नारी : अतीत से वर्तमान तक

आज भी नारी चाहे जीतनी पढ़ी-लिखी हो, कितने भी ऊँचे पद पर आसीन हो वह सिर्फ औरत है, जिस्म है शोषण के लिए!!

नारी : अतीत से वर्तमान तक
हजारों सालों पहले तक इंसान शिकार से जीता था। स्त्री की शारीरिक संरचना ऐसी नहीं थी कि वह शिकार कर सके। इसलिए जो भोजन जुटा रहा है वह मालिक बन बैठा। लेकिन अब स्त्री और पुरुष दोनों कमा सकते है। इसलिए दोनों मालिक बनना चाहते है। आज की नारी यह मानती है कि वास्तव में कोई मालिक नहीं और कोई ग़ुलाम नहीं।  खत के अंत में यह लिखने की जरुरत नहीं है कि "तुम्हारी दासी"! आज की नारी, प्रेमचंद की ऐसी पात्रा नहीं है जो अपनी इच्छाओं का दमन करती हुई, चुपचाप सारे अन्याय सहती रहे। 
घूँघट 
श्रीराम और श्रीकृष्ण के युग में नारी को घूंघट आवश्यक नहीं था। लेकिन कालांतर में न जाने कब और कैसे घूँघट प्रथा ने जोर पकड़ लिया। जनमानस के गुलाम पंगु विचारों ने नारी को भोग्या बना दिया। घूँघट और लज्जा ही नारी के आभूषण बन गए। क्या नारी को अपने नारी होने पर लज्जा आती है, जो वह अपना मुंह छिपाती फिरती है? इस पर एक चुटकुला याद आ रहा है। जो यहाँ पर बिलकुल फिट बैठता है। 
सास- "बहु, मैं 80 साल की उम्र में भी कभी सर पर का साडी का पल्लु नीचे नहीं गिरने देती और एक तुम हो, जो मुंह उघाड़े घूमती रहती हो...!"
बहु- "मम्मी जी, जब मैं भी आपके जैसी 80 साल की हो जाउंगी, मेरे चेहरे पर भी झुर्रियां पड़ेगी, तब मैं भी अपना चेहरा घूँघट से ढँक लुंगी!!"
सही है, लज्जा का संबंध तो आँख से है, आचार-विचार से है, शालीनता से है -घूँघट से नहीं। आज की नारी का आत्मविश्वास ही शायद उसकी लज्जा की भी रक्षा करता है। वरना सिर्फ लज्जा तो उसकी लज्जा भी न बचा सके!! अत: घूँघट या लज्जा नहीं, आत्मविश्वास ही नारी का सच्चा आभूषण है। 
वर चुनने की आज़ादी 
आदिकाल में राजा-महाराजाओं द्वारा कन्या के विवाह हेतु स्वयंवर रचाए जाते थे। यह इस बात का द्योतक है कि पहले की लड़कीयां ज्यादा स्वतंत्र थी। कम से कम उन्हें अपना वर चुनने की आजादी तो थी। कालांतर में, जहां घर के बुजुर्गों ने शादी पक्की कर दी वहां कर दी। लड़की की निजी पसंद-नापसंद कोई मायने नहीं रखती थी। लड़कियों के हालात तो ऐसे थे कि,"जहां बांधे वही बंध जाय गैया खुंटन की..." लेकिन अब हालात थोड़े बदल रहे है। कुछ लड़कियां खुद अपना जीवनसाथी चुन रही है। लेकिन अभी भी ऐसी लड़कियों की तादाद बहुत कम है। अब कम से कम एक बार औपचारिकता दिखाने हेतु ही सही, लड़कियों से उनकी पसंद ज़रूर पूछ ली जाती है। 

