क्या महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए??

महिला अत्याचारों पर लगाम कसने हेतु महिला आरक्षण की बात की जाती है। लेकिन हमने कभी सोचा है कि क्या आरक्षण मिलने भर से महिलाओं की स्थिति सुधर जाएगी या उनके प्रति हो रहे अत्याचारों में कमी आ जाएगी?


 क्या महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए??

 क्या महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए??
सदियों से दोषपुर्ण सामाजिक अव्यवस्थाओं की शिकार महिलाओं के कल्याण हेतु, उन्हें मुख्य धारा में जोड़ने हेतु एवं महिला अत्याचारों पर लगाम कसने हेतु महिला आरक्षण की बात की जाती है। लेकिन हमने कभी सोचा है कि क्या आरक्षण मिलने भर से महिलाओं की स्थिति सुधर जाएगी या उनके प्रति हो रहे अत्याचारों में कमी आ जाएगी?

आज तक का इतिहास
• हमारे पुरुषप्रधान समाज ने हजारों वर्षों से बगैर किसी महिला आरक्षण के ऐसी महिला नेत्रियां प्रदान की है, जिन्हें अनुकरणीय मान नारी इतिहास गौरवान्वित है। कस्तूरबा गांधी, सावित्रिबाई फुले, कमला चट्टोपाध्याय, विजयालक्ष्मी पंडित और कैप्टन लक्ष्मी सहगल आदि कुछ ऐसे नाम है जिन्हें कभी भी किसी आरक्षण की जरुरत नहीं पड़ी। ये उस कालखंड की विभुतियां है जब महिलाओं में साक्षरता का प्रतिशत अत्यंत ही कम था। बड़े-बड़े घुंघटों के बीच समाज ने उन्हें परदे से ढक रखा था। इस दृष्टिकोण से जब आज की पढ़ी-लिखी नारी आरक्षण की वकालत करती है तो आश्चर्य होता है।

• पंचायत समितियों में एवं स्थानीय निकायो में आरक्षण से जो महिलाएं राजनीति में आई है उनमें भी ज्यादातर महिला सरपंच के अधिकारों का उपयोग उनके पति, ससूर एवं देवर कर रहे है। ग्रामसभा एवं पंचायत समिति की बैठकों में भी महिला सरपंचों के बजाय उनके पति, देवर या ससूर ही मुद्दे उठाते है। इतना ही नहीं राजनितीक पार्टियों में भी उनके पती ही उनका प्रतिनिधित्व करते नजर आते है। कई बार लोकसभा चुनावों में दागी नेताओं का पत्ता कटने पर जिस तरह उनकी बीबियों को मैदान में उतारा गया और "दाग" मिटते ही जिस तरह वे बीबियों से इस्तीफ़ा दिलाकर संसद में लौट गए वह इसी मानसिकता का एक उदाहरण है। बिहार में राबडी देवी इसका सबसे जीवंत प्रतिक है। सिर्फ वे हीं महिलाएं कुछ कर दिखाने में कामयाब हुई जिन्हें परिवार का सहयोग प्राप्त था और जो शिक्षित थी!

महिला आरक्षण के समर्थकों का मानना
महिला आरक्षण के समर्थकों का मानना है कि
• इससे लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव घटेंगे।
• महिला सशक्तीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
• पंचायत एवं स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण के परिणाम बताते है कि महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा अच्छे से अपनी ज़िम्मेदारी निभाई है। इससे ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र की जड़े मजबूत होगी।
• राजनीति से अपराधीकरण कम होगा।
• रोटेशन पद्धति के कारण कोई भी सीट हमेशा के लिए किसी एक परिवार तक ही सीमित नहीं रहेगी। इससे लोकतंत्र को स्थिरता मिलेगी।
• महिलाओं में नेतृत्व क्षमता का विकास होगा।
• सामाजिक कुरीतियां जैसे कि कन्या भ्रृण हत्या, दहेज, यौन उत्पीडन आदि में सुधार होगा।
लेकिन असल में ये सभी कार्य सिर्फ वे ही महिलाएं कर पाएगी जो शिक्षित होगी! नहीं तो उनकी स्थिति भी राबडी देवी जैसी ही होगी! अब यह हमें सोचना है कि महिलाओं को पहले आरक्षण चाहिए कि शिक्षा?

