मुबारकपुर कला गांव वालों के स्वाभिमान को सलाम!!

जानिए, अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए क्या किया मुबारकपुर गांव वालों ने...कि उनके स्वाभिमान को सलाम करने को जी चाहता हैं?

मुबारकपुर कला गांव वालों के स्वाभिमान को सलाम!!
मुफ़्त का माल किसे अच्छा नहीं लगता और वो भी सरकार खुद होकर बिना मांगे दे रहीं हो तो? आज के जमाने में, ऐसा कौन हैं जो आती हुई लक्ष्मी को ठुकराए! लेकिन क्या आपको पता हैं कि आज के जमाने में भी ऐसे स्वाभिमानी लोग हैं जो अपने स्वाभिमान के लिए आती हुई लक्ष्मी को ठुकराने की हिम्मत कर सकते है? हां दोस्तों, बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया!' के इस दौर में भी मुबारकपुर कला गांव के लोगों को स्वाभिमान से सौदा करना मंज़ूर नहीं हैं, गैरों के उपकार तले जीना स्वीकार नहीं हैं। इस गांव के लोगों ने स्वाभिमान की वो मिसाल पेश की हैं कि उनके स्वाभिमान को मैं व्यक्तिश: सलाम करती हूं और मुझे पूरा विश्वास हैं कि इनके बारे में जानकर आप भी हैरान रह जायेंगे और आप भी उन्हें दिल से सलाम करेंगे!

मैं ने एक बार चीन के लोगों के स्वाभिमान का एक किस्सा पढ़ा था। वो पढ़ कर मेरे मन में यहीं बात आई थी की वो चीन हैं यहां भारत में ऐसे लोग नहीं हैं। माफ़ कीजिएगा.. मेरे अपने देश के लोगों के लिए मेरे मन में ऐसा आया! लेकिन मेरे ऐसे विचार बनने के पीछे का कारण आप भी अच्छे से जानते हैं। मुबारकपुर गांव वालों ने स्वाभिमान की मिसाल कायम कर मेरी इस विचारधारा को बदल दिया! मेरे भारत देश में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं, यह जानकर मुझे बहुत गर्व की अनुभूती हो रही हैं। चीन का किस्सा इस प्रकार था।

सन 1962 के करीब चीन में एक अकाल पड़ा। इन अकाल पीड़ितों के सहायतार्थ इंग्लैंड से उनके कुछ दोस्तों ने खाद्य सामग्री, कपड़े और दवाईयां भेजी। सहायता सामग्री लेकर जब वह जहाज़ चीन पहुंचा तो चीनियों ने वह जहाज़ किनारे से ही लौटा दिया! और उस जहाज़ पर लिख दिया कि “धन्यवाद, हम मर सकते हैं लेकिन किसी भी हालत में भीख नहीं ले सकते!” होगा चीन कैसा भी देश और होगी उसकी नीतियाँ कितनी ही घातक लेकिन बात उन्होनें स्वाभिमान की कहीं!!

क्या किया मुबारकपुर कला गांव वालों ने?
कई सालों से देश को ''खुले में शौच'' से मुक्ति दिलाने की कोशिशें चल रही हैं। ग्रामीण इलाकों में शौचालय बनाने के लिए प्रशासन वित्तीय सहायता उपलब्ध कराता हैं। उत्तर प्रदेश के बिजनौर के इस गांव वालों ने प्रशासन से मिल रही 17.5 लाख रुपए की मदद को ठुकरा कर अपने दम पर गांव को ‘खुले में शौच से मुक्ति’ दिलाई हैं।

