यादगार पल - टी.व्ही. और सिनेमा देखने का परिणाम

टी. व्ही. और सिनेमा देखने का बच्चों पर क्या परिणाम होता है , यह बतलाता भयानक और मजेदार संस्मरण.

                               
यादगार पल - टी.व्ही. और सिनेमा देखने का परिणाम

यह घटना तब की है, जब मेरा बेटा सुदीप, चौथी कक्षा में पढ़ता था। एक दिन दोपहर को वो स्कूल से घर आया। उस वक्त मैं घर में अकेली थी। मैंने जैसे ही उसके लिए दरवाज़ा खोला, तो उसे देख कर एकदम से दंग रह गई। वो इस तरह चल रहा था जैसे उसके पैरों में जान ही न हो! बिलकुल लूला-पुंजा! मैं सोच में पड़ गई। सुबह स्कूल गया तो बिलकुल अच्छा था, अब अचानक क्या हो गया? मैं उसको सहारा देने के लिए दौड़ कर उसके पास गई। उसको पकड़कर अंदर लाकर सोफे पर बैठाया। पानी लाने के लिए मुड़ ने लगी तो उसने मुझे कस कर पकड़ लिया और रोने लगा। 
"सुदीप बेटा, क्या हुआ? तू रो क्यों रहा है?"
कोई जबाब नहीं। 
"ऐ सुदीप, बोल न क्या हुआ? कुछ दुख रहा है क्या? बता न बेटा..."
कोई जबाब नहीं। 

सुदीप की परीक्षाएं चालू थी। लेकिन उसका पेपर अच्छा नहीं गया होगा, इसलिए वो रो रहा होगा ऐसा तो मैं सोच ही नहीं सकती थी। क्योंकि, एक तो आज गणित का पेपर था और उसका गणित बहुत अच्छा है। दूसरे यदि पेपर ख़राब गया, तो भी वो रोने वाला नहीं। यदि पांच-दस मार्क्स का उसने नहीं भी छुड़ाया, तो भी खुद ही कहेगा कि मैंने पढ़ाई इतनी ही की थी! तो उसमें दुःखी होने की क्या बात है? ऐसे में, मेरे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर बात क्या है, जो आज वो इतना रो रहा है?

मैं उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी, पप्पी आदि दी ताकि वो कुछ सामान्य हो। लेकिन वो तो सिर्फ रोए जा रहा था। वो तो भगवान का शुक्र है कि मेरी सासु जी उस वक्त घर में नहीं थी। नहीं तो सुदीप को इस हालत में देख कर उन्हें ज्यादा घबराहट होती, और मुझे सुदीप के साथ-साथ सासु जी को भी संभालना पड़ता।

"ऐ बेटा, बोल न क्या हुआ? तू बताएगा नहीं तो मैं इलाज क्या करुँगी? चक्कर वग़ैरह कुछ आ रहे है क्या? डॉक्टर के पास चलना है क्या?"
उसका तो सिर्फ रोना शुरू ...!

इस तरह लगभग आधा घंटा हो गया। आप सोच भी नहीं सकते है कि उस वक्त मैंने अपने-आप को कैसे संभाला होगा! क्योंकि यदि हमें कुछ हो जाए, तो हम अपने-आप को किसी तरह संभाल लेंगे, लेकिन बच्चों को थोड़ा सा भी कुछ हो तो...? अपने-आप पर काबू पाना मुश्किल होता है। बड़ी मुश्किल से वो बोला,
"मम्मी, ये स्कूल बैग मेरा ही है न?"
"हां बेटा, लेकिन तू ये क्यों पूछ रहा है?"
वो और जोर से रोने लगा।
"मम्मी, मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा है!"
"क्या मतलब?"
"मतलब, मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा है! मम्मी, मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा है!" और रोना...
"क्यों बेटा?"
"पेपर खत्म होने के बाद मैं वो गोल घूमने वाले झूले पर घूम रहा था। अचानक झूले की स्पीड बहुत बढ़ गई। मेरा बॅलन्स बिगड़ गया और मैं झूले पर से गीर गया। बाज़ू में ही एक पेड़ था। मेरा सर उस पेड़ से जोर से टकरा गया। मुझे सब कुछ गोल-गोल घूमता सा लगने लगा! आंखों के आगे अंधेरा सा दिखने लगा। कुछ देर तो मैं वैसे ही रहा। वहां पर और भी बच्चों के बैग रखे थे। मुझे याद नहीं आ रहा था कि मेरा बैग कौन सा है। मैंने एक बैग उठाया।  फिर मुझे पता नहीं कि मैं घर तक कैसे आया।" 

मैंने उसका सर बारीकी से देखा कि कहीं खून आदि निकला है क्या, सूजन आदि है क्या? लेकिन ऐसा कुछ न पाकर दिल को थोड़ी तसल्ली हुई। मैंने थोड़ा सा अपनी तर्क शक्ति का उपयोग किया। वो मुझे मम्मी कह कर संबोधित कर रहा है, वो बराबर खुद के ही घर में आ रहा है इसका मतलब उसकी याददास्त को कुछ नहीं हुआ है। शायद जोर से गिरने की वजह से चक्कर आदि आए होंगे। मैंने उसे खाना खिलाया। धीरे-धीरे उसे बस सहलाती रही। थोड़ी देर बाद उसे नींद लग गई। 

वो सो कर उठा तो बिलकुल सामान्य था। 
"सुदीप, अब बता बेटा कि तुझे ऐसा क्यों लगा की तेरी याददास्त चली गई है?"
"मम्मी, हम टी.व्ही. में, पिक्चर में देखते है न कि सर में चोट लगने पर इंसान की याददास्त चली जाती है! तो जब मेरे सर में जोर से चोट लगी, तब मुझे ऐसा लगा कि मेरी भी याददास्त चली गई है!! और यह सोच कर ही मैं बहुत घबरा गया। इस तरह ..."

 तो ये था टी. व्ही. और सिनेमा देखने का बच्चों पर होने वाला परिणाम। मेरे बेटे का कभी न भूल सकने वाला एक यादगार पल। आज भी जब हम सिनेमा आदि में, याददास्त भूलने का दृश्य देखते है, तो वो भयानक और मजेदार पल याद कर खूब हंसते है।   

 “I am sharing my #MemoriesOfMotherhood with Bio Oil and BlogAdda.   
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: यादगार पल - टी.व्ही. और सिनेमा देखने का परिणाम
यादगार पल - टी.व्ही. और सिनेमा देखने का परिणाम
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