फ़िल्मी गानों में बदलती नारी की तस्वीर
पहले 
"तुम गगन के चंद्रमा हो मैं धरा की धूल हूँ..."
"तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा... "
"आपकी नजरों ने समझा प्यार के काबिल मुझे... "
"औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया..."
"इस दुनिया में औरत क्या है दो लफ्जों की एक कहानी, दिल में ममता आँखों में पानी..."
"धरती की तरह हर दू:ख सह ले, सूरज की तरह तू जलती जा... "
"हे राम तू ने नारी को जन्म से पहले क्यों नहीं मारा था, उत्तर दो, उत्तर दो..."  
अब -
"कोमल है कमजोर नहीं है..."
"ना कटूंगी, ना जलूँगी, ना मिटूँगी, ना मरूंगी, मैं थी मैं हूँ मैं रहूँगी..."
"नारी कुछ अइसन आगे निकल रही है, मर्दन के पांव तले धरती खिसक रही है...!!" 

घर के बाहर का कार्यक्षेत्र 
पहले महिलाओं का कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारी तक ही सीमित था। लेकिन अब घर और बाहर दोनों क्षेत्र संभालने के चक्कर में आज की नारी बुरी तरह फंस गई है। सारा दिन उन्हें अपने बच्चों की चिंता सताती रहती है। कामकाजी महिलाएं एक मशीन के समान सुबह से देर रात तक काम में लगी रहती है और बदले में क्या पाती है? वहीं तनाव, चिड़चिड़ापन और थोड़ी सी आर्थिक आजादी। कामकाजी महिलाओं का चेहरा बाहर वालों की नज़र में रोबिला और गर्विला होता है किंतु घर की दहलीज में पांव रखते ही वही चेहरा पर्स के साथ अलमारी में बंद हो जाता है।  

संकीर्ण मानसिकता -  
अतीत में माता सीता की अग्निपरीक्षा और युधिष्ठिर व्दारा द्रोपदी को दांव पर लगाना, उसे सबकी साझी संपति बनाना, यह दर्शाता है कि उस वक्त नारी को इंसान नहीं समझा जाता था। नारी का अपना कोई मान-सम्मान नहीं होता था। आज के हालात क्या है? क्या इतने बड़े देश की मुट्ठी भर आज़ाद और आत्मनिर्भर महिलाएं यह ख़ुशी जगाने के लिए काफी है कि देश बदल रहा है और स्त्री के प्रति सोच बदल रही है? पता नहीं क्यों, लेकिन मैं उनकी ख़ुशी में शामिल नहीं हो पाती। इसका ताजा उदाहरण है संजय निरुपम का 'ठुमका' वाला बयान, लालू प्रसाद का 'चूड़ी' सबंधी बयान तो मंत्री गिरिराज सिंह का 'गोरी चमड़ी' वाला बयान। कभी कोई कहता है कि "लड़कों से गलती हो जाती है" तो कभी फतवा निकाला जाता है कि "लड़कियों ने जींस नहीं पहनना चाहिए।" ये सब बातें यही दर्शाती है कि आज भी नारी चाहे जीतनी पढ़ी-लिखी हो, कितने भी ऊँचे पद पर आसीन हो वह सिर्फ औरत है, जिस्म है शोषण के लिए!! 

नारी शोषण का भावी रूप - माँ का दूध 
अतीत में माताएं प्रेम और करुणा के लिए दूसरे के बच्चे को दूध पिलाती थी। लेकिन अभी हाल ही में अमेरिका के मियामी की ग्रेटा अमाया ने अपने बच्चे को पेटभर दूध पिलाने के बाद, सप्रयास अतिरिक्त दूध निकाला और उसे 6 माह तक बेच कर 52 हजार डॉलर की कमाई भी की। एक फार्मा फैक्ट्री अमाया की तरह अन्य माताओं से दूध खरीद कर उसे वैज्ञानिक प्रक्रिया से फ्रोज़न क्यूब में बदलकर बाजार में बेचती है। जिन माताओं को किसी शारीरिक कमतरी के कारण दूध नहीं आ पाता वे इसे खरीदकर अपने बच्चों को पिलाती है। माँ का दूध 'सफ़ेद प्लाज्मा' की तरह जीवन रक्षक है। माँ के दूध से  बनाया प्रोटीन सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ है।   
लेकिन अब लोभ नामक दैत्य इस पुरे खेल को बदल सकता है। भारत जैसे अजब देश में तो दूध माफिया उभर सकता है, जो बन्दुक की नोंक पर माँ के दूध का 'उत्पादन' करा सकता है। सबसे अहम बात जैसे आज अतिरिक्त दूध के लिए गाय के बछड़े को भूखा रखा जाता है ठीक उसी प्रकार यदि कालांतर में मानव जाती के बच्चें को 'अतिरिक्त दूध' के लिए भूखा रखा गया तो यह सम्पूर्ण मानव जाती के लिए कितना खतरनाक होगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती!!
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COMMENTS

