कहानी- भोंदू

जिस भोंदू से शादी करने कोई भी लड़की तैयार नहीं थी, उस भोंदू से सुनिता ने शादी क्यों की? शादी के बाद कैसा था उसका वैवाहिक जीवन? क्या सुनिता खुश थी?

कहानी- भोंदू

''मम्मी,
आपने दिवाली पर जो शक्करपारे, गुझिया और आलू की मठरियां भिजवाई थी, वो हमारे यहां पर सभी को बहुत पसंद आई थी। आपने कहा था कि वो आपने नहीं बनाई थी, खरीदी थी। आपने वो कौन सी दुकान से खरीदी थी? मैं बाजार जा रही हूं, आप मुझे दुकान का नाम बता दीजिए। मैं खरीद लुंगी।'' मैं ने कहा। 
''वो किसी दुकान से नहीं खरीदी थी।'' 
''मतलब? आपने ही तो कहा था न कि वो सब सामान आपने घर में नहीं बनाया था। फिर?''

 ''अरे, वो अपना भोंदू है न, उसकी पत्नी सुनिता बनाती है ये सब सामान। अब तो अपने मोहल्ले में ज्यादातर घरों में ये सब नाश्ता कोई नहीं बनाता। सब सुनिता से खरीद लेते है।'' 
''भोंदू की पत्नी? कब हुई उसकी शादी? उस भोंदू से शादी करने कोई लड़की कैसे तैयार हो गई? उसके माता-पिता ने भी कैसे अपनी लड़की की शादी एक भोंदू से कर दी?''  
''सुनिता के पापा की अचानक हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। ये लोग पहले ही बहुत गरीब थे और एकलौते कमाने वाले की मौत से इन पर दुखों का पहाड़ टूट गया था। सुनिता के दो छोटे भाई-बहन है। सुनिता की माँ और बच्चे मिल कर किसी तरह अलग-अलग तरह का नाश्ता घर में बना कर बेचने लगे। किसी तरह दो रोटी का जुगाड़ हो रहा था। लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी वे इतना नहीं कमा सके कि शादी के लिए दहेज जमा कर सके। गरीबी इंसान से कुछ भी समझौता करवा लेती है, बेटा!'' 

''लेकिन माँ, एक अच्छी भली लड़की की शादी भोंदू से करवाना...ये कहां का न्याय है?''  
''तू भोंदू के यहां चली जा। तुझे जो जो सामान लेना है वो ले ले। चाची से और सुनिता से भी मिल लेना। भोंदू भी अब बहुत बदल गया है। लगता ही नहीं ये पहले वाला भोंदू है। सुनिता से मिल कर तुझे सुनिता के लिए अफसोस नहीं, गर्व होगा।'' 

मैं असंमजस में पड़ गई। सामान खरीदने से ज्यादा मुझे सुनिता से मिलने की इच्छा तीव्र हो उठी कि ऐसा क्या है सुनिता में जो मम्मी उसकी इतनी तारीफ़ कर रही है? माना कि उसके हाथ में जादू है (क्योंकि उसके हाथ का बना नाश्ता मैं खा चुकी थी) लेकिन मम्मी तो उसकी कुछ ज्यादा ही तारीफ़ कर रही है। 

भोंदू का घर हमारे घर से चार घर बाद में ही था। भोंदू आदि तीन भाई थे। उनमें भोंदू मझला था। बड़ा भाई और छोटा भाई तो पढ़ने में ठीक ठाक थे लेकिन भोंदू का पढ़ाई में मन ही नहीं लगता था। किसी तरह खींच तान कर बॉन्ड्री पर पास होकर उसने मैट्रिक पास की। इसलिए घर के सभी लोग उसे भोंदू कह कर ही बुलाते थे। जब घर के लोग भोंदू कहते थे तो बाहर के लोग भी उसे भोंदू ही कहने लगे। उसका असली नाम किसी को पता भी नहीं था। ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं होने से दोनों भाई उससे अपमानजनक व्यवहार करते। उनके यहां किराना की दुकान थी। छोटा भाई और बड़ा भाई तो दुकान मालिक की तरह देखते और भोंदु से नौकरों जैसा काम करवाते। उसके छोटे भाई की शादी हुए चार साल हो गए थे। लेकिन भोंदू को कौन लड़की देगा यह सोचकर उसके माता-पिता ने भी उसकी शादी के बारे में सोचना छोड़ दिया था। ऐसे में अब भोंदू की शादी? 