सिर्फ कानून से महिला की स्थिति नहीं सुधरती
जब भी महिलाओं को कुछ देने की बात आती है चाहे वह नौकरी हो, कोई पद हो या उनके अन्य कोई अधिकार, उन्हें कृपापात्र बना दिया जाता है। यदी हम समाज के अंदर ही देखें तो महिलाओं के क़ानूनी हक भी उन्हें नहीं दिए जाते। और जब भी दिए जाते है तो एक खैरात के तौर पर! जैसे यदि कोई बेटी पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा मांगती है तो सभी लोग उस पर उंगलिया उठाते है। कहा जाता है कि कैसी लालची बेटी है! इतना ही नहीं, मायके से उसके सारे रिश्तें ही खत्म कर दिए जाते है! जबकि हर बेटी का यह कानूनी अधिकार है। अब आप ही बताइए कि ऐसे क़ानून का क्या फायदा जिसका उपयोग ही न किया जा सके? आज समाज में ऐसी कितनी महिलाएं है जिन्होंने इस क़ानून का उपयोग किया या इस क़ानून की वजह से जिन्हें पिता की संपत्ति में हिस्सा मिला? इसी तरह दहेज़ कानून का भी यहीं हाल है। आज भी लड‌की की शादी की बात आते ही सब से पहले यदि किसी बात का जिक्र आता है तो वो है दहेज़! जबकि क़ानूनन दहेज़ पर प्रतिबंध है! ऐसे में सिर्फ आरक्षण से राजनीति में आकर भी महिलाएं ज्यादा कुछ कर पाएंगी, संशयास्पद ही है।

परंपरागत पारिवारिक ढांचा
राजनीति में महिलाओं की रुचि को सामान्यत: परिवारों में पसंद ही नहीं किया जाता। आमतौर पर पुरुष जीवनसंगिनी के रुप में जब किसी नारी की कामना करता है तो वह उसके सीने-पिरोने, पाक-कला, गृहप्रबंधन, गायन-वादन, मेहंदी-रांगोली, शैक्षिक-योग्यता एवं नौकरी आदि की तो कामना करता है लेकिन उसकी कल्पना में राजनीति कहीं भी नहीं होती। वह होने वाली पत्नी की नेतृत्वक्षमता, राजनितीक रुझान एवं दलीय रुची को जानना ही नहीं चाहता! हां, जब अवसर आए तो वह यह जरुर चाहता है कि पत्नी उसके इच्छानुसार ही वोट दे!! जब तक हमारा पारिवारिक ढाचा ही ऐसा है कि महिलाएं वोट भी अपनी इच्छानुसार नहीं दे सकती तब तक सिर्फ आरक्षण लागू कर महिलाएं राजनीति में आ भी गई तो भी वे अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के हाथ की कठपुतली के अलावा कुछ नहीं होगी!!!

दोहरी नीति
• पुरुषों से कदम से कदम मिलाकर चलने की बात करनेवाली महिलाएं पुरुष जो सुविधाऐं देता है वो मजे से लिए चली जाती है। जैसे रेल्वे स्टेशन एवं बस स्टॅंड पर टिकट लेते वक्त खूद के महिला होने का फायदा लेते हुए महिलाएं देरी से आकर भी पहले टिकट ले लेती है। क्यों? उस वक्त पुरुषों के बराबरी में लाइन में लग कर अपनी बारी का इंतजार क्यों नहीं करती? क्या यह हम महिलाओं की दोहरी नीति नहीं है?
• कई कार्यक्रम के आयोजक कहते है कि सभा में महिलाओं के लिए विशेष सुविधा है। बराबरी का दावा करनेवाली सारी महिलाओं को मुकदमा चलाना चाहिए आयोजकों के उपर! विशेष सुविधा हमेशा कमजोरों को दी जाती है। और इससे कमजोर और अधिक कमजोर होता चला जाता है।