BLOGGER: 37
  1. beautifully written Jyotiji :-) though it took me a while to read, since we are all so used to reading only english... :-) thank you for sharing such wonderful thoughts on women and their changing roles!

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  2. प्रिय ब्लॉगर बहन अर्चना जी, आप हिंदी भाषी न होने पर भी मेरा हिंदी ब्लॉग पढ़ती है और सिर्फ पढ़ती ही नहीं तो उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करती है यह जानकर बहुत ख़ुशी हुई. आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  3. लोहड़ी की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (13-04-2015) को "विश्व युवा लेखक प्रोत्साहन दिवस" {चर्चा - 1946} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. Bilkul sahi likha aapne. Hairat ki baat yeh hai ki ghoonghat mukt hona, swayam var chunne ka adhikar purane yug ki nariyon ko tha par abhi bhi kai striyon ko nahi hai. Ek taraf ham pragati ki taraf badhte hai aur doosri taraf log shoshan ke naye tareeke bhi dhoond lete hai.

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  5. विचारोत्तेजक लेख

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  6. बहुत बढ़िया चिंतनशील प्रस्तुति..
    समय के साथ बदलाव आ जाता है ..

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  7. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

    http://hindikavitamanch.blogspot.in/
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  8. आज जिस सभ्यता की हमें आवश्यकता है आप उसी की बातें सहज तथा कर्णप्रिय तरीके से कह देती हैं.

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  9. आज अपनी मातृभाषा मैं यह लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा। मैं आपके और लेख भी पढूंगी और आपसे निवेदन है की आप ऐसे ही अच्छे लेख लिख कर हम सबको प्रेरित कीजिए। नारी के सामाजिक उत्थान के लिए लोगों की सोच बदलना बहुत आवश्यक है।

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  10. बहुत सुन्दर सार्थक सृजन, बधाई

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  11. नारी के बदलते रूपों का बहुत सार्थक चित्रण..बहुत सारगर्भित आलेख...

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  12. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा,आपकी रचना बहुत अच्छी और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिश करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग www.gyanipandit.com पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें

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  13. आदरणीया ज्योति जी ,
    बहुत बढ़िया आलेख एक ही पोस्ट में कई महत्वपूर्ण पहलुओं का समावेश कर गहन विश्लेषण सबके समक्ष प्रस्तुत किया है अपने। धन्यवाद।
    नारी विषय पर ही मेरा भी एक ब्लॉग है। ब्लॉग जगत का अनुभव नया है मेरे लिए। कृपया एक बार अवश्य पधारें और क्या कमियां हैं मार्गदर्शन जरूर करें। धन्यवाद।
    lekhaniblogdj.blogspot.in नारी का नारी को नारी के लिए
    lekhaniblog.blogspot.in एक लेखनी मेरी भी

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  14. आपने इस पोस्ट में तो गागर में सागर भर दिया। साहित्य, सिनेमा और समाज में व्याप्त नारी के प्रति संकीर्ण मानसिकता का सुंदर सजीव चित्र खींचा है। बहुत बहुत आभार।

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  15. धन्यवाद ज्योति जी,
    अपना अमूल्य समय मेरी लेखनी को देने के लिए आपका ह्रदय से आभार।

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  16. बहुत ही सार्थक और बेबस नारी को झकझोर कर रख देने वाली रचना।

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  17. बहुत बढ़िया चिंतनशील प्रस्तुति..
    समय के साथ बदलाव आ जाता है ! सोच बदल रही है और सोच सबकी बदलनी चाहिए ! पुरुषों की भी और महिलाओं की भी ! महिलाएं भी , ज्योति जी , महिलाओं पर अत्याचार करने में ज्यादा पीछे नहीं हैं !