उत्सुकतावश पहले बाजार न जाकर मैं भोंदू के यहां चली गई। आंगन में ही चाची (भोंदू की माँ) मिल गई। 
''शिल्पा तुम? कैसी हो? कब आई बेटा?''  
''मैं ठीक हूं। आप लोग कैसे हो?''  
''हम भी बहुत अच्छे है बेटा। अब तो सुनिता जैसी बहू पाकर मैं धन्य हो गई।''  
मैं मन ही मन सोचने लगी कि मेरी मम्मी के साथ-साथ चाची भी सुनिता की तारीफ़ कर रही है। मतलब कुछ तो खास है, सुनिता में! बात करते-करते ही मैं चाची के साथ घर में गई। एक कमरे में सुनिता मठरियां तल रही थी और दो लड़कियां मठरियां बेल रही थी। साधारण साड़ी में बिना किसी मेकअप के भी सुनिता आत्मविश्वास से भरी हुई बहुत सुंदर लग रही थी। वो बहुत ही गर्मजोशी से मुझ से मिली। उससे मिल कर ऐसा लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे है। इतने में भोंदू भी सामान की डिलिवरी देकर वापस आ गया। वो ग्राहको से बहुत अच्छे से बात कर रहा था। उसके कपड़े पहनने का तरीका सुधर गया था। सबसे बड़ी बात उसकी हकलाहट भी कम हो गई थी। उसने मुझ से भी बहुत अच्छे से बात की। भोंदू में इतना बदलाव देख कर मैं आश्चर्यचकित रह गई। मम्मी ने बताया था कि भोंदू की शादी को सिर्फ़ एक साल हुआ है। सिर्फ़ एक साल में इतना परिवर्तन? सुनिता को देख कर मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि इतनी सर्वगुणसंपन्न लड़की एक भोंदू से शादी करने कैसे तैयार हो गई? 

जब मौका देख कर मैं ने सुनिता से पूछा कि तुम्हारे हाथ में तो इतना हुनर है, तुम सुंदर हो फ़िर तुम एक भोंदू से शादी करने कैसे तैयार हो गई? 
''माफ़ करना दीदी। इनका नाम भोंदू नहीं, सुमित है। कृपया इन्हें भोंदू कह कर नहीं, सुमित नाम से ही संबोधित करिये। मैं ने इनसे भी कह दिया था कि यदि कोई तुम्हें भोंदू कहे तो उसकी बात मत सुनिए। क्योंकि आप भोंदू हो ही नहीं। धीरे धीरे घर और बाहर के सभी लोग इन्हें सुमित कह कर ही संबोधित करने लगे है।'' 

सुनिता ने मेरी बोलती ही बंद कर दी। अपने पति के लिए इतना प्यार...इतना सम्मान? 
''सॉरी। मुझे आज तक उसका नाम सुमित है ये पता ही नहीं था। लेकिन अभी भी मेरा सवाल वहीं पर है कि तुम सुमित से शादी करने तैयार कैसे हो गई? और तुमने सुमित में इतने कम समय में इतना बदलाव कैसे लाया?''   

''मेरे मायके की गरीबी की वजह से मेरी शादी नहीं हो रही थी। जो रिश्ते आ रहे थे वे ज्यादातर दूजवर के ही थे। उन्हें पत्नी नहीं, पत्नी के रुप में एक कामवाली और बच्चों के लिए एक आया की ही जरूरत थी। मेरी शादी न होने पर मम्मी को भी टेंशन हो रहा था। फिर मेरी छोटी बहन भी थी। इसलिए हालात से समझौता करते हुए मैं ने शादी के लिए हामी भर दी। वैसे जब मैं पहली बार इनसे मिली थी तो इनकी सादगी और सच्चाई ने मेरा मन मोह लिया था।  

शादी के बाद मुझे पता चला कि सुमित असल में भोंदू थे ही नहीं। वे एक बहुत ही सीधे और सच्चे इंसान है। हां, आजकल के नवयुवकों के तरह के झुठ-फरेब और होशियारी इनमें नहीं है। ये घर और दुकान के सभी काम करते है। जेठजी और देवरजी के बाहर जाने पर अकेले दुकान भी संभालते है। घर में किसी भी सदस्य के हर सुख दुख में आधी रात को एक पैर पर खड़े रहते है। अभी हम जो मिठाई और नमकीन का काम कर रहे है, तो बाजार से कच्चा माल लाने से लेकर नमकीन-मिठाई की होम डिलिवरी देने तक सभी काम वे बहुत ही अच्छे तरीके से संभाल रहे है। उनके सहयोग के बिना मैं ये काम कर ही नहीं सकती थी। अब आप ही बताइए कि ये भोंदू कैसे हुए?''  

