कहानी - बधाई

जिस महिला को जन्म से लेकर आज तक महिला होने की ही सजा मिली हो उसके लिए कैसी बधाई? लेकिन यह बात मैं अपने पति से नहीं कह सकती थी। क्योंकि उनके मुताबिक मुझे किस बात की कमी है?

"शिल्पा, बधाई हो, बहुत-बहुत बधाई!           
"बधाई, किस बात की बधाई? आज न तो मेरा जन्मदिन है और न ही अपने शादी की सालगिरह। फिर आप मुझे सुबह-सुबह पांच बजे किस बात की बधाई दे रहे हो?"
"याद करो आज क्या है?"
"मुझे तो कुछ याद नहीं आ रहा है?"
"आज कौन सी तारीख है?"
"8 मार्च, तो…?"
"याद करो 8 मार्च की क्या विशेषता है?"
"अब पहेलियाँ ही बुझाते रहेंगे या बताएँगे भी कि क्या बात है?"
"आज 8 मार्च है, याने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस! तुम एक महिला हो इसलिए सुबह-सुबह मैं तुम्हें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई दे रहा हूं!"
"थैंक यु!" मैंने यंत्रवत कह दिया। पतिदेव प्रात:-विधि हेतु चले गए और मैं विचारों में खो गई। 

मेरा जन्म एक संयुक्त परिवार में हुआ था। मेरी मम्मी ने बताया था कि जब मेरा जन्म हुआ था तो घर में चारों तरफ यह कहकर मायूसी छा गई थी कि अरे...रे... लड़की हुई है। थोड़ी बड़ी हुई, स्कूल जाने का वक्त आया तो मेरा दाख़िला एक ऐसे स्कूल में किया गया जहां पर फ़ीस नाम मात्र थी! जबकि मेरे भाई का दाख़िला एक नामी और अच्छे स्कूल में किया गया। पता है क्यों? क्योंकि मैं एक लड़की थी!! और मेरा भाई एक लड़का था!! तब छोटी सी उम्र में ही मेरा बाल मन बहुत आहत हुआ था। 

मेरा बाल मन बार-बार सवाल करता था कि क्या लड़का या लड़की होना मेरे स्वयं के हाथ में था? क्या मैं जानते समझते हुए लड़की बनी थी? जब मेरे स्वयं के हाथ में कुछ था ही नहीं, तो घर के सभी लोग मेरे साथ ऐसा दुर्व्यवहार क्यों करते है? क्या लड़की होना गुनाह है? जब मेरा भाई अच्छे स्कूल में पढ़ सकता है तो मैं अच्छे स्कूल में क्यों नहीं पढ़ सकती? ऐसा बिलकुल नहीं था कि घर की आर्थिक परिस्थिति बदतर थी। बदतर थी तो घर के बुजुर्गों की यह सोच कि "लड़की को पढ़ा-लिखा कर क्या करना है? आखिर  चूल्हा ही तो फूंकेंगी!"

यह फर्क सिर्फ पढ़ाई-लिखाई तक ही सीमित नहीं था। पहनने-ओढ़ने में, खाने-पीने में हर मामले में यह फर्क साफ नजर आता था। घर में कोई भी नई चीज आने पर उसपर पहला अधिकार घर के पुरुषों का, लड़कों का होता था! बचा-खुचा ही हम लड़कियों को मिलता था। बच्चों की जिद क्या होती है, यह मुझे नहीं मालूम! बचपन की ऐसी कोई घटना मुझे याद नहीं है कि मैंने या घर की बाकि किसी भी लड़कियों ने, कोई भी बात के लिए कोई जिद की हो! या यो कहिए कि घर के बड़ों ने हमें नहीं बताया! 

इस तरह मैं तो बचपन में ही बड़ी हो गई थी! घर में सब कुछ होने के बावजूद सिर्फ और सिर्फ लड़की होने के कारण मुझे मेरी इच्छाओं का गला घोंटना पड़ता था। मैं मम्मी से भी कुछ कह नहीं पाती थी। क्योंकि मम्मी की हालत भी "कोल्हू के बैल'' जैसी ही थी! फरियाद करती तो किससे? कई बार तो दादी जी के स्वभाव (लड़कियों ने कभी-कभी खाना नहीं भी खाया तो मरेगी नहीं ऐसी सोच) के कारण भूखे पेट भी सोना पड़ता था! जिसके घर में खाने को अनाज नहीं है उस घर का बच्चा तो मन में यह समाधान कर लेगा कि घर में कुछ है ही नहीं तो खाना कहां से मिलेगा? लेकिन जहां अनाज के भंडार भरे हों वहां पर सिर्फ लड़की होने की वजह से दादी का कोप सहना पड़े, भूखे पेट सोना पड़े तो उस वक्त मेरे बाल मन पर क्या बीतती थी यह मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती। 

