beti padhao in hindi

हम अपनी कन्याओं को इस प्रकार शिक्षा और संस्कारों से विभूषित करे कि जिससे वे दृष्टों से अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा कर सके।

Women educationनर की धुरी, पति की प्रेरणा, बच्चों की सर्वेसर्वा, गृहस्वामिनी---वैसे तो हर जगह स्त्री की मौजूदगी, उसका दखल ज़रुरी माना जाता है। लेकिन दहलीज़ के बाहर दुनिया-जहान की बात आई नहीं कि पल भर में महिलाओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है, यह कहकर कि ये उनकी बहस का मुद्दा नहीं है। क्या हमने कभी इस बात पर गौर किया है कि ऐसा क्यों होता है? इसका सबसे मुख्य कारण है नारी में शिक्षा का अभाव! जो महिलाए पढ़ी-लिखीं है, जिन्होंने अपनी शिक्षा के बलबूते समाज में अपनी एक जगह बनाई है उन्हें कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। 
लड़की पढ़ेगी तो बढ़ेगी!
लेखिका और समाजसेविका सुधा मूर्ति के मुताबिक, 'लड़की पढ़ेगी तो बढ़ेगी, बढ़ेगी तो अपनी जिंदगी को जानेगी, अपनी जिंदगी को जानते समझते हुए दुनिया को समझेगी और दुनिया की समझ उसकी जिंदगी की समझ को बढ़ाएगी।'

लेकिन यदि पढ़ ही न पाई तो? कितनी लड़कियाँ है जो स्कूल जा पाती है? आज स्थिति थोड़ी बदल रही है। लड़कियाँ भी स्कूल जाने लगी है। यह ख़ुशी की बात है। लेकिन आज भी कितनी लड़कियाँ है जो हाईस्कूल तक लड़कों से अच्छे अंक पाने के बाद भी उच्च शिक्षा तक पहुँच पाती है?  भारत में जहाँ 2001 की जनसंख्‍या में पुरुषों की साक्षरता 75 फीसदी थी, वहीं महिला साक्षरता महज 54 फीसदी थी। हाल ही में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति जी ने छात्राओं को वाचनालयों में जाने से रोक लगा दी थी। और कहा कि जब कोई एक लड़की जाती है तो चार लड़के भी वहां पहुँच जाते है! अब आप ही बताईये, इसमें लड़कियों की क्या गलती है? मंत्री महोदय वाचनालय का विस्तार करने की बजाय लड़कियों को दोष दे रहे है!

नारी शिक्षा की कमी के कारण 
1) ज्यादातर माँ-बाप यही सोचते है कि "पहले लड़की की पढ़ाई में ख़र्चा करों और बाद में शादी में। दो-दो बार ख़र्चा करने की अपेक्षा ग्रेजुएशन तक पढ़ा दो और पैसे वाले अच्छे घर में शादी कर दो! हो गई अपने कर्तव्य की इतिश्री!" इसी सोच के कारण आज भी ज्यादातर लड़कियाँ अपनी शिक्षा को नौकरी और आत्मनिर्भरता में तब्दील नहीं कर पाती।

2) ज्यादातर माता-पिता को यही लगता है कि लड़की तो पढ़-लिख कर अपने ससुराल चली जाएगी, हमारे किस काम आएँगी? फिर हम क्यों इतना पैसा खर्च करे?

3) लड़की को जितना ज्यादा पढ़ाएंगे उसके लिए वर भी उतना ही पढ़ा लिखा ढूंढना पड़ेगा। लड़का जितना ज्यादा पढ़ा-लिखा होगा वो दहेज़ भी उतना ज्यादा माँगेगा! ज्यादातर माता-पिता इतना ज्यादा दहेज़ नहीं दे पाते।

4) गावों में लड़कियों का पांचवी के बाद स्कूल की पढ़ाई छोड़ने का एक बड़ा कारण स्कूलों में कन्या शौचालय नहीं होना है।