महिलाओं को आरक्षण नहीं चाहिए क्योंकि
• महिलाएं निकम्मी एवं कामचोर नहीं है और महिलाओं को अपनी मेहनत और काबिलीयत पर पूरा विश्वास है।
• आरक्षण ज़बरदस्ती मांगी गई भीख से अधिक कुछ नहीं है। इस तरह की खैरात लेकर महिलाएं अपने आप को सारी जिंदगी के लिए नाकाबिल नहीं बना सकती।
• रोटी खिला देना बड़ी बात नहीं है। रोटी कमाने लायक बनाना बड़ी बात है।
• समाज या देश के सहीं विकास के लिए किसी भी क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति का प्रवेश सिर्फ और सिर्फ योग्यता के आधार पर होना चाहिए।लाला लाजपतराय जी ने भी कहा था कि "मनुष्य अपने गुणों से आगे बढ़ता है न की दूसरों की कृपा से।"
• किसी भी व्यक्ति को आरक्षण की बैसाखी देकर संतुष्ट तो किया जा सकता है लेकिन योग्यता को पिछे धकेलने से समाज और देश का जो नुकसान होगा उसकी भरपाई किसी भी तरह नहीं हो सकती!
• आरक्षण एक शॉर्टकट है। उससे महिलाओं का भला नहीं हो सकता।
• वैसे भी आरक्षण लोकतंत्र विरोधी है क्योंकि यह सभी को समान अवसर प्राप्त करने से वंचित रखता है।

उपरोक्त बिन्दुओं के आधार पर कहा जा सकता है कि आज देश को महिला आरक्षण लागू करने से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि वो महिलाओं की सोच, उनकी कार्यक्षमता, उनकी कार्यशैली पर अपना विश्वास बनायें। महिलाओं को शिक्षित करवायें। शिक्षित महिलाएं यदि राजनीति में आएगी तो सही मायने में देश का कायापलट होने में देर नहीं लगेंगी। महिलाएं शिक्षित होंगी तो वो किसी के भी हाथ की कठपुतली बनने कदापि तैयार नहीं होंगी। यदि महिलाओं को सहीं मायने में किसी चीज की आवश्यकता है तो वह यह कि महिलाएं एक व्यक्ति के रुप में अपनी पहचान बनाएं, फैसले लेने की कला सीखें। जरुरत है तो एक दृढ इच्छाशक्ति की जो कमजोर "महिला ग्रंथी" से मुक्त हो! आरक्षण का मुद्दा सभी पार्टियों के लिए ''सिर्फ एक वोट बॅंक'' है! कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा महिलाओं के गैर इस्तेमाल की एक साजिश से ज्यादा कुछ नहीं है! संक्षेप में महिलाओं को आरक्षण नहीं, शिक्षा चाहिए!!!

यह मेरे अपने विचार है। ज़रुरी नहीं कि आप इससे सहमत ही हो! आपको क्या लगता है, क्या महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए??

Keywords: women reservation policy in India, ladies reservation, education, women empowerment in hindi, Indian reservation

COMMENTS

BLOGGER: 21
  1. Jis PC par abhi kam kar raha hun usme hindi font nahin hai. Isliye is font me klikh raha hun.

    yeh vishay mere liye bahut purana our interesting hai. lekin ek purush se aisa lekh padhkar nariyan bhadak jayengi isiliye lekh ke roop me nahin aya.

    mere vichar se reservation kisi bhi vidha mein kisi ke liye bhi ho.. yeh unko kamjor hi karti hain. jab tak pani me na utar diya jaye tairna seekha nahin ja sakta. han koi dekhta rahe ki vah doob na jaye. jahan competition ki baat hai -- sab suvidhayen deejiye kintu yiogyata ka star mat ghataiye. Isse sansthan ki yogyata ghat jaati hai.
    Naari ke liye bhi yathasamgbhav suviudhayen deejiye.par ladayee unhen hi ladne deejiye. EK taraf to barabari ki baat karti hain dusare taraf reservationki baat hoti hai.. kewal isliye ki jo barabari ki baat karti hain we baat hi kartihain kam karne ke liye unke pas aur log hain. jo kam karti hain unhe takaleef hoti hai isliye reservation mangti hain. Un kamjor ya asahay logon ko yatha sambhav sahayate dekar samaj ki mukhya dhara me layiye to reservations ki jaroorat hi khatm ho jayegi. Aisa hi jati sammat reservations me bhi hai - naukari aur padhai ki reservationon mein.

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    1. अयंगर जी, सही कहा आपने! यदि कोई पुरुष यहीं सब बातें लिखता तो शायद आरक्षण की हिमायती महिलाएं इसे पुरुषवादी सोच कहकर विरोध करती! वैसे देखा जाए तो आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारे देश से आरक्षण (चाहे वह लिंग आधारित हो या जाती आधारित) पूरी तरह खत्म किया जाना चाहिए। सिर्फ आर्थिक दृष्टिकोन से जो कमजोर है उन्हे शिक्षा के लिए सहायता दी जानी चाहिए! लेकिन क्या कोई भी सरकार यह जोखिम ले सकती है?