इसी तरह महीनों, साल गुजरते गए। दादी का मेरे प्रति गुस्सा दिन दुनी रात चौगुनी गति से बढ़ता गया। मैं हर साल अपनी कक्षा में अव्वल आती रही। इस उम्मीद के साथ कि यदि मैं पढ़ाई में अच्छी रही तो घर वाले मुझे ज़रूर पढ़ाएंगे! मैं पढ़-लिख कर कुछ बनुंगी! समाज से यह लड़के लड़की का भेदभाव दूर करुँगी! नारी को न्याय दिलाउंगी। गांव वाले घर के बड़ों से अनुरोध करते कि आपकी बेटी बहुत होशियार है, उसकी पढ़ाई मत रोकना। क्योंकि उन्हें आशंका थी कि मेरी भुआओं, बड़ी बहनों की तरह मेरी भी पढ़ाई आठवीं-दसवी तक रोक दी जाएगी। तब मेरे पिताजी उन्हें आश्वस्त करते थे कि हम इसकी पढ़ाई नहीं रोकेंगे। यह सुन कर मुझे थोड़ा सुकून प्राप्त होता था। लेकिन हाय री किस्मत! मेरे ग्रेजुएशन के मध्य ही हमारा संयुक्त परिवार विघटित हो गया। अब मेरे पापा के पास उतने पैसे न रहे। हमारे आस-पड़ोस में दहेज़ के दो-तीन ज़बरदस्त केस हो गए। बहुओं को बुरी तरह से ज़िन्दा मार दिया गया। अब मेरे पापा डर गए।

"बेटा, मैं तुझे जैसे तैसे पढ़ा तो लूँगा लेकिन तुझे ज्यादा पढ़ाने पर तेरे लिए वर भी ज्यादा पढ़ा लिखा ढूंढना पड़ेगा। और ज्यादा पढ़ा लिखा वर ज्यादा दहेज़ मांगता है। इतना दहेज़ मैं कहां से लाऊंगा?"
"पापा, मैं शादी ही नहीं करुँगी!"
"नहीं बेटा, ये समाज कुंवारी लड़की को झेल नहीं सकता। शादी तो करनी ही होगी।"
इस तरह ग्रेजुएशन के बाद शादी हो गई। ससुराल अच्छी मिली। पति बैंक मैनेजर होने पर भी पुराने रीतिरिवाजों में जकड़े हुए थे। यहां पर लड़के लड़की का भेदभाव तो नहीं था। लेकिन बहु को सिर्फ एक चलती फिरती मशीन समझा जाता था। बहु की अपनी भी कोई इच्छाएं होती है, उसके अपने भी कोई सपने हो सकते है ऐसा कोई नहीं सोचता था। घर के सभी काम वक्त पर होना चाहिए बस! एक अच्छी बहु, अच्छी पत्नी और बाद में एक अच्छी माँ बनने के चक्कर में मैं अपने आप को बिलकुल ही भूल गई। पति की छोटी से छोटी सफलता पर, बच्चों की हर कामयाबी पर मेरा मन ख़ुशी से झूम उठता है। मानों मुझे ही कामयाबी मिली हो! फिर भी मन के किसी कोने में एक टीस उठती है कि काश, मेरी अपनी भी कोई पहचान होती। मेरे पति बहुत अच्छे है। लेकिन फिर भी कभी-कभी पुरुषोचित अहंकारवश बोल ही देते है कि मैं कमा कर लाता हूं। किसी विषय पर निर्णय लेना हो तो बच्चों से कहेंगे "तुम्हारी मम्मी तो दिन भर घर में रहती है, उसे दुनियादारी क्या समझेंगी?" तब मन को बहुत चोट पहुँचती है। 

मेरे पति मुझे अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की बधाई दे रहे है। लेकिन मुझे तो बचपन से ही सिर्फ महिला होने की ही सजा भुगतनी पड रही है। मुझ में भी काबिलियत है, मैं भी कमा सकती हूं। लेकिन सिर्फ महिला होने के कारण उड़ान भरने से पहले ही मेरे पंख काट दिए गए... 

इतने में बेटे की आवाज़ आई, ''मम्मी, आज गीजर चालू नहीं किया क्या? मेरे स्कूल का वक्त हो रहा है।" मेरे पतिदेव की भी आवाज़ आई, "शिल्पा, आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में छुट्टी मानाने का इरादा है क्या? बच्चों का टिफिन तैयार नहीं करना है?"
एक साथ आई दोनों आवाज़ों से मेरी तंद्रा भंग हुई। "हां, बस अभी बनाती हूं।" इतना कह कर मैं किचन में घुस गई। सब्जी छौंकते-छौंकते यही विचार मन में आ रहे थे कि,
                   आज पति का, कल बच्चों का,
                        परसों कभी न आएगा! 
                          हर साल की तरह इस साल भी,
                            अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस यूं ही बीत जायेगा!!
वास्तव में जिस महिला को जन्म से लेकर आज तक महिला होने की ही सजा मिली हो उसके लिए कैसी बधाई? लेकिन यह बात मैं अपने पति से नहीं कह सकती थी। क्योंकि उनके मुताबिक मुझे किस बात की कमी है? रोटी, कपड़ा और मकान तीनों चीजें तो मुझे मिलती ही है!!
मूलत: प्रकाशित - नवभारत, दि. 29 फ़रवरी 2008

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