कहानी- बोझ

मैं सोच रहीं थी कि लतिका की शादी हो जाएं तो मेरा एक बोझ कम हो। लेकिन लतिका ने ऐसा क्या किया कि मेरी पूरी सोच ही बदल गई।

कहानी- बोझ
''दीदी, कहाँ खो गई हो? ध्यान कहां हैं आपका? आप गैस के सामने खड़ी हो और दूध उफनकर नीचे गिर रहा हैं, लेकिन आपका ख्याल हीं नहीं हैं।'' ''हां...अं...'' जब छोटी बहन अनिता ने मुझे कहा तो मेरी तंद्रा तुटी। 
मैं ने जल्दी से गैस बंद की और गैस साफ़ करते-करते ही कहा, ''कुछ नहीं, बस ऐसे ही...'' 
''मैं जानती हूं दीदी, आप लतिका के बारे में सोच रहीं हैं न?''  
''हाँ, सोच तो उसी के बारे में रहीं हूं। बहुत सोचने पर भी दिमाग काम ही नहीं करता। लतिका गोरे रंग की, सुंदर, पढ़ी-लिखी, इंजीनियर लड़की हैं। ईश्वर ने हर गुण से नवाजा हैं उसे और लतिका ने भी अपनी मेहनत और लगन से अपने गुणों को निखारा हैं। पच्चीस लाख का पैकेज हैं उसका। इतनी सर्वगुणसंपन्न लड़की को जब लड़के वाले 'ना' कहते हैं तो एक माँ के दिल को ठेस तो पहुँचेगी न? आज सातवी बार लड़के वाले लतिका को देखने आएं हैं। उनके चेहरे से तो लग रहा था कि उनकी 'हाँ' ही होगी। लेकिन जब उन्होंने कहा कि घर जाकर जबाब देते हैं तो न जाने क्यों मन में शंका-कुशंकाएं आ रहीं हैं।'' 
''दीदी, आइए हम हॉल में आराम से बैठ कर बातें करते हैं।'' हॉल में कुलर चालु कर आराम से सोफ़े पर बैठी तो थोड़ा सा सुकून मिला। सुबह से लड़के वालों की आवभगत करते-करते बहुत थकान महसुस हो रहीं थी। उपर से मन में चिंता थी कि कहीं इस बार भी लड़के वाले 'ना' न कह दे। 
''दीदी, इस बार उम्मीद तो पूरी हैं कि लड़के वालों की 'हाँ' ही होगी। देखा नहीं आपने कि लड़का और उसकी मम्मी किस प्यार भरी निगाहों से लतिका को निहार रहे थे। लड़के की मम्मी ने तो कह भी दिया था कि उसे तो लतिका बहुत पसंद हैं अब निर्णय सिर्फ़ लड़के के उपर हैं।''  
''ऐसा पहली बार थोड़े ही हो रहा हैं। हर बार लड़के वालों के चेहरे से, उनके हाव-भावों से हमें ऐसा लगता हैं की इस बार लड़के वाले 'हाँ' ही करेंगे। लेकिन हर कोई घर जाने पर दूसरे दिन फोन पर अपनी 'ना' बताता हैं। कुछ समझ में ही नहीं आ रहा हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा हैं? अ‍ॅक्सिडंट में तेरे जिजाजी गए तब लतिका 5 साल की थी और पवन 2 साल का था। अ‍ॅक्सिडंट में पवन के दोनों पैर चले गए थे। तब से आज तक पवन के सभी काम मैं और लतिका मिल-जुल कर करते हैं। किसी तरह सिलाई-कढ़ाई करके मैं ने लतिका को पढ़ाया। कभी-कभी मन में आता हैं कि आखिर कब तक ईश्वर मेरी सहनशक्ति की परीक्षा लेंगे? तेरे जिजाजी के जाने के बाद पूरे बीस साल से घर गृहस्थी का बोझ उठा रहीं हूं। सभी रिश्तेदारों ने हमसे मुंह मोड लिया था। क्योंकि उन्हें लगता था कि कहीं मैं उनसे कुछ सहायता न मांग लूं! कहते हैं कि बुढ़ापे में बेटा हमारा सहारा होता हैं लेकिन यहां पर तो 22 साल के जवान बेटे को मेरे सहारे की जरुरत हैं! सोचती हूं कि एक बार लतिका के हाथ पीले हो जाएं तो कम से कम एक 'बोझ' से तो मुक्ति मिले! लेकिन न जाने मेरी किस्मत कैसी हैं कि इतनी सर्वगुणसंपन्न लड़की भी लड़के वालों को पसंद नहीं आ रहीं। मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा हैं।'' 
''क्या आपने कभी लतिका से इस बारे में बात की?''  
''अरे, ना लडकेवालों की तरफ से हो रहीं हैं, तो इसके लिए मैं लतिका से क्या बात करूं?''  
''दीदी, शायद आपका इस बात की ओर ख्याल ही नहीं गया कि जब भी लड़के वाले उसे देखने आते हैं पहले वे खुश होते हैं। उनके चेहरों से ही लगता हैं कि उनकी 'हां' ही हैं। लेकिन जब लड़का और लड़की अकेले में मिलते हैं उसके बाद लड़के के चेहरे पर थोड़ी सी उदासी दिखती हैं। क्या आपने इस ओर ध्यान दिया?''  
''मेरा तो इस बात की ओर ध्यान ही नहीं गया। तेरा कहने का मतलब क्या हैं?''  
''कहीं लतिका लड़के से ऐसी कोई बात तो नहीं कहती जो उन्हें नापसंद हो... '' 
