कहानी - पहले बताना तो था ... !

मेहमानों के अपने आने की सुचना पहले न देने के कारण और पुरुषों को यदि बाहर खाना खाना है तब ऐसी स्थिति में पहले न बताने के कारण क्या-क्या समस्या आती है..

कहानी - पहले बताना तो था ... !

"शिल्पा, मैं आज खाना नहीं खाऊंगा! मैंने बाहर दोस्तों के साथ खाना खा लिया है।" प्रमोद ने घर में घुसते से ही कहा। सुनकर मेरा चेहरा एकदम उतर गया। मैं अपने-आप को रोक नहीं पाई और एकदम से बोल पड़ी। 
"आपको पहले बताना तो था की आप खाना बाहर खाएंगे।" 
प्रमोद ने भी गुस्से में ही कहा "जब समय पर ही प्रोग्राम तय हुआ तो मैं तुम को पहले कैसे बता सकता था?"
"जब प्रोग्राम तय हुआ कम से कम तब ही बता देते!" 
"अरे यार, दोस्तों के साथ था। दोस्तों के सामने तुम को सूचित करता तो सब मेरा मज़ाक उड़ाते कि बीबी से इतना डरता है क्या? एक वक्त बीबी को बिना सूचित किए बाहर खाना खा लिया तो कौन सा पहाड़ टूट गया?"  
"आपको दोस्त मज़ाक उड़ायेंगे इस बात का ख्याल है लेकिन मैं यहां पर आपके इंतजार में भूखी-प्यासी बैठी हूं उसका ख्याल नहीं है?"
"मैंने तुम को कितनी बार तो कह दिया है कि तुम अपने समय से खाना खा लिया करो। मेरा इंतजार करने की कोई जरूरत नही है। घर के बाहर के क्षेत्र में कब, कौन से काम में कितनी देर लगेंगी बता नही सकते! तुम को क्या, तुम तो घर में ही रहती हो! कभी बैंकों की, सरकारी दफ्तरों की लाइनों में लग के देखो तब पता चलेगा!"
प्रमोद तो बड़बड़ाकर अंदर चले गए। लेकिन मैं अपने आँसू रोक नही पाई। मैंने आज प्रमोद के पसंद की पालक पनीर की सब्जी बनाई थी। पालक पनीर बनाने में कितना समय लगता है! उसमें भी पालक पनीर दो जगह बनानी पड़ी क्योंकि मम्मी जी प्याज-लहसुन नहीं खाते। अत: मम्मी जी के लिए बिना प्याज-लहसुन वाली और इनके लिए प्याज-लहसुन वाली सब्जी बनाई। मुझे कढ़ी में हरी मिर्च का छौकन पसंद है। प्रमोद को हरी मिर्च बिलकुल भी पसंद नहीं। खास इनकी पसंद का ख्याल रखते हुए मैंने कढ़ी में हरी मिर्च का छौकन नहीं लगाया। यदि ये मुझे पहले बता देते कि आज ये खाना बाहर खाएंगे तो मैं पालक पनीर क्यों बनाती? वो भी प्याज-लहसून वाली क्यों बनाती? कढ़ी में मेरी पसंद का हरी मिर्च का छौकन भी लगाती। ये बाते सुनने में छोटी-छोटी ज़रूर लगती है। लेकिन गहराई से सोचों तो कितनी बड़ी है! हम औरतें अपने पति की, अपने परिवार की पसंद का ख्याल रहते हुए, खुद की पसंद हरदम नज़रअंदाज़ करती रहती है। खुद की इच्छाओं का गला घोंट-घोंट कर सबकी पसंद का ख्याल रखती है। लेकिन प्रमोद को तो यही लगता है न कि क्या हुआ एक वक्त बिना बताएं बाहर खा लिया तो! ऊपर से तुर्रा यह कि, "कितना खाता हुं मैं? दो रोटी ही न! बचेगी तो कामवाली को दे देना। मैंने कभी गुस्सा किया कि तुम कामवाली को खाना क्यों दे रही हो? या किराना में इतना खर्च क्यों हो रहा है? फिर तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी रहती हो?" 
अब छोटे बच्चे को तो हम समझा लेंगे। लेकिन पति देव को कौन समझाए? बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? क्या सवाल सिर्फ दो रोटी बचने का है? मेरी भावनाओं का कोई मोल नही? अच्छा, ऐसा एकाध बार हो तो भी ठीक है लेकिन जब ऐसा बार-बार हो तो... ! वैसे प्रमोद का स्वभाव बहुत अच्छा है। मेरा बहुत ख्याल भी रखते है। लेकिन ये बात उनकी समझ क्यों नही आती कि औरते जब खाना बनाती है, सबकी पसंद नापसंद का ख्याल रखकर जिस प्यार भरी भावना से ओतप्रोत होकर वे यह कार्य करती है, वो अनमोल है। बड़े से बड़े पांच सितारा होटल में भी खाना खाओगे तो