''तुमने सुमित में ये बदलाव कैसे लाया?''  
''दीदी, जब मैं ने देखा कि इनका व्यवहार बहुत ही अच्छा है। ये घर और दुकान के सभी काम अच्छे से कर रहे है, तब मैं ने मम्मीजी से इनके बचपन से लेकर अभी तक की जानकारी हासिल की। हुआ ये था कि बचपन में दोनों भाइयों के मुकाबले ये पढ़ाई में कमजोर थे। घरवाले दोनों भाईयों से इनकी तुलना कर इन्हें भोंदू कहने लगे। इनके मन में भी यह हीन भावना बैठ गई कि मैं भोंदू हूं...मुझे कुछ नहीं आता! इसलिए ये जो थोड़ी-बहुत पढ़ाई करते थे वो भी छोड़ दी। किसी तरह सिर्फ़ मैट्रिक तक पढ़ कर ही रह गए। दोनों भाई भी दुकान में या घर में जब भी कोई फैसला लेने की बात होती तो झट से कहते कि तू तो भोंदू है...तुझे क्या पता? तुझ से ये काम नहीं हो पाएगा...आदि। इस तरह ये दुकान में सिर्फ़ नौकर बन कर रह गए। इनके अंदर हीन भावना इतनी ज्यादा भर गई कि भाइयों द्वारा बार-बार अपमान करने का भी इनको बुरा नहीं लगता था। इनको लगता था कि मैं अपमान के ही लायक हूं। ये सब देख कर मैं ने मन ही मन फैसला लिया कि इनको इनका सम्मान दिला कर रहुंगी। मैं ने मम्मीजी से कहा कि मैं मिठाई और नमकिन बनाने का काम करना चाहती हूं। मम्मीजी ने कहा कि भोंदू तो कुछ काम का नहीं। तु अकेले कर पायेगी ये काम? 

''मम्मीजी मैं अकेले क्यों करुंगी? सुमितजी और मैं दोनों मिल कर करेंगे।'' मम्मीजी और ये तो किसी तरह मान गए लेकिन इनके दोनों भाई नहीं माने क्योंकि उनके पास का मुफ्त का नौकर जो चला जाने वाला था। किसी तरह उन लोगों को भी मनाया। पहले बिल्कुल छोटे पैमाने पर मैं अकेले जितना नाश्ता बना सकती थी उतना बना कर बेचना शुरु किया। लोगों को मेरे द्वारा बनाया नाश्ता पसंद आने लगा। धीरे धीरे माल की डिमांड बढ़ने पर मैं ने मेरी मदद के लिए दो लड़कियां भी रख ली। मेरी और इनकी मेहनत रंग लाई। परिणाम आप स्वयं देख ही रही हो। 

''सुनिता, मैं तुम्हारे हौसले को सलाम करती हूं। जिस तरह तुमने सुमित की हीन भावना दूर कर उसमें नया जोश भरा वाकई वो काबिले तारीफ़ है।''  

घर आने पर मैं सोचने लगी कि सचमुच आज समाज में ऐसे कई सुमित होंगे जो भोंदू न होते हुए भी घरवालों द्वारा उनमें हीन भावना भरने से वे भोंदू बन गए! सचमुच यह माता-पिता की ही गलती होती है कि वे अपने बच्चों में तुलना कर अनजाने में थोड़े से कमजोर बच्चे को और कमजोर बना देते है!! 

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COMMENTS

BLOGGER: 21
  1. बहुत ही सुन्दर शिक्षाप्रद कहानी ।हार्दिक शुभ कामनाएं।

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  2. स्वयंसिद्धा की कहानी याद आ गयी.
    सुमित को भौन्दू बनाने वाले चाहे जितने हों पर उसे फिर से सुमित बनाने के लिए अकेली सुनीता ही काफ़ी होती है.

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    1. गोपेश भाई, इसलिए ही तो कहते है न कि प्यार में बहुत ताकत होती है।

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  3. सकारात्मक सोच से कुछ भी संभव है. हीन भावना एक बार मन में बैठ जाती तो वह सामान्य लगने लगता है और जब आत्मविश्वास आता है तब आदमी का असली गुण सामने आता है. बहुत सार्थक कहानी. बधाई.

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  4. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार( 04-06-2021) को "मौन प्रभाती" (चर्चा अंक- 4086) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.