''लतिका ऐसा कुछ क्यों कहेगी? उसके साथ सलाह-मशवरा करने के बाद, शादी के लिए उसकी हां होने के बाद, लड़के का पूरा बायोडाटा उसे बताने के बाद, लड़के के बारे में पूरी छानबीन करके ही मैं लडकेवालों को लड़की देखने हेतु बुलाती हूं। हर लड़के के लिए मैं ने पहले लतिका की राय जानी हैं। फ़िर वो ऐसी बात क्यों करेगी जिससे लड़का उसे ना कहे?''  
''दीदी, फिर भी मुझे लगता हैं कि इस बारे में तुम्हें एक बार लतिका से बात करनी चाहिए।''  
इतने में लतिका सभी के लिए नाश्ता लेकर आई। ''मम्मी और मौसी जी लीजिए नाश्ता कीजिए।'' मैं एकदम से बोल पड़ी, ''नाश्ता बाद में करेंगे। पहले ये बता कि जब तू लड़के से अकेले में मिलती हैं तो उसे ऐसा क्या कह देती हैं कि तुझसे मिलने के बाद उसके चेहरे का रंग ही बदल जाता हैं। तुझे आज तक जितने भी लड़के देखने आएं सभी के चेहरे से लगता हैं कि तू उन्हें पसंद हैं लेकिन बाद में वे कहते हैं कि घर जाकर जबाब देंगे और उनका जबाब 'ना' होता हैं। कितनी मुश्किल से अपने अरमानों का गला घोंट कर तुम दोनों भाई-बहनों को मैं ने अकेली ने पाला। समाज के कितने ताने सहे। पवन को तो जिंदगी भर मुझे संभालना ही हैं। कम से कम तेरा बोझ तो सर से उतरे!! मुझे थोड़ी सी तो शांति मिले। लेकिन नहीं, मेरी तो किस्मत ही फूटी हैं। थक गई हूं मैं बोझ उठाते-उठाते!'' मैं बुरी तरह फट पड़ी। 
''मम्मी, मैं आपके उसी बोझ को तो कम करने की बात करती हूं सबसे! '' लतिका धीरे से बुदबुदाई। 
''क्या मतलब हैं तेरा? मैं कुछ समझी नहीं।'' 
''मम्मी, मुझे अच्छे से पता हैं कि आपने हम दोनों भाई-बहनों के लिए क्या-क्या कुर्बानियां दी। पापा गए तब आपकी उम्र सिर्फ़ 28 साल थी। आप चाहती तो दूसरी शादी भी कर सकती थी। लेकिन आपने हमारी वजह से ऐसा नहीं किया। हमारी खुशी के लिए आपने अपनी हर खुशी को नजरअंदाज किया। माना कि अभी आप तंदुरुस्त हैं। लेकिन आपकी भी उम्र हो रहीं हैं। धीरे-धीरे आपको भी थकान आएगी। मैं ससुराल चली जाउंगी तो पवन की देखभाल कौन करेगा? इसलिए मैं लड़के से कहती हूं कि मैं उनके परिवार के हर सदस्य का तन-मन-धन से पूरा-पूरा ख्याल रखुंगी। सास-ससुरजी की भी दिलोंजान से सेवा करुंगी। लेकिन मेरी भी एक शर्त हैं...जब-तक मेरी मम्मी तंदुरुस्त हैं, उनके हाथ-पैर काम कर रहें हैं...तब-तक कोई बात नहीं लेकिन जब मेरी मम्मी की तबियत अच्छी नहीं रहेगी तब मम्मी और पवन दोनों हमारे साथ रहेंगे।''  
ओ माय गॉड...कितना कुछ कह डाला मैं ने उसे! बोझ तक कह डाला!! जो लड़की इतना दूर का सोचती हैं…जो अपनी मम्मी और भाई दोनों का बोझ उठाने तैयार हैं...लाखों में कमा रहीं हैं उस प्यारी सी बिटिया को मैं ने 'बोझ' कहा। मुझे अपने आप से ग्लानी होने लगी। लेकिन मेरी भी क्या गलती? बचपन से यहीं सुनती आई हूं कि लड़कियाँ बोझ होती हैं। अत: मेरे दिमाग में भी यहीं बात घर कर गई कि बेटियां बोझ होती हैं। इसलिए अनजाने में यहीं शब्द इतनी होनहार बेटी के लिए मुंह से निकल गया। 
''लेकिन बेटा, कोई भी लड़का तेरी इस अनोखी शर्त को कैसे मानेगा? किसी का भी दिल इतना बड़ा नहीं होता कि वो पत्नी के साथ-साथ उसके भाई और मम्मी की ज़िम्मेदारी उठाने तैयार हो! तेरी ऐसी शर्त से तो तेरी शादी ही नहीं हो पायेगी। क्यों कहीं तुने लड़कों से ऐसी शर्त? मुझे कुछ नहीं होगा बेटे...तुझे पता हैं मैं अपने खानपान का...अपनी सेहत का बहुत ख्याल रखती हूं...व्यायाम आदि भी बराबर करती हूं क्योंकि मुझे पता हैं कि मैं तंदुरुस्त रहुंगी तो ही अपने बच्चों का ख्याल रख पाउंगी। मैं सब मैनेज कर लुंगी बेटे...तू अभी फोन करके लड़के को बोल दे कि तू अपनी शर्त वापस ले रहीं हैं...'' 
इतना कहते कहते मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं पाई और रोने लगी। अनिता और लतिका दोनों की आंखों में भी आँसू आ गए। 
''मम्मी, कोई न कोई तो होगा जो मेरी भावनाओं को समझ कर...मेरी शर्त को मान कर शादी के लिए हां कहेगा...वैसे भी शादी करना ही जीवन का अंतिम उद्देश नहीं हैं। जैसे अभी तक कमा खा रहे हैं वैसे आगे भी जी लेंगे...बचपन से पाला हैं हमने पवन को उसको ऐसे कैसे छोड़ सकते हैं?''  मैं सोचती ही रह गई कि आखिर दुनिया बेटियों को बोझ क्यों कहती हैं? आज बेटियां भी इतनी सशक्त हैं कि वे हर तरह का बोझ उठा सकती हैं!!!