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    2. मैं आपकी बात से संपूर्ण सहमति रखता हूँ.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (22-02-2016) को "जिन खोजा तीन पाइया" (चर्चा अंक-2260) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आदरणीय शास्त्री जी,मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

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  3. Aapne woh likha hai jo barsho se mei likne ki khwahish aapne dil me daaba kar rakha hai, kyunki ek purush aisa likhta toh mahilayen iska birodh karta. bahot hi khubsurat soch, bahot sundar peshkash, har dristikon aur sachchai ko aapne bahot hi zordar Logic ke saath pesh kya hai.

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका! वैसे शायद पुरुषों को भी आशा नहीं होगी कि एक महिला भी महिला आरक्षण के विरोध में लिख सकती है! लेकिन हमें किसी भी बात का विश्लेषण लिंग या जाती आधारित ही नही करना चाहिए! चाहे हम खूद उस लिंग या जाती के ही क्यों न हो, तब ही हम सही और गलत को पहचान पाएंगे ऐसा मुझे लगता है।

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  4. सार्थक प्रस्तुति

    http://hradaypushp.blogspot.com/2010/01/gend.html

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  5. मनुष्य अपने गुणों से आगे बढ़ता है न की दूसरों की कृपा से।" सही बात कही आपने ज्योति जी ! आरक्षण से भी उन महिलाओं का ज्यादा फायदा होगा जो पहले से ही इस लायक हैं , गरीब महिलाओं को कोई फायदा नही होने वाला !!

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  6. योगी जी, आरक्षण से अमीर महिलाओं को फायदा ही होगा ऐसा नहीं है। वास्तव में फायदा वो ही महिला उठा सकती है जिसमें योग्यता है!! नहीं तो राबडी देवी के जैसे अमीर होते हुए भी सिर्फ कठपुतली ही बनेंगी!

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  7. वर्तमान में देश की आरक्षण व्यवस्था बहुत ही दोष पूर्णं है। महिलाओं को आरक्षण मिलना ही चाहिए। साथ ही मुसलमानों को भी 18% आरक्षण मिलना चाहिए। अभी देश की आरक्षण व्यवस्था धर्म पर आ‍धारित है। अभी केवल एक ही धर्म विशेष के लोगों को ही आरक्षण का फाएदा मिल रहा है। दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों को इसका कोई लाभ नहीं मिल पाता। देश् में आरक्षण तभी सार्थक होगा। जब देश के सभी वर्गों को इसका लाभ मिले। फिर चाहे वह महिलाएं हों या अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक।

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  8. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  9. समानता के स्तर तक किसी भी वर्ग को लाने के लिए आरक्षण एक उचित उपाय नहीं है. स्त्रियों को पंचायत आदि में आरक्षण का परिणाम हमारे समक्ष है. वहां पर स्त्रियाँ के चुनाव जीतने के बाद भी शासन की डोर पुरुषों के हाथ में ही है...बहुत सारगर्भित आलेख...

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  10. Much generally Aarakshan is cheez se chid hai, kyunki India mean in cheezon ko bah yada fayda uthaya jata hai. Aur deserving log kuch nahi kar paste.

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  11. बहुत ही बढ़िया आर्टिकल है।