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  18. समय के साथ बदलाव जरूरी है । सुंदर आलेख ।

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  19. बदलाव आ रहा है और आना भी चाहिए .... समाज बहत बहुत समय से नारी पर कठोर रहा है और इसको बदलना होगा ... आज नहीं तो फिर कब ...

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  20. बहुत ही सुन्दर आलेख ....सचमुच गागर में सागर भरा है आपने....नारी की स्थिति आज भी दयनीय और चिन्तनीय ही है......
    सही कहा फिल्म जगत के गानों मे भी नारी को निपट -
    निरा संम्बोधित किया गया है.....
    लाजवाब आलेख....

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  21. बहुत ही सुन्दर आलेख ....सचमुच गागर में सागर भरा है आपने....नारी की स्थिति आज भी दयनीय और चिन्तनीय ही है......
    सही कहा फिल्म जगत के गानों मे भी नारी को निपट -
    निरा संम्बोधित किया गया है.....
    लाजवाब आलेख....

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  22. आपकी लिखी रचना सोमवार 8 जनवरी 2018 के 906 वें अंक के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  23. ज्योति जी आपकी रचना अपनी पसंदीदा रचनाओं में शामिल किया और आपको आमन्त्रित करना भूल गयी इसके लिए क्षमा चाहती हूँ...शुक्र है आप आयी यहाँ पर...आपका बहुत धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  24. क्षमा की कोई बात नहीं हैं सुधा जी। आपका ई मेल मिल गया था उसीके जरिए मैं वहां पहुंची थी। आपने मेरी रचना को अपनी पसंदीदा रचना में शामिल किया उसके लिए आपक बहुत बहुत धन्यवाद।

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  25. बेहतरीन सामाजिक आलेख !! मुझे लगता है घूँघट की प्रथा मुगलों के साथ आई थी

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  26. आज भी नारी चाहे जीतनी पढ़ी-लिखी हो, कितने भी ऊँचे पद पर आसीन हो वह सिर्फ औरत है, जिस्म है शोषण के लिए!!....ज्योति बहन आज के कलयुगी समाज पर सटीक बैठती पगतियाँ,आप से अपना कुछ अनुभव बाटना चाहुँगा, मैं पैसे से एक अध्यापिका थी. ..पर आज कुशल गृहणी हूँ...मेरे पति आर्मी में है... मैंने ज्यादातर राज्यों का दौरा भी किया.. मैं मानती हूँ औरतों की स्थति ठिक नहीं ...पर मैं मानती हूँ संस्कार ,ससंकृति जो हमारे पूर्वजों ने बनाया वो एक हद तक ठिक है... हम घर चलाते है फिर कम क्यों हाके अपने आप को, और रही नौकरी पैसे वाली महिलाओं की शोषण की बात अगर हम हर समस्या का सामना करें , किसी की हिम्मत नहीं की वो हमें हानी पहुचाये ,हमें कमजोर करता है हमारा भवनात्मक लगाव... बहुत अच्छा लेख है ...नारी क्रांति का . .सादर

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  27. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  28. नमस्ते,

    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 24 जनवरी 2019 को प्रकाशनार्थ 1287 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  29. धन्यवाद, रविन्द्र जी।

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  30. पर्दा और घूंघट मध्यकालीन समाज की देन है जो बाहरी आक्रांताओं से रक्षा के लिए आया। बहुत अच्छा विश्लेषणात्मक लेख। बधाई और आभार।

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  31. सार्थक लेख.
    सच में नारी की तस्वीर बदल रही है... ये पंगु समाज को धावक बनाने जैसा है.

