क्या इंसान भगवान बन सकता है??

क्या मनुष्य ईश्वर जैसा सर्वशक्तिमान, संसार के हर कण पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाला बन सकता है? यदि नहीं, तो हमारी ऐसी कौनसी मानसिकता है जो हम व्यक्तिविशेष को भगवान मान उसकी पूजा करने लगते है!


                   
क्या इंसान भगवान बन सकता है??

गुजरात के राजकोट में मोदी के प्रशासकों ने मोदी मंदिर बनाया है। कहा गया की भगवान की मूर्ति की तरह मोदी के मूर्ति की भी पूजा अर्चना के साथ आरती की जाएगी! किसी इंसान का मंदिर बनाने का यह पहला मामला नहीं है। इसके पहले भी अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, सोनिया गांधी (इस यादी में और भी नाम हो सकते है) आदि के मंदिर बन चुके है। सिर्फ मंदिर ही नहीं बने तो कई लोगों की तो बाकायदा चालीसा भी छप चुकी है! जैसे लालू चालीसा और जयललिता की चालीसा। 
ये सब क्या है? क्या हमारी सोचने-समझने की शक्ति ख़त्म हो गई है? एक बार एक सज्जन कहने लगे कि जैसे त्रेता युग में राम और व्दापर युग में श्रीकृष्ण विष्णुजी के अवतार थे ठीक उसी तरह कलयुग में महात्मा गांधी विष्णुजी के अवतार थे। अपनी बात सिध्द करने के लिए वे तरह-तरह के तर्क पेश करने लगे। मैं मानती हुं कि महात्मा गांधी एक महान पुरुष थे। उनके प्रयत्नों से भारत को आजादी मिलीं। उनके कार्य प्रशंसनीय थे, उनका जीवन अनुकरणीय था। किन्तु क्या महात्मा गांधी ईश्वर थे? क्या कोई भी इंसान अच्छे कर्म करने से ईश्वर बन सकता है? एक कहावत है,
          "नर करनी करे तो नर का नारायण होय"
इंसान यदि अच्छे कर्म करेगा तो अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ बन सकता है। जैसे अमिताभ ने अभिनय में, सचिन ने क्रिकेट में, लता मंगेशकर ने गाने में, मोदी ने राजनीती में श्रेष्ठता हासिल की है। इंसान यदि कोशिश करे तो ईश्वर समान बन सकता है लेकिन ईश्वर नहीं बन सकता!!
वास्तव में ईश्वर याने एक ऐसी अलौकिक शक्ति जो सृष्टि की सृजनकर्ता और संवर्धनकर्ता है। जिसमे एक बीज को वृक्ष बनाने की अंदरुनी शक्ति है। क्या धरती पर किसी भी व्यक्ति में यह शक्ति है या हो सकती है? क्या ईश्वर और मनुष्य में कोई फर्क नहीं है? क्या मनुष्य ईश्वर जैसा सर्वशक्तिमान, संसार के हर कण पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाला बन सकता है? जिस व्यक्ति को हम ईश्वर मानते है क्या सचमुच में वह व्यक्ति इतना महान है? यदि नहीं, तो हमारी ऐसी कौनसी मानसिकता है जो हम व्यक्तिविशेष को भगवान मान उसकी पूजा करने लगते है! व्यक्तिविशेष की पूजा करने से उस व्यक्ति को या हमें क्या कोई लाभ मिलता है? सिर्फ और सिर्फ उस व्यक्ति को आत्मसंतुष्टि मिलेगी कि,
                "देखो मैं तो भगवान बन गया,
                   भगवान बन कर देखों कैसा तन गया,
                       ये रूप मेरा देखों----"
यदि कोई इंसान कड़ी मेहनत कर श्रेष्ठता हासिल करता है तो इसका ये मतलब कतई नहीं है की वो भगवान है। इसका श्रेय उस इंसान की कड़ी मेहनत को, उसके भाग्य को, उसके परिवार वालों को और उस समय की परिस्थिति को जाता है। लाख टके की बात यही है की हम कामचोर हो गए है, आलसी हो गए है! हम स्वयं कुछ मेहनत नहीं करना चाहते। और जो कोई भी मेहनत कर श्रेष्ठता हासिल करता है तो हम उसे भगवान बना कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते है। अरे, वो इंसान तो भगवान है इसलिए उसने श्रेष्ठता हासिल की। हम भगवान थोड़े ही है। हम तो आम इंसान है। और एक आम इंसान श्रेष्ठता हासिल कैसे कर सकता है? अत: हमे मेहनत करने की, कोशिश करने की क्या जरुरत है? कब बदलेंगी हम भारतियों की यह सोच? कब हम इंसान और भगवान में फर्क समझेंगे? कब हम व्यक्तिपूजा को तिलांजली देकर कर्म की पूजा करेंगे? 
देखिए, ये जो हम इंसानों की मूर्ति बनाकर, उनको भगवान मानकर पूजा करते है क्या इससे हमारे दुःख-दर्द मिट जायेंगे? हमें हमारी सभी समस्याओं का समाधान मिल जाएगा? नहीं न! क्या मोदी जी की पूजा करने से उनके स्वयं के अभियान जैसे 'स्वच्छ भारत अभियान' या 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' सफल हो पाएंगे?
वास्तव में इंसान को भगवान बनाकर खुद हाथ झटकाने की हमारी जो वृति है उस पर रोक लगनी चाहिए। तभी हमें खुद मेहनत करने की प्रेरणा मिलेगी। जो भी हमारे आदर्श है हम उनके जैसा न भी बन सके तो भी उस आदर्श व्यक्ति का एकाध गुण भी हमने हमारे स्वयं के जीवन में अपनाया तो यह सही मायने में उस व्यक्ति के प्रति सम्मान व्यक्त करने का हमारा सही तरीका होगा।   
नोट - नरेंद्र मोदी जी ने अपने नाम से मंदिर बनाए जाने पर नाराजी व्यक्त की है। अब वहां पर भारत माता की मूर्ति लगेगी। 
Keywords:GOD, Man,possibility

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: क्या इंसान भगवान बन सकता है??
क्या इंसान भगवान बन सकता है??
क्या मनुष्य ईश्वर जैसा सर्वशक्तिमान, संसार के हर कण पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाला बन सकता है? यदि नहीं, तो हमारी ऐसी कौनसी मानसिकता है जो हम व्यक्तिविशेष को भगवान मान उसकी पूजा करने लगते है!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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