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  12. मैं आपके विचारों से काफ़ी हद तक सहमत हूँ आदरणीया ज्योति जी । ठोस तथ्यों के साथ तर्कपूर्ण ढंग से आपने अपनी बात कही है । लेकिन मैं आपने लेख का संदर्भ नहीं समझ सका । यदि बात नौकरियों तथा पेशेवर शिक्षण पाठ्यक्रमों में आरक्षण की है तो जो आपने कहा है, बिलकुल ठीक कहा है । सभी प्रकार के आरक्षणों को समाप्त कर दिया जाना चाहिए । लेकिन विधानमंडलों में आरक्षण का जहाँ तक प्रश्न है, विगत दो दशक से लंबित बिल निश्चित रूप से पारित किया जाना चाहिए एवं (बिना किसी वर्ग-भेद के) महिलाओं को न्यूनतम एक तिहाई आरक्षण अवश्य दिया जाना चाहिए ताकि (संसद सहित) विधानमंडलों में मेरा भारत महान के जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक आचरण में कुछ सुधार दिखाई दे । आपने पंचायती राज में महिलाओं को प्रदत्त अधिकारों के उनके परिवार के पुरुषों द्वारा (दुर)उपयोग किए जाने की जो बात कही है, वह ठीक है लेकिन समय बीतने के साथ-साथ उस निर्णय के कुछ सुपरिणाम आने भी लगे हैं । जहाँ तक महिलाओं द्वारा अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के समुचित उपयोग का प्रश्न है, मैं इसका संबंध पूर्णतः शिक्षा से नहीं मानता क्योंकि मैंने देखा है की पितृसत्तात्मक भारतीय समाज में अधिकांश शिक्षित महिलाएं भी पुरुषों से प्रत्येक बात में दबती ही हैं और उनके कहे अनुसार ही प्रत्येक कार्य करती हैं । घरेलू हिंसा की जितनी शिकार शिक्षित महिलाएं होती हैं, उतनी अशिक्षित महिलाएं नहीं होतीं । अतः आत्मविश्वास का होना औपचारिक शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है । जहाँ तक महिलाओं के लिए विशेषाधिकारों या प्राथमिकतापूर्ण व्यवहार का प्रश्न है, समानता की पक्षधर महिलाओं को अवश्य ही इसका परित्याग करना चाहिए क्योंकि महिला होने के कारण विशेष सुविधाएं या प्राथमिकता प्राप्त करना तथा पुरुषों के समकक्ष समझी जाना विरोधाभासी बातें हैं । दोनों हाथों में लड्डू नहीं मिल सकते ।

    लेकिन मेरे विचार अपनी जगह हैं, आपके विवेकसम्मत आलेख की गुणवत्ता अपनी जगह । बहुत प्रभावित हुआ हूँ मैं आपके आलेख से ।

    अभिनंदन आपका ।

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    1. जितेंद्र जी, कुछ हद तक मैं भी आपके विचारो से सहमत हूँ। लेकिन मुझे लगता है कि आरक्षण चाहे वह किसी भी प्रकार का हो, पूरी तरह बंद होना चाहिए। पंचायतों में महिला आरक्षण से कुछ सकारात्मक परिणाम जरूर सामने आए है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पंचायतों में भी वही महिलाएं अपनी प्रतिभा का उपयोग कर पाती है जिन्हें परिवार का सहयोग हो। और जिन्हें परिवार का सहयोग मिलता है, उन्हें आरक्षण की बैसाखी की जरुरत ही नहीं है। महिलाओं की उन्नति के लिए शिक्षा एवम् सामाजिक और पारिवारिक सोच ही महत्वपूर्ण है न की आरक्षण।

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  13. रवि मनी12/9/17, 10:48 pm

    बिल्कुल भी नहीं कभी भी नहीं, बल्कि सभी प्रकार के आरक्षण का खात्मा होना चाहिए इस देश से।

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  14. रवि मनी12/9/17, 11:00 pm

    जो काबिल व्यक्ति अपनी काबिलियत से और सभी के लिए एक समान नियमों से चुनकर आएंगे वो सभी के लिए कहीं ज्यादा न्यायप्रिय दुनिया बनाएंगे।जो वंचित है सुविधाओं से उन्हें पैसे से मदद दो। न कि नौकरियों में, रोजगार में,प्रतियोगिता और मंत्री की कुर्सी पर लिंग, जात-पात,धर्म और पुरखों की करनी बच्चों से निकालकर आरक्षण दें। आरक्षण से सामान्य वर्ग की तमाम वो प्रतिभाएं मारी जाती हैं, जो मेरिट में नीचे होती हैं और सामाजिक न्याय के नाम पर बलि चढ़ा दी जाती हैं। जिन्होंने किसी के साथ कोई अन्याय भी नहीं किया होता किसी लिंग के साथ ना ही किसी जाति धर्म के साथ। एक एक आरक्षण को चुन चुनकर ख़तम करें। जय भारत।

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    1. बिल्कुल सही कहा रवी जी आपने। इतनी सारगर्भित टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