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  32. बहुत विचारोत्तेजक लेख ! जब किराए की कोख हो सकती है तो मोल देकर माँ का दूध भी हासिल किया जा सकता है. वैसे औरत के हालात बदले तो हैं लेकिन उसके बारे में आम मर्दों का ही क्या, आम औरतों का नज़रिया अभी भी बदला नहीं है.

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  33. विचारोत्तेजक लेखन आदरणीय ज्योति जी...आपकी सार्थक लेखनी को नमन।

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  34. विचारणीय एवं सारगर्भित प्रस्तुति।

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नाम

'रेप प्रूफ पैंटी',1,#मीटू अभियान,1,#साड़ीट्विटर,1,15 अगस्त,3,26 जनवरी,1,8 मार्च,1,अंकुरित अनाज,1,अंगदान,1,अंगुठी,1,अंगूर,1,अंगूर की लौंजी,1,अंगूर की सब्जी,1,अंग्रेजी,2,अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस,3,अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस,1,अंधविश्वास,10,अंधश्रद्धा,9,अंधश्रध्दा,2,अंश,1,अग्निपरीक्षा,1,अग्रवाल,1,अचार,7,अच्छी पत्नी,1,अच्छी पत्नी चाहिए तो...,1,अच्छे काम,1,अजब-गजब,2,अतित,1,अदरक,1,अदरक का चूर्ण,1,अदरक-लहसुन पेस्ट,1,अनमोल वचन,10,अनुदान,1,अनुप जलोटा,1,अन्न,1,अन्य,23,अन्याय,1,अपेक्षा,1,अप्पे,4,अमरुद,1,अमरूद की खट्टी-मीठी चटनी,1,अमीरी,1,अमेजन,1,अरुणा शानबाग,1,अरुनाचलम मुरुगनांथम,1,अवार्ड,2,असली हीरो,15,अस्पतालों में बच्चों की मौत,1,आंवला,3,आंवला चटनी,1,आंवला लौंजी,1,आइसक्रीम,1,आईसीयू ग्रेंडपा,1,आग,1,आज के जमाने की अच्छाइयां,1,आजादी,2,आज़ादी,1,आतंकवादी,2,आत्महत्या,3,आत्मा,1,आदित्य तिवारी,1,आम,9,आम का अचार,1,आम का पना,2,आम का मुरब्बा,2,आम की बर्फी,1,आम पापड़,1,आरक्षण,1,आलू,1,आलू पोहा अप्पे,1,इंसान,2,इंस्टंट डोसा,1,इंस्टंट स्नैक्स,1,इंस्टट ढोकला,1,इंस्टेंट कुल्फी,1,इडली,3,इन्डियन टाइम,1,इमली,1,इरोम शर्मिला,1,ईद,1,ईश्वर,6,ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना,1,उटी,1,उपमा,2,उपवास,1,उपवास की इडली,1,उपहार,2,उमा शर्मा,1,ऋषि पंचमी,1,एक सवाल,1,ऐनी दिव्या,1,ऐश ट्रे,1,ऑनलाइन,1,और इज्जत बच गई,1,कंघा,1,कंसन्ट्रेट आम पना,1,कच्चे आम,1,कच्चे आम का चटपटा पापड़,1,कटलेट्स,1,कद्दु,1,कद्दु के गुलगुले,1,कद्दू,1,कद्दू का बेसन,1,कन्यादान,3,कबीर सिंह मूवी,1,करवा चौथ शायरी,1,करवा-चौथ,3,कल्याणी श्रीवास्तव,1,कहानी,16,कांजी,1,कानून,1,कामवाली