आखें जरूर खुलेगा, ऐसी उम्मीद है...
    आपकी सबसे ज्यादा अच्छी बाते इसमें कही है...
    माँ ने छह साल के बच्चे को पीटते हुए कहा,''नालायक! तू ने भंगी के घर की रोटी खाई, तू भी भंगी हो जाएगा। तू ने तो धर्म भ्रष्ट कर लिया।'' बच्चे ने मासुमियत से कहा,''माँ! मैने तो सिर्फ़ एक बार ही उनके घर की रोटी खाई और मैं ख़राब हो गया। लेकिन वे लोग तो हमारे घर की बची हुई रोटी बरसों से खा रहे हैं...मां, वो लोग ब्राम्हण क्यों नहीं हुए??''

    वाह क्या तारिफ करूँ आपकी...बेहतरीन...

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    उत्तर
    1. हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद, जेपी जी।

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  14. समय के साथ बहुत कुछ बदला हैं । लेकिन अभी भी बदलाब की आवश्कता हैं। शायद बदलते - बदलते एक दिन हम सब जात - पात भुला कर एक साथ खाना खा रहें हो।

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  15. आदरणीय ,आपने समाज में जाति-पाती का झूठा मुखौटा पहनने वालों पर अच्छा कटाक्ष किया है ,इसके लिए आपको हृदय से धन्यवाद देता हूँ एवं मेरे लेख "जाति-धर्म का ध्वज" के लिये आपको आमंत्रित करता हूँ। आभार

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  16. बड़ाई का आधार जात पात, नस्ल या धन दौलत नही बल्कि इन्सान की अच्छाई, नेकनीयती और परहेज़गारी होती हे। बेशक बेहतरीन लेख।

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  17. वस्तुत : हम सब एक ही जाति से हैं "इंसान " इंसानियत के खिलाफ हर व्यवस्था पर पुनर्विचार होना चाहिए | एक सुलझे हुए लेख द्वारा आपने समाज को दिशा दी है ... बधाई

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  18. ये और कुछ नहीं बस हमारी घटिया मानसिकता है जिससे चलते हमारी सोच को कुंठा ग्रस्त कर रही है ... हम सब एक ही इंसान हैं ... एक ही ख़ून है सबका ... बुराई करने वाला
    इंसान बुरा है ...

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  19. गलत है लोगों की ये सोच, आज के प्रतिस्पर्धा के जमाने में काहे की जात पाँत...जो भी अच्छा काम करेगा उसे काम देने वालों की कमी नहीं। हम नहीं तो कोई और रखेगा उसे काम पर लेकिन तब हम क्या कहलाएँगे ये भी सोचना होगा.प्रेरक आलेख !

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  20. इंसानियत की कोई जात पात नहीं होती, आप का यह पोस्ट पढकर लोगों को अपनी सोच में बदलाव ज़रूर लाना चाहिए

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  21. इस टिप्पणी को लेखक ने हटा दिया है.

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  22. लोगों की मसिकता न जाने कब बदलेगी...अपने एक बहुत अच्छा प्रयास किया समाज कि सच्चाई को सामने लाने की.... एक तरफ तो किसी न किसी ढंग से हम सबके हाथ लगा हुआ अनाज खा रहे हैं, घर में प्रयोग किया जाने वाला कोई भी सामान न आने कितने हाथों से होकर गुजरता होगा... इस प्रकार तो नीची जाती के लोगों से दूर रहें वाले लोगों को जंगल में अकेले रहना चाहिए... बहुत अच्छा जवाब दिया है आपने खोखले रिवाजों को मन ने वाले समाज को.... बहुत बढ़िया लेख....

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  23. निचली जाती Apni Khud Ki जाती निचली Hai

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  24. आपका लेख बहुतों की आँखें खोल देगा।

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  25. माँ एक ऐसी इंसान होती है जो अपने बच्चे के सारे दर्द को खुद के अंदर समा लेती है। Maa Ka pyar Status Thank You Sir.

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  26. इस टिप्पणी को ब्लॉग के किसी एडमिन ने हटा दिया है.