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'रेप प्रूफ पैंटी',1,#मीटू अभियान,1,15 अगस्त,3,26 जनवरी,1,8 मार्च,1,अंकुरित अनाज,1,अंगदान,1,अंगुठी,1,अंगूर,1,अंगूर की लौंजी,1,अंगूर की सब्जी,1,अंग्रेजी,2,अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस,3,अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस,1,अंधविश्वास,10,अंधश्रद्धा,8,अंधश्रध्दा,2,अंश,1,अग्निपरीक्षा,1,अग्रवाल,1,अचार,7,अच्छी पत्नी,1,अच्छी पत्नी चाहिए तो...,1,अच्छे काम,1,अजब-गजब,2,अतित,1,अदरक,1,अदरक का चूर्ण,1,अदरक-लहसुन पेस्ट,1,अनमोल वचन,10,अनुदान,1,अनुप जलोटा,1,अन्न,1,अन्य,23,अन्याय,1,अपेक्षा,1,अप्पे,4,अमरुद,1,अमरूद की खट्टी-मीठी चटनी,1,अमीरी,1,अमेजन,1,अरुणा शानबाग,1,अरुनाचलम मुरुगनांथम,1,अवार्ड,2,असली हीरो,13,अस्पतालों में बच्चों की मौत,1,आंवला,3,आंवला चटनी,1,आंवला लौंजी,1,आइसक्रीम,1,आईसीयू ग्रेंडपा,1,आज के जमाने की अच्छाइयां,1,आजादी,2,आज़ादी,1,आतंकवादी,2,आत्महत्या,3,आत्मा,1,आदित्य तिवारी,1,आम,9,आम का अचार,1,आम का पना,2,आम का मुरब्बा,2,आम की बर्फी,1,आम पापड़,1,आरक्षण,1,आलू,1,आलू पोहा अप्पे,1,इंसान,2,इंस्टंट डोसा,1,इंस्टंट स्नैक्स,1,इंस्टट ढोकला,1,इंस्टेंट कुल्फी,1,इडली,3,इन्डियन टाइम,1,इमली,1,इरोम शर्मिला,1,ईद,1,ईश्वर,6,ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना,1,उटी,1,उपमा,1,उपवास,1,उपवास की इडली,1,उपहार,2,उमा शर्मा,1,ऋषि पंचमी,1,एक सवाल,1,ऐनी दिव्या,1,ऐश ट्रे,1,ऑनलाइन,1,और इज्जत बच गई,1,कंघा,1,कंसन्ट्रेट आम पना,1,कच्चे आम,1,कच्चे आम का चटपटा पापड़,1,कटलेट्स,1,कद्दु,1,कद्दु के गुलगुले,1,कन्यादान,3,करवा चौथ शायरी,1,करवा-चौथ,3,कल्याणी श्रीवास्तव,1,कहानी,15,कांजी,1,कानून,1,कामवाली बाई,4,कालीन,1,किचन टिप्स,13,किटी पार्टी,1,किराए पर बीवियां,1,कुंडली मिलान,1,कुरकुरे,1,कुल्फी,1,कुल्फी प्रीमिक्स,1,कूकर,1,केईएम् अस्पताल,1,कॉर्न,4,कॉर्न इडली,1,कौए,1,क्षमा,2,खजूर,1,खत,5,खबर,3,खरबूजा,2,खरबूजे का शरबत,1,खांडवी,1,खाद्य पदार्थ,1,खाना,1,खारक,1,खारी गरम,1,खुले में शौच,1,खुशी,2,खेल,1,गणतंत्र दिवस,1,गणेश चतुर्थी पर शायरी,1,गणेश चतुर्थी प्रसाद रेसिपी,1,गरम मसाला,1,गर्दन दर्द,1,गर्भाशय,1,गलत व्यवहार,1,गलती,2,गाजर,4,गाजर अप्पे,1,गाजर के लड्डू,1,गाजर-मूली के दही बडे,1,गाय,1,गुजरात,1,गुड टच और बैड टच,2,गुलगुले,1,गुस्सा,1,गृहस्वामिनी,1,गैस बर्नर,1,गोरखपुर,1,गोरा रंग,1,गोल्फ,1,गौरी पराशर,1,घंटी,1,घिया,1,घी,1,घी की 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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: क्या महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए??
क्या महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए??
महिला अत्याचारों पर लगाम कसने हेतु महिला आरक्षण की बात की जाती है। लेकिन हमने कभी सोचा है कि क्या आरक्षण मिलने भर से महिलाओं की स्थिति सुधर जाएगी या उनके प्रति हो रहे अत्याचारों में कमी आ जाएगी?
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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