मुस्लिम बहुल इस गांव में 661 परिवार रहते हैं। 3,500 की जनसंख्या वाले इस गांव के केवल 146 घरों में शौचालय थे, बाकी के परिवार खुले में ही शौच जाते थे। जिला प्रशासन ने गांव की प्रधान किश्वर जहां को शौचालय बनवाने के लिए सहायता देने का विकल्प दिया। किश्वर ने शौचालय का प्रपोजल प्रशासन को भेज दिया। प्रशासन की तरफ़ से 17.5 लाख रुपए प्रधान के जॉइंट अकाउंट में आ भी गए। लेकिन प्रशासन के लोग उस दिन हैरान रह गए जब गांव वालों ने पैसे लेने से मना करते हुए पैसा वापस भेज दिया। गांव वालों ने कहा था, ''यह रमजान का महिना हैं और अच्छे कामों के लिए मदद ली नहीं, दी जाती हैं। घरों में शौचालय बनाना अच्छा काम हैं और यह हम खुद करेंगे।''

इस पर सीडीओ ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ''संभवत: यह राज्य का पहला गांव हैं जिसने पैसे लेने से मना करते हुए शौचालय बनवाए हैं। यह खुशी की बात हैं। मुबारकपुर कला के लोगों ने हम सभी के लिए एक मिसाल पेश की हैं।''

इंस्पेक्शन के बाद मुबारकपुर कला गांव को ''खुले में शौच से मुक्त'' घोषित कर दिया गया हैं। गांव की प्रधान किश्वर जहां ने कहा, ''महिलाओं समेत गांव के सभी लोग अपने पैसों से शौचालय बनवाने तैयार थे क्योंकि उनके मुताबिक यह उनका कर्तव्य था। जो लोग अपने पैसों से शौचालय नहीं बनवा सकते थे उनकी हम सब ने मिल कर मदद की हैं। गांव के लोगो ने सिर्फ़ पैसे से नहीं तो मजदूरी में भी एक-दूसरे की सहायता कर शौचालय बनवाए हैं।''
शायद आप सोच रहे होंगे कि (661-146) 515 परिवार के लिए 17.5 लाख रुपए...इतनी छोटी रकम ठुकराना कोई बड़ी बात नहीं हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि शौचालय बनवाने के लिए पैसा न होने के कारण जो परिवार शर्मनाक तरिके से खुले में शौच करने को बाध्य हैं उस परिवार के लिए छोटी सी सहायता कितनी मायने रखती हैं? सवाल यह नहीं हैं कि उन्होने कितनी राशी ठुकराई...महत्वपुर्ण ये हैं कि उन्होंने राशी ठुकराने की हिम्मत दिखाई! जैसे बारिश की बूंंदे, भले ही छोटी हों, लेकिन उनका लगातार बरसना बड़ी-बड़ी नदियों का बहाव बन जाता हैं! ठीक वैसे ही हमारे छोटे-छोटे अच्छे प्रयास निश्चित ही जिंदगी में बड़े-बड़े बदलाव लाने में सक्षम हैं। आज भी बड़े-बड़े पैसे वाले छोटी से छोटी सरकारी सहायता प्राप्त करने हेतु तत्पर रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा कि हमारी इसी मानसिकता के कारण हम कई लोगों द्वारा ठगे जाते हैं। एक पर एक फ्री का लालच देकर बड़ी-बड़ी कंपनियां अपना निचले दर्जे माल हमें थमा देती हैं। चुनाव के वक्त जिस व्यक्ति में नगर निगम का अध्यक्ष बनने की काबिलियत नहीं हैं वो व्यक्ति फ्री में वस्तुएं बांट-बांट कर सांसद बन जाता हैं!

इसलिए मैं इन लोगों की ये सोच कि,
“इतने अमीर तो नहीं कि सब कुछ ख़रीद लें...पर इतने ग़रीब भी नहीं हुए कि खुद का स्वाभिमान ही बेच दें!!!”
को सलाम करती हूं। 

Keywords: Mubarakapur kala, Khule mein shauch, open defecation, self respect, 

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: मुबारकपुर कला गांव वालों के स्वाभिमान को सलाम!!
मुबारकपुर कला गांव वालों के स्वाभिमान को सलाम!!
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