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'रेप प्रूफ पैंटी',1,#मीटू अभियान,1,#साड़ीट्विटर,1,14 नवम्बर,1,15 अगस्त,3,25 दिसम्बर,1,26 जनवरी,1,5000 रुपए किलों का गुड़,1,8 मार्च,4,अंंधविश्वास,1,अंकुरित अनाज,1,अंगदान,1,अंगुठी,1,अंगूर,1,अंगूर की लौंजी,1,अंगूर की सब्जी,1,अंग्रेजी,2,अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस,6,अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस,1,अंतिम संस्कार,1,अंधविश्वास,21,अंधश्रद्धा,18,अंधश्रध्दा,3,अंश,1,अग्निपरीक्षा,1,अग्रवाल,1,अग्रसेन जयंती,1,अग्रसेन जयंती की शुभकामनाएं,1,अचार,13,अच्छी पत्नी,1,अच्छी पत्नी चाहिए तो...,1,अच्छे काम,1,अजब-गजब,3,अजय नागर,1,अतित,1,अदरक,1,अदरक का चूर्ण,1,अदरक-लहसुन पेस्ट,1,अनमोल वचन,10,अनरसा,1,अनुदान,1,अनुप जलोटा,1,अनोखी शादी,1,अन्न,1,अन्य,32,अन्याय,1,अपमान,1,अपेक्षा,1,अप्पे,4,अमरुद,1,अमरूद की खट्टी-मीठी चटनी,1,अमीरी,1,अमेजन,1,अरबी,1,अरुणा शानबाग,1,अरुनाचलम मुरुगनांथम,1,अलगाव,1,अवधेश,1,अवार्ड,2,अशोक चक्रधारी,1,असली हीरो,22,अस्पताल,1,अस्पतालों में बच्चों की मौत,1,आंवला,8,आंवला कैंडी,1,आंवला चटनी,1,आंवला मुरब्बा,1,आंवला लौंजी,1,आंवले का अचार,1,आंवले का शरबत,1,आंवले की गटागट,1,आइसक्रीम,1,आईसीयू ग्रेंडपा,1,आग,1,आज के जमाने की अच्छाइयां,1,आजादी,2,आज़ादी,1,आतंकवादी,2,आत्महत्या,5,आत्मा,1,आदित्य तिवारी,1,आम,10,आम का अचार,1,आम का पना,2,आम का मुरब्बा,2,आम की बर्फी,1,आम पापड़,1,आयशा खान,1,आयशा सुसाइड साबरमती,1,आरओ,1,आरक्षण,3,आरती मोर्य,1,आलू,6,आलू की पापडी,1,आलू की मठरी,1,आलू की सब्जी,1,आलू को स्टोर करना,1,आलू चाट पराठा,1,आलू पोहा अप्पे,1,आलू प्याज के स्टफ्ड पकोड़े,1,इंसान,2,इंसानियत का पाठ,1,इंस्टंट डोसा,2,इंस्टंट मावा,1,इंस्टंट स्नैक्स,1,इंस्टट ढोकला,1,इंस्टेंट कलाकंद बर्फी,1,इंस्टेंट कुल्फी,1,इंस्टेंट मिठाई,1,इडली,3,इन्डियन टाइम,1,इमली,1,इरोम शर्मिला,1,ईद,1,ईश्वर,7,ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना,1,ईसा मसीह,1,उटी,1,उपमा,3,उपवास,1,उपवास का हांडवो,1,उपवास की इडली,1,उपहार,2,उमा शर्मा,1,उम्र,1,उम्र का लिहाज,1,ऋषि पंचमी,1,एक सवाल,1,ऐनी दिव्या,1,ऐश ट्रे,1,ऐस्टरॉइड,1,ऑनलाइन,1,ओट्स,1,ओट्स वेजिटेबल ढोकला,1,ओरैया,1,और इज्जत बच गई,1,औरंगाबाद हादसा,1,कंघा,1,कंसन्ट्रेट आम पना,1,कच्चे आम,1,कच्चे आम का चटपटा पापड़,1,कछुआ,1,कटलेट्स,1,कढ़ी,1,कद्दु,1,कद्दु के गुलगुले,1,कद्दू,1,कद्दू का बेसन,1,कन्यादान,3,कबीर सिंह मूवी,1,कम 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दुकान,1,शर्बत,1,शर्म,3,शवयात्रा,1,शहद,1,शादी,8,शादी की खरेदी,1,शादी की फ़िजूलखर्ची का बिल,1,शादी के सालगिरह की शुभकामनाएं,1,शादी-ब्याह,3,शायरी,9,शावर,1,शाहिद कपूर,1,शिक्षक दिन,2,शिक्षक दिवस पर शायरी,1,शिक्षा,5,शिमला मिर्च,1,शिवपुरी,1,शिवलिंग,1,शुद्ध शहद की पहचान,1,शुभ मुहूर्त,1,शुभ-अशुभ,4,शुभकामना संदेश,1,शुभम जगलान,1,श्राद्ध,3,श्राद्ध का खाना,1,श्रीकृष्ण,3,श्रेष्ठता,1,संत निकोलस,1,संसद,1,संस्कार,1,संस्मरण,10,सकारात्मक पहल,2,सच बोलने की प्रेरणा,1,सजा मुझे क्यों,1,सतबीर ढिल्लो,1,सपना,1,सफलता,1,सफेद बाल,1,सब्जियों का अचार,1,सब्जियों की कांजी,1,सब्जी,18,समय,1,समाजसेवा,2,समाजिक,1,समाधान,1,समावत चावल,3,समोसा,1,सर के बाल,1,सलाद,2,ससुराल,2,सस्ते कपड़े,1,सहजन,1,सहजन/मुनगा की कढ़ी,1,सहशिक्षा,1,सांता क्लॉज,1,सांप,1,सांभर वडी,1,सांवला या काला रंग,1,साउथ इंडियन डिश,3,साक्षात्कार,5,सागर में ज्वार,1,सातवीं सालगिरह,1,साफ-सफाई,1,साबुदाना,3,साबुदाना के अप्पे,1,साबुदाना पापड़,2,साबुदाने लड्डू,1,साबुन,1,साबूदाना,3,साबूदाना खिचड़ी,1,साबूदाना वड़ा,1,सामाजिक,90,सामाजिक 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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: ओ माय गॉड...तुमने निचली जाती की महिला को काम पर रखा!!!
ओ माय गॉड...तुमने निचली जाती की महिला को काम पर रखा!!!
जब अलग-अलग क्षेत्रों के ढ़ेर सारे निचली जाती के लोगों की सेवाएं लेते वक्त हमारा धर्म भ्रष्ट नहीं होता तो फ़िर सिर्फ़ निचली जाती की महिला को काम पर रखने पर हमारा धर्म भ्रष्ट कैसे होता है?
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
https://www.jyotidehliwal.com/2017/04/O-my-God-tumne-nichli-jati-ki-mahila-ko-kam-par-rkha.html
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