बाई,4,कालीन,1,किचन टिप्स,14,किटी पार्टी,1,कियारा आडवानी,1,किराए पर बीवियां,1,कुंडली मिलान,1,कुरकुरे,1,कुल्फी,1,कुल्फी प्रीमिक्स,1,कूकर,1,केईएम् अस्पताल,1,कॉर्न,4,कॉर्न इडली,1,कौए,1,क्षमा,2,खजूर,1,खत,5,खबर,3,खरबूजा,2,खरबूजे का शरबत,1,खरेदी,1,खांडवी,1,खाद्य पदार्थ,1,खाना,1,खारक,1,खारी गरम,1,खुले में शौच,1,खुशी,2,खेल,1,गणतंत्र दिवस,1,गणेश चतुर्थी पर शायरी,1,गणेश चतुर्थी प्रसाद रेसिपी,1,गरम मसाला,1,गर्दन दर्द,1,गर्भावस्था,1,गर्भाशय,1,गलत व्यवहार,1,गलती,2,गाजर,4,गाजर अप्पे,1,गाजर के लड्डू,1,गाजर-मूली के दही बडे,1,गाय,1,गुजरात,1,गुजराती डिश,1,गुड टच और बैड टच,2,गुरु पूर्णिमा,1,गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं,1,गुलगुले,1,गुस्सा,1,गृहस्वामिनी,1,गैस बर्नर,1,गोरखपुर,1,गोरा रंग,1,गोल्फ,1,गौरी पराशर,1,घंटी,1,घिया,1,घी,1,घी की नदी,1,चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति,1,चकली,1,चटनी,7,चना दाल,1,चाँद पर जमीन,1,चाय,1,चाय मसाला,1,चावल,2,चावल के पापड़,1,चाशनी,1,चींटी,1,चीज,1,चीला,2,चूर्ण,4,छाछ,1,छींक,1,छोटी बाते,1,छोटे लेकिन काम के टिप्स,2,छोटे-छोटे काम के टिप्स,2,जज्बा,2,जनसंख्या,1,जन्मदिन,3,जन्मदिन की शुभकामनाएं,2,जन्माष्टमी,2,जमाना,1,जलेबी,1,जाट आंदोलन,1,जात-पात,1,जाति,1,जाम,1,जिंदगी,1,जीएसटी,1,जीरो ऑइल रेसिपी,5,जोक्स,5,जोयिता मंडल,1,ज्वार की रोटी,1,ज्वेलरी,1,झारखंड,1,झाले-वारणे,2,झूठ,1,टिप्स कॉर्नर,30,टी.व्ही. और सिनेमा,1,ठंडे पेय,6,ठेचा,1,डर,1,डैंड्रफ,1,डॉक्टर,2,डॉटर्स डे,2,ढाबा स्टाइल सब्जी,1,ढोकले,1,तरबूज,2,तरबूज के छिलके का हलवा,1,तलाक,1,ताजे नारियल की बर्फी,1,तिल,2,तिल की कुरकुरी चिक्की,1,तिल के लड्डू,1,तेलंगाना,1,तोहफ़ा,1,थंडा पानी,1,दक्षिणा,1,दवा,1,दही,5,दही सैंडविच,1,दहेज,3,दाग-धब्बे,1,दान,1,दासी,1,दिपावली बधाई संदेश,3,दिशा,1,दीपावली शुभकामना संदेश,1,दीवाली रेसिपी,1,दुध पावडर,1,दुर्गा माता,1,दुल्हा,1,दुश्मन,1,दूध,2,देशभक्ति,3,देशभक्ति शायरी,2,देहदान,1,दोस्त,2,धनिया,1,धर्म,2,धर्मग्रंध,1,धार्मिक,27,नजर,1,नजर कैसे उतारु,1,नदी में पैसे,1,नन्ही परी,1,नमक पारे,1,नमकीन,1,नवरात्र,1,नवरात्र स्पेशल,2,नवरात्रि,1,नवरात्री रेसिपी,5,नववर्ष,2,नववर्ष की शुभकामनाएं,2,नाइंसाफी,1,नानी,1,नारियल बर्फ़ी,1,नारी,47,नारी अत्याचार,10,नारी शिक्षा,1,नाश्ता,1,निंबु का अचार,1,निचली