संस्मरण- जब मैंने भजिए बनाए...

मैंने ऐसे ही अपनी सहेलियों से कहा ''आज मैं तुम्हें असली के भजिए बनाकर दिखाती हूं।'' सहेलियां आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगी और पूछने लगी, ''तुम्हें आता है भजिए बनाना?''

                           
bhajie
बचपन की कुछ घटनाएँ ऐसी होती है, जो उनके अनोखेपन के कारण ताउम्र याद रहती है। उनमें से ही एक घटना तब की है, जब मैं चौथी कक्षा में थी। एक दिन मैं अपनी सहेलियों के साथ 'रोटी-पानी ' (खाना बनाने का खेल) खेल रही थी। मेरे पास खाना बनाने के लिए बहुत से छोटे-छोटे मिट्टी के, स्टील के बर्तन थे। मिट्टी का छोटा सा चुल्हा भी था। वैसे तो इस खेल में पूरा खाना झूठ-मूठ का ही होता था। जैसे सुबह की चाय बनाने के लिए, चुल्हें के उपर (चुल्हा बिना जलाए ही) एक बर्तन में पानी रक्खा और थोड़ी देर बाद, उसे कप में डाल कर, सभी असली चाय की तरह पी गए!


एक दिन मम्मी कहीं बाहर गई हुई थी। घर में हम बच्चों का ही राज था। न जाने उस दिन मुझे क्या हुआ, मैंने ऐसे ही अपनी सहेलियों से कहा ''आज मैं तुम्हें असली के भजिए बनाकर दिखाती हूं।'' सहेलियां आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगी और पूछने लगी, ''तुम्हें आता है भजिए बनाना?'' मैंने भी बड़े विश्वास से कह दिया, ''हां, हां, क्यों नहीं? मैं, मेरी मम्मी को देखती हूं न भजिए बनाते!'' सभी सहेलियां मेरी हंसी उड़ाने लगी। ''कुछ भी बोलती है। सिर्फ देखने से थोड़े ही बनाना आ जाएगा?'' मुझे और जोश चढ़ा। मैंने कहा,''भजिए बनाना कौन सी बड़ी बात है! मैं अभी बनाकर दिखाती हूं!''



बस फिर क्या था, भजिए बनाने की तैयारियाँ होने लगी। छोटे से चुल्हें के हिसाब से लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़े किए गए। मैं ने एक बर्तन में, बेसन में पानी डाल कर घोल तैयार किया। बाकायदा उसमें नमक एवं लाल मिर्च भी डाली गई। भजिए तलने के लिए चुल्हें पर छोटी सी कढई रखी गई। कढई में पानी डाला गया। जब पानी गरम होने लगा तब उसमें छोटे-छोटे भजिए डाले गए। लेकिन ये क्या? जैसे ही मैं ने भजिए कढई में डालें, वे सब फैल गए!! सभी सहेलियां मेरी ओर देख कर हँसने लगी। मैं ने कहा, "हंसो मत, शायद भजिए डालते वक्त मेरे से कोई गलती हो गई है। मैं दोबारा बना कर देखती हूं।"



कढई नीचे उतारी गई। कढई ठंडी होने पर, कढई को साफ कर के फिर वही क्रिया दोहराई गई। लेकिन ये क्या? फिर से पूरे की पूरे भजिए, कढई में फैल गए!! सभी सहेलियां मुझे चीढ़ाने लगी,"बड़ी आई भजिए बनाने वाली!" "बड़ी बोल रही थी न कि मैं मेरी मम्मी को देखती हूं न भजिए बनाते! अब दिखा न बना के!!" कोई कुछ बोल रही थी तो कोई कुछ! मैं अपनी नाकामयाबी पर रोने लगी क्योंकि मेरा विश्वास कि मुझे भजिए बनाना आता है, पूरी तरह टूट चुका था। इतने में मम्मी आ गई। मुझे रोता हुआ देख कर मम्मी पूछने लगी कि क्या हुआ? मैं तो लगातार रोए ही जा रही थी। सहेलियों ने ही मम्मी को सारा किस्सा हंस-हंस कर बयान किया। सुन कर मम्मी को भी हंसी आ गई। मैं और जोर से रोने लगी।



बाद में मम्मी ने मुझे पास में लेकर समझाया कि "भजिए बनाने के लिए कढई में पानी नहीं, तेल डाला जाता है! और सिर्फ देखने भर से कोई भी चीज बनानी नही आ सकती। कोई भी चीज बनाने के लिए हमें क्या-क्या सामग्री चाहिए, बनाने की विधि क्या है? ये सब पता होना चाहिए। सबसे ज़रुरी बात, जब तक हम स्वयं कोई चीज बना कर नहीं देख लेते, तब तक मुझे वह चीज बनाना आती है ऐसा नहीं कहना चाहिए!!!"
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: संस्मरण- जब मैंने भजिए बनाए...
संस्मरण- जब मैंने भजिए बनाए...
मैंने ऐसे ही अपनी सहेलियों से कहा ''आज मैं तुम्हें असली के भजिए बनाकर दिखाती हूं।'' सहेलियां आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगी और पूछने लगी, ''तुम्हें आता है भजिए बनाना?''
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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