यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते...!

एक ऐसा सवाल, जो हम सब की जिंदगी बदल सकता है। हमें अनैतिक कार्य करने से रोक सकता है!

                               
यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते...!
जिंदगी में ऐसे कई पल आते है, जब हम दुविधा में फस जाते है और निर्णय नहीं ले पाते है कि हम जो भी कार्य कर रहें है वो सही है या गलत, नैतिक है या अनैतिक। हम अपने चारों ओर नजर दौडाते है, चार दोस्तों से पूछते है लेकिन हमारी समस्या का समाधान नजर नहीं आता। एक कठिनतम सवाल “मैं जो कार्य कर रहा/रही हूं; वो कार्य सहीं है या गलत, नैतिक है या अनैतिक?” का सरलतम जबाब हम स्वयं बहुत ही आसानी से पा सकते है। वह ऐसे कि जब भी कभी हमारे सामने यह समस्या आए कि “मैं जो कार्य कर रहा हूं/ कर रहीं हूं; वो कार्य सहीं है या गलत, नैतिक है या अनैतिक?” तो हमें अपनेआप से एक सवाल पूछना चाहिए। “यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते...कि मैं क्या कर रहा/रहीं हूं, तो क्या वे खुश होते?” हमें हमारे सवाल का जबाब मिल जाएगा। क्योंकि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को गलत काम करते देख कर खुश नहीं होते।

यदि आप पान खाकर किसी सार्वजनिक जगह पर थुक रहें है, तो थोड़ा सा रुकिए। अपनेआप से सवाल किजिए, “यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते कि मैं पान खाकर किसी सार्वजनिक स्थान पर थुक रहा हूं, तो क्या वे खुश होते?” निश्चित ही आपका जबाब नकारात्मक ही होगा। आप रुक जायेंगे और थोड़े दिनों में आपकी पान खाकर इधर-उधर थुंकने की आदत छूट जाएगी। राह चलते आपने केले खरीदे। केला खाकर छिलका सड़क पर फेंकने ही वाले थे कि आपके मन में सवाल आया कि “यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते कि मैं केला खाकर छिलका सड़क पर फेंक रहा हूं, तो क्या वे खुश होते?” नही न! और आप छिलका फेंकने के लिए डस्टबिन खोजने लगोगे।

आप कहेंगे, केले खाकर छिलके फेंकना और पान खाकर थुंकना जैसे छोटे-छोटे कार्य हमारी आदत बन गए है। और जो कार्य हमारी आदत बन जाते है, उन कार्यों के बारे में सोचना संभव नहीं है। वैसे भी हम इतने व्यस्त रहते है कि ऐसी छोटी-छोटी बातों की तरफ ध्यान देना संभव ही नहीं है। वैसे भी किसी एक व्यक्ति के पान खाकर इधर-उधर न थुंकने से या केले के छिलके डस्टबिन में डाल देने से कौन सा देश स्वच्छ हो जाएगा? सही बात है। लेकिन किसी एक व्यक्ति के भी ऐसा करने पर सड़क पर कम से कम उतनी गंदगी तो कम होगी! क्या आपने कभी सोचा कि हम दूसरों को नहीं सुधार सकते लेकिन खुद तो सुधर ही सकते है! दोस्तो, यदि इन छोटी-छोटी बातों पर ही हमने ध्यान देना शुरु किया तो वो दिन दूर नहीं जब हम एक स्वच्छ-सुंदर भारत का निर्माण करेंगे।

ये तो हुए रोजमर्रा के छोटे-छोटे उदाहरण। लेकिन यदि हम अपने मन में एक पक्की गांठ बांध ले कि कोई भी ऐसा कार्य, जिसके बारे में हमारे मन में दुविधा हो कि वो नैतिक या अनैतिक, तो कम से कम ऐसा कार्य करने से पहले हम अपने-आप से यह सवाल ज़रुर पूछेंगे। दोस्तों, यदि यह एक ही सवाल हमने अपने-आप से पूछने की शुरवात की, तो हमारा भारत देश सचमुच में महान होगा! कोई चोर चोरी नहीं करेगा, कोई डकैत डाका नहीं डालेगा, कोई बलात्कारी बलात्कार नहीं करेगा, कोई रिश्वतखोर रिश्वत नहीं लेगा। कोई शराबी शराब नहीं पियेगा और कोई डॉक्टर पैसों के लिए बिना वजह किसी ग़रीब मरीज़ से ढेर सारी टेस्ट नहीं करवाएगा। संक्षेप में, कोई भी अपराधी अपराध करने से पहले सोचेगा और उसका मन अपराध करने से मना कर देगा। यह सब होगा सिर्फ और सिर्फ एक सवाल से, जो हम पूछेंगे अपनेआप से!

इतना ही क्यों, हाल ही में जो आतंकवादी हमलों की बाढ़ आई हुई है, वो भी नहीं होते यदि आतंकवादी अपनेआप से यह सवाल पूछते कि “यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते कि मैं निरपराध लोगों की जाने ले रहा हूं, तो क्या मेरे माता-पिता खुश होते?” मैं पूरे विश्वास के साथ कहती हूं कि उन जल्लाद आतंकवादियों के हाथ भी बंदूक चलाते-चलाते रुक जाते!! आप कहोगे कि इन आतंकवादियों के मन में यदि थोड़ी भी दया-माया होती तो वे आतंकवादी बनते ही क्यों? दोस्तो, किसी भी मनुष्य का जन्म आतंकवादी बनने के लिए नहीं होता है। कोई भी माता-पिता नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चे आतंकवादी बनें। यह वास्तविकता है कि ऐसे बहुत से आतंकवादी होंगे जो खुद नहीं चाहते कि उनके बच्चे आतंकवादी बनें। हम कई पिक्चरों में देखते है कि बड़े से बड़े डाकु, स्मगलर आदी भी अपने काले धंधे अपने खुद के बच्चों से छिपाकर रखते है, क्यों? क्योंकि हर इंसान मुलत: अच्छा होता है। और वो चाहता है कि उनके माता-पिता की नज़रों में एवं उनके बच्चों के सामने उनका उजला पक्ष ही आएं। कई बार जिंदगी में ऐसे क्षण आते है जब इंसान सही या गलत का फैसला नहीं कर पाता। हमारा एक गलत फैसला हमें गुनाहों की दुनिया में फेंक देता है और हम चाह कर भी वापस नहीं मूड सकते। इसलिए ही तो कहते है कि गुनाहों की दुनिया में इंसान जाता अपनी मर्ज़ी से है लेकिन अपनी मर्ज़ी से वहां से निकल नहीं सकता! मुझे लगता है कि इन आतंकवादियों का भी सिर्फ एक गलत फैसला ही उन्हें आतंकवादी बनाता होगा।

इसलिए जब भी संभव हो, अपनेआप से यह सवाल ज़रुर पूछिए। ताकि इस एक सवाल के जरिए हम हमारे महान भारत को महानता की ओर कदम बढ़ाने में सहायता कर सकें!

Keywords:Decision making, Mother and Father, terrorist, one question

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते...!
यदि मेरे माता-पिता देख रहे होते...!
एक ऐसा सवाल, जो हम सब की जिंदगी बदल सकता है। हमें अनैतिक कार्य करने से रोक सकता है!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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