जाती,1,निर्णयक्षमता,1,निर्भया,2,निवाला,1,नींबू,1,नीडल थ्रेडर,1,नेत्रदान,1,नेपाल त्रासदी,1,नेल आर्ट,1,न्याकिम गैटवेच,1,पकोडे,2,पक्षी,1,पढ़ा-लिख़ा कौन?,1,पढ़ाई,1,पति,1,पति का अहं,1,पति-पत्नी,1,पत्ता गोभी,2,पत्ता गोभी और चना दाल के बडे,1,पत्ता गोभी की मुठिया,1,पत्नी,1,पत्र,1,पपीता,1,परंपरा,2,परवरिश,6,पराठे,1,परीक्षा,2,परेशानी,1,पल्ली उत्सव,1,पवित्र,1,पवित्रता,2,पसंदीदा शिक्षक को पत्र,1,पानी,1,पानी कैसे पीना चाहिए,1,पापड़,3,पालक,1,पालक के नमक पारे,1,पालक बडी,1,पाश्चात्य संस्कृति,1,पिता,2,पुण्य,1,पुरानी मान्यताएं,1,पुलवामा हमला,1,पूडी,1,पेढे,1,पैड्मैन,1,पैनकेक,1,पैरेंटीग,1,पोर्न मूवी,1,पोषण,1,पोहा,2,पोहे के कुरकुरे,1,प्याज,3,प्याज की चटनी,1,प्यार,1,प्यासा कौआ,1,प्रत्यूषा,1,प्रद्युम्न,1,प्रसन्न,1,प्राणियों से सीख,1,प्री वेडिंग फोटोशूट,1,फर्रुखाबाद,1,फल,1,फल और सब्जी खरीदने से पहले,1,फलाहार,1,फल्लिदाने,1,फादर्स डे,2,फूल गोभी के परांठे,1,फेसबुक,2,फैशन,1,फ्रिज,1,फ्रेंडशीप डे,1,फ्रेंडशीप डे शायरी,1,बकरीद,1,बची हुई सामग्री का उपयोग,1,बच्चे,8,बच्चे की ज़िद,1,बच्चें,1,बछबारस,1,बटर,1,बड़ा कौन?,1,बढ़ती उम्र,1,बदला,1,बधाई संदेश,4,बरबादी,1,बर्फी,2,बलात्कार,8,बहू,2,बाजरा,1,बाल शोषण,2,बाहर का खाना,1,बिल्ली के गले में घंटी,1,बुढ़ापा,1,बुलंदशहर गैंगरेप,1,बेटा,1,बेटा पढाओ,1,बेटी,7,बेटी बचाओ अभियान,2,बेसन,2,बेसन के लड्डू,1,बैंगन,1,बोझ,1,ब्रेकअप,1,ब्रेड,4,ब्रेड की रसमलाई,1,ब्रेड पकोडा,1,ब्रेड पिस्ता पेढे,1,ब्लॉगअद्दा एक्टिविटी,1,ब्लॉगर ऑफ द इयर 2019,1,ब्लॉगर्स रिकोग्निशन अवार्ड,1,ब्लॉगिंग,5,ब्ल्यू व्हेल गेम,1,भक्ति,1,भगर,3,भगर की इडली,1,भगर के उत्तपम,1,भगर के कटलेट,1,भगवान,3,भजिए,1,भरवां मिर्च,1,भरवां शिमला मिर्च,1,भाई दूज शायरी,1,भाकरवड़ी,1,भाभी,1,भारत,1,भारतीय नारी,1,भारतीय मसाले,1,भुट्टे के 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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: नारी : अतीत से वर्तमान तक
नारी : अतीत से वर्तमान तक
आज भी नारी चाहे जीतनी पढ़ी-लिखी हो, कितने भी ऊँचे पद पर आसीन हो वह सिर्फ औरत है, जिस्म है शोषण के लिए!!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
https://www.jyotidehliwal.com/2015/04/Nari-atit-se-vartman-tak.html
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