लोग क्या कहेंगे---?

लोग क्या कहेंगे...? यह सोच-सोच कर कै बार हम स्वयं का ही बहुत नुकसान कर बैठते है! और बाद में पछताते रहते है!

लोग क्या कहेंगे---?

मेरी प्रिय सहेली अमिता के बेटे की शादी होने वाली थी। उसने मुझे चिकनी-कोथली का सामान ( बहू के लिए दिए जाने वाले गहने, कपड़े, मेकअप का सामान आदि) देखने बुलाया था। बहू के लिए अमिता ने ग्यारह साड़ियां ली थी। सभी तीन-चार हजार से ज्यादा वाली।
अमिता ने पूछा, 'ज्योति, साड़ियां कैसी लगी?'
मैंने कहा, 'साड़ियां तो सभी बहुत ही अच्छी है। सभी का कलर, डिज़ाइन भी बहुत सुन्दर है। तेरी पसंद की तो दाद देनी पड़ेगी! लेकिन?...' 
'लेकिन क्या?' 'अरे कुछ नहीं, बस ऐसे ही …' 'अरे बता न.. . '
'देख अमिता, तेरी बहु के लिए तू कैसी साड़िया ले यह तेरा निजी मामला है। चूँकि हम दोनों आपस में सभी बातें शेयर करती है इसलिए मेरे मन की बात बता रही हूं। यह सभी साड़ियां वर्क वाली और नॉन-वॉशेबल है। डेली में तो ये साड़िया नहीं पहन सकते न? एक-दो साड़िया तो भी वॉशेबल ले लेती! बहू इंजिनीअर है, पुणे में जॉब करेगी। अत: एक-दो सलवार सूट ले लेती!' 
अमिता एकदम नाराज़ हो गई। 'तु भी कमाल करती है। हम मॉडर्न ज़रूर है लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि हम बहू को सुरवात से ही खुली छूट दे दे! अरे हमने अभी सूट दे दिए तो वो आते से ही बड़े-बुजुर्गों के सामने भी सूट में ही घूमेगी। क्या सबके सामने अच्छा लगेगा? ना बाबा ना! रही बात वॉशेबल साड़ियों की, तो लोग क्या कहेंगे कि कैसी सस्ती साड़ियां भेजी है? आख़िरकार हमारा भी कुछ रुतबा है!!'
बहू क्या पहने और क्या न पहने ये अपने-अपने घर का निजी मामला है। सब की अपनी-अपनी सोच है। लेकिन यदि बहू इंजीनियर है, पूना में बेटा-बहू ही रहेंगे। उनके पास कोई बड़ा-बुजुर्ग नहीं रहेगा ऐसे में यह बात तो पक्की है की बहू वहां पर साड़ी नहीं पहनेंगी। ऐसे में मुझे लगता है कि यदि हम बहू को प्यार से समझाते 'पूना में तो तुम ऑफ़िस में सलवार सूट ही पहन कर जाओगी। वहां पर तुम दोनों ही होंगे इसलिए तुम्हारे सूट पहनने पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन यहाँ पर सबके सामने तुम्हें साड़ी ही पहननी पड़ेगी!' तो मुझे ऐसा लगता है की नए जमाने की पढ़ी-लिखी बहू हमारी भावनाओं का मान ज़रूर रखती। रहा सवाल वर्क वाली साड़ियों का तो शादी के बाद पांच-सात दिन ही यह साड़िया घर में पहनी जाएगी और बाद में सिर्फ कही बाहर जाने पर! बाहर में भी ज्यादा से ज्यादा साल भर या उससे भी ज्यादा दो साल तक! क्योंकि साड़ियों का फैशन गिरगिट के रंग से भी ज्यादा तेजी से बदलता है। बाद में यह साड़ियां न घर की रहेगी न घाट की और बिना वजह वार्डरोब की जगह घेरेगी सो अलग! महंगी होने से न तो काम वाली बाई को देते बनेंगी और न ही आउट ऑफ़ फैशन होने से खुद पहनते बनेगी। वॉशेबल साड़ियां कम से कम बहु यहाँ आने पर पहन तो लेगी। और वॉशेबल साड़ियों का फैशन भी जल्दी नहीं बदलता। 

…और शादी के बाद 
शादी के आठ-दस दिनों बाद ही जब बहू के गला और कान सुने दिखे तो अमिता ने बहू को टोका, 'क्या बात है? तुम्हारा गला सुना क्यों है? तुम्हारे कान के कहा गए? लोग क्या कहेंगे? नई-नई शादी हुई है और बहू के गला-कान सुने? जबकी मायके और ससुराल दोनों ही तरफ से तुम्हें ढेर सारे गहने चढाए गए है।'
बहु थोड़ी मायूस होकर बोली, 'सॉरी मम्मी जी, सभी कान के या तो सेट पर के है या वजनदार है। इतने वजनदार कान के पहन-पहन कर मेरे कानों में दर्द होने लगा है। मंगल सूत्र भी बड़ा और वजनदार है। गले में भी एकदम कैसा…! शादी के पहले मैं गले में कुछ भी नहीं पहनती थी। कान में बिलकुल हल्के और छोटे कान के पहनती थी। अभी सब मेहमान चले गए है अत: सोचा आज थोड़ा सा फ़्रि…!'
अब मेरी सहेली को एहसास हुआ कि लोग क्या कहेंगे के चक्कर में उसने और बहू के मायके वालों ने भी सभी वजनदार गहने चढ़ाए गए थे। अब इतने गहने होने के बावजूद ये समस्या है कि क्या पहने?
मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि आखिर हम कब व्यवहारिक होंगे? लोग क्या कहेंगे? लोग क्या कहेंगे? यही सोच-सोच कर हम अपना स्वयं का ही कब तक नुकसान करते रहेंगे? आखिर कब तक?
नोट-  दि. 10-12-2014 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित 
keywords:People's saying, wedding saree, ornaments

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