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COMMENTS

BLOGGER: 14
  1. बेहद हृदयस्पर्शी कहानी ज्योति बहन

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  2. Bahut hi badhiya, Dil ki chu lenewali kahani hai

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  3. मर्मस्पर्शी कहानी बहुत प्रेरक और सीख देती सच बेटियां बोझ नही होती बल्कि सा आरा होती है भावात्मक और सकारात्मक।

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  4. मार्मिक कह सकते हैं
    पर इसे समझदारी भी कहा जा सकता है
    भाई और माँ का प्यार ही बाँधकर रखा है
    सादर

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  5. शिक्षाप्रद कहानी सखी,

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  6. बेहद हृदयस्पर्शी कहानी ज्योति जी.

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  7. ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 10/05/2019 की बुलेटिन, " प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की १६२ वीं वर्षगांठ - ब्लॉग बुलेटिन “ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. मेरी पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, शिवम जी।

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  8. bahUt BadHiya POst Hai dil ko ChCHu Lene vali kahaNi

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  9. सार्थक संद्वेश देती उद्देश्यपूर्ण एवं प्रेरक कहानी ! बधाई ज्योति जी !

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  10. आज के समय में तो बेटियाँ ही सहारा बनती हैं माँ बाप का ...
    सार्थक सन्देश है इस कहानी में ...

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  11. बहुत मर्मस्पर्शी कहानी ज्योति जी

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  12. Thanks for sharing this valuable information with us

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नाम

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: कहानी- बोझ
कहानी- बोझ
मैं सोच रहीं थी कि लतिका की शादी हो जाएं तो मेरा एक बोझ कम हो। लेकिन लतिका ने ऐसा क्या किया कि मेरी पूरी सोच ही बदल गई।
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
https://www.jyotidehliwal.com/2019/05/Kahani-bojh.html
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