नारी मुक्ति ...!!

Nari Mukti,



नारी मुक्ति ...!!
नारी किससे मुक्त होना चाहती है? पुरुषों से? याने पिता से, पति से, बेटे से, या समाज से? वास्तव में मुक्ति मांगने की चीज ही नहीं है, यह अनुभव करने की चीज है। बंधने वाली सीताओं के लिए लक्ष्मण रेखाएं खींची जाती रहेगी। ''हवा'' को किसने बांधा है? वैसे भी देखा जाय तो हवा में उड़ने वाला पक्षी भी गगन में अपने दो पंखों की गुलामी स्वीकारता ही है। पक्षी जैसे पंखों की गुलामी को स्वीकारते हुए ही, पंखों की ही सहायता से उड़ान भरता है, ठीक उसी तरह नारी को भी पुरुषों की गुलामी मंजूर है बशर्ते कि यह गुलामी उसे अपनी उड़ान भरने में सहायता करे! लेकिन हुआ ये कि पुरुषों ने नारी को उड़ने के लिए आसमान तो दिया, पर पंखों पर डोर सी बांध दी। जब मन किया डोर खिंच दी। 

नारी मुक्ति का मतलब है,
    नारी बेटी, पत्नी, बहू और माँ के साथ-साथ वो जो चाहें, वो बन सकती है!
नारी मुक्ति का मतलब है,
   नारी को बेटी, पत्नी, बहू और माँ के अलावा, एक इंसान भी समझा जाए!
नारी मुक्ति का मतलब है,
  नारी ने सिंदूर लगाया की नहीं, चूड़ियां पहनी की नहीं इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। न ही समाज को और न ही जीवन साथी के जीवन काल पर! 
नारी मुक्ति का मतलब है,
 महीनों के उन दिनों में भी नारी वही है, जो बाकी दिनों में रहती है, इससे  भगवान को कोई फर्क नहीं पड़ता!
नारी मुक्ति का मतलब है,
 अंधविश्वासों, कुरीतियों, दहेज़ प्रथा, सती प्रथा आदि का विरोध करना! 
नारी मुक्ति का मतलब है,
 एक जागरूक सचेत नागरिक बन कर स्वाभिमान से जीना!
नारी मुक्ति का असली मतलब है,
 पुरुषों ने पुरुष होने में जितना विकास किया; नारी, नारी होने में उतना विकास करे!!!

नारी मुक्ति का गलत मतलब 
नारी मुक्ति का मतलब स्वतन्त्र घुमना, उन्मुक्त फैशन नहीं है। कुछ नारियों ने नारी मुक्ति का सिर्फ, यही मतलब लगाया कि ठीक पुरुषों जैसी हो जाय! पुरुषों जैसे कपड़े पहने, सिगरेट पिएं, बाल कटवाएं आदि। नारी जितना अपने-आप को पुरुषों जैसा बनाती जा रही है, उतना ही उसका अपना व्यक्तित्व खो रहा है। असल में नारी कितनी भी पुरुषों जैसी हो जाएं, उसकी कार्बन कॉपी से ज्यादा नहीं हो सकती! जैसे एक चमेली का फूल कितनी भी कोशिश कर ले, वो गुलाब जैसी खुशबू नहीं दे सकता और एक गुलाब कितनी भी कोशिश कर ले, चमेली जैसी खुशबू नहीं दे सकता!  

क्या अपने कभी सोचा है कि हिन्दुओं के सभी अवतार, जैनियों के सभी तीर्थकर, किसी को भी दाढ़ी-मूंछ क्यों नहीं है? क्योंकि पुरुषों को ऐसा लगा कि स्त्री सुन्दर है, तो स्त्री जैसी दाढ़ी-मूंछ न रखने पर पुरुष भी सुन्दर दिखेगा। यहां पर पुरुषों ने नारी की तरह सुन्दर दिखने की कोशिश की। लेकिन फिर भी वो स्त्री जितना सुन्दर न दिख सका! यही बात हमें समझनी होगी की नारी, नारी है और पुरुष, पुरुष है।  नारी और पुरुष दो अलग-अलग व्यक्तित्व है।   
स्त्री मुक्ति का रास्ता 
आज की नारी यह बात समझ रही है कि वह खूबसूरत चमकीले कपड़ों और प्रसाधनों से ज्यादा, अपनी बुद्धि और मेधा की चमक से ज्यादा आकर्षक दिखती है। आज हाथों में किताब लिए स्त्री अपनी अनूठी रोशनी बिखेर रही है। वह आत्मविश्वास और आत्मगौरव से दीप्त है। यह सबसे खूबसूरत नारी है, इतनी की जितनी पहले कभी नहीं थी! पति की ऊपरी आमदनी से खुश न होकर उसे विनम्रता से समझाना ही आज की नारी का कर्तव्य होना चाहिए। स्त्री मुक्ति का रास्ता ज्ञान, शिक्षा और आर्थिक आजादी की राह से ही होकर गुजरता है। नारी फैसले लेने की कला सीखें। जरुरत है तो एक दृढ़ इच्छा शक्ति की, जो ''कमजोर महिला ग्रंथि'' से मुक्त हो!
keywords: women liberation, women

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: नारी मुक्ति ...!!
नारी मुक्ति ...!!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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