    "मीना भारद्वाज"

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    1. मेरी रचना को चर्चा मंच में शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, मीना दी।

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  5. नमन आपको .. आपकी इस रचना से तीन बातें मुखर हो कर मानो चीख़ती हुई प्रतीत हो रही है :-
    1) हमारे समाज में आर्थिक रूप से कमजोर किसी परिवार की लड़की की मज़बूरी में की जाने वाली शादी का सटीक शब्द-चित्रण, जो आम है।
    2) समाज में "भोंदू" जैसे चरित्र के लिए अनायास "अनाड़ी" (पुरानी) फ़िल्म का गाना गुनगुनाने के लिए मज़बूर होना पड़ता है कि- "सब कुछ सीखा हमने, ना सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाड़ी ~~~"
    3) समाज में स्वयं मज़बूरी में भी आत्मविश्वास से लबरेज़ और मज़बूरी को ही अस्त्र बनाने वाली किसी "सुनिता" जैसी पात्रा का होना ही काफ़ी है, "भोंदू" को "सुमित" बनाने के लिए।

    (ज्योति बहन ! अगर अन्यथा ना लें तो कृपया "हिनभावना = हीन भावना" सुधार दीजिए।)

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    1. सुबोध भाई,मेरी रचना को बारीकी से पढ़ कर उसका इतना सटीक विश्लेषण करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।
      मात्रा की त्रुटि इंगित करने के लिए पुनः धन्यवाद।

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  6. बढ़िया प्रस्तुति

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  7. सार्थकता और संयम हर बात का हल खोज लेता है ...
    ये सकारात्मक विचार खुले मन से हर किसी को सहज देखने कीआदत डालता है और अजनाने ही पहचान करा देता है ... सार्थक कहानी है ...

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  8. सुन्दर एवं शिक्षाप्रद कहानी। हर व्यक्ति के अन्दर कुछ नैसर्गिक गुण होते हैं लेकिन हम लोग यह बात भूल जाते हैं और बने बनाए मापदंडों से उनकी तुलना करने लगते हैं। आपने सही कहा कई लोग ऐसी ही तुलना के चलते वह सब हासिल नहीं कर पाए जो कि वह कर सकते थे।

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  9. भोंदू के माध्यम से आपने सीख दी है कि परिवार में भी किसी की कमियों को उजागर कर जहां किसी को भोंदू बनाया जा सकता है तो वही किसी का हौसला बढ़ाकर उसकी कमियों को दूर कर उसे आत्मविश्वास से भरपूर सफल इंसान भी बनाया जा सकता है...
    बहुत ही सार्थक एवं शिक्षाप्रद कहानी...।

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  10. बहुत ही गहनता छिपी है आपके लेखन में...।

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  11. हाँ ज्योति जी ये माता-पिता की ही गलती होती है जो अपने बच्चों का मनोबल गिरा कर उसका चित्र और चरित्र दोनों बदल देते है। वैसे सच पूछे तो मेरी नज़र से ज्यादा गलती माँ की होती है। एक औरत ही किसी भी व्यक्ति का चरित्र निर्माण करने में अहम भूमिका निभाती है फिर चाहे वो माँ के रूप में हो या सुनीता जैसी पत्नी के रूप में ,बहुत सुंदर सीख देने वाली कहानी।सादर नमन आपको

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  12. बहुत बढ़िया लगा पढ़कर। बाकी किसी को परीक्षा के अंको से आंकना सही नही है।

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  13. ज्योति जी हमारे समाज में ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे जिन्हें भोंदू बनाने का काम उनके अजीज सगे संबंधियों ने किया है, मशहूर कहावत है कि किताब का कवर देख कर उसकी कहानी को आप नहीं समझ सकते,कोई किताब गीता हो सकती है,तो कोई मनोहर कहानियां। आपने मानव मन की श्रेष्ठता का सटीक विश्लेषण किया है इस कहानी में। बहुत बहुत शुभकामनाएं आपको

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  14. बहुत बढ़िया ज्योतिजी !

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  15. अच्छा साथी जीवन की राह बदल देता है.
    बहुत अच्छी रचना !

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  16. सुन्दर प्रेरणादायी रचना!

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नाम

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: कहानी- भोंदू
कहानी- भोंदू
जिस भोंदू से शादी करने कोई भी लड़की तैयार नहीं थी, उस भोंदू से सुनिता ने शादी क्यों की? शादी के बाद कैसा था उसका वैवाहिक जीवन? क्या सुनिता खुश थी?
https://1.bp.blogspot.com/-Bo-oz0k0qfI/YLYfdZP2x9I/AAAAAAAAU6c/0RW3Vcj4LUkvWaefXy38SwftBbmfQVmXACLcBGAsYHQ/w400-h266/Untitled-1%2Bcopy.jpg
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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