5) जो क्षेत्र सतत समर्पण वाले है, जैसे विज्ञान एवं शोध के क्षेत्र, वहां भी लड़कियों की संख्या दुखद रूप से निराश करने वाली है। क्योंकि लड़कियाँ अपने जीवन के दस साल किसी वैज्ञानिक शोध के लिए नहीं दे पाती है। खासतौर से भारत में बहुत सी संस्थाएं तो ऐसे शोध कार्यों के लिए लड़कियों को लेती ही नहीं। क्योंकि दो-तीन साल में उनकी शादी हो जाती है और ससुराल वालों को लगता है कि विज्ञान पढने से ज्यादा ज़रुरी है पति और घर की देखरेख करना। उनकी रिसर्च बीच में ही रुक जाती है और हाथों में टेस्ट ट्यूब एवं माइक्रोस्कोप की जगह कलछी एवं बेलन होते है।

6) अभी भी कुछ लोगों की सोच यही है कि लड़कियाँ ज्यादा पढ़-लिख कर क्या करेंगी? उन्हें तो चौका-चूल्हा ही संभालना है। ज्यादा पढ़ेगी-लिखेगी तो ससुराल में निभा नहीं पाएंगी!

नारी शिक्षा के फायदे 
1) सदियों से नारी में जो एक हीन भावना घर करा दी गई है कि "पिछले जन्म में तुमने ज़रूर कोई पाप किए होंगे इसीलिए इस जन्म में तुमने नारी रूप में जन्म लिया है।" शिक्षित होने से नारी को अपने अंदर के इस हीन भावना से मुक्ति मिलेंगी।  

2) शिक्षा से नारी के ज्ञान में वृद्धि होने से वह अपने घर का प्रबंधन, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, बच्चों का पालन-पोषण सही तरीके से कर पाएगी। उसकी निर्णय क्षमता में वृद्धि होगी। 


3) शिक्षा से नारी के आत्मविश्वास में बढ़ोतरी होगी। मेरा अपना भी कोई अस्तित्व है, मेरी अपनी भी कोई पहचान है, इस भावना को बल मिलेगा। (क्योंकि आज भी हम यही सोचते है कि नारी की अपनी कोई पहचान नहीं है। अभी टीवी पर एक सीरियल का विज्ञापन आ रहा है जिसमे कहा जाता है कि "मम्मी का क्या, वो तो पापा के साथ फ्री है!!" इस विज्ञापन के बोल में ही छुपी है नारी की आज की हकीक़त!

4) आत्मविश्वास में वृद्धि होने से नारी को अपने अंदर से वास्तविक आतंरिक ख़ुशी मिलेगी जिसका फायदा पुरे परिवार को, पुरे समाज को मिलेगा। महात्मा गांधी ने भी कहा था "जब एक लड़की पढ़ती है तो पूरा परिवार पढ़ता है।" नारी ने शिक्षा ग्रहण कर ली इसका ये मतलब कतई नहीं है कि उसे अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए घर से बाहर जाकर नौकरी या व्यवसाय करना ज़रुरी है। लेकिन कल को यदि कोई अनहोनी हो जाय या पति का साया न रहे, तो शिक्षित होना उसका आत्मविश्वास टूटने नहीं देगा। शिक्षा ग्रहण करने का मुख्य उपयोग है एक जागरूक, सचेत नागरिक बनकर स्वाभिमान से जीना! घर-परिवार से समय निकालकर कुछ न कुछ सीखते रहना। आगे… और आगे… और आगे बढ़ते रहना!!

इसलिए बेटियों को दहेज नहीं शिक्षा दीजिए।

हम अपनी कन्याओं को इस प्रकार शिक्षा और संस्कारों से विभूषित करे कि जिससे वे दृष्टों से अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा कर सके। निश्चय ही फैशन और अंगों को खुला रखने वाली वेषभूषा व्यभिचार की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती है।  


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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: beti padhao in hindi
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हम अपनी कन्याओं को इस प्रकार शिक्षा और संस्कारों से विभूषित करे कि जिससे वे दृष्टों से अपने सतीत्व और सम्मान की रक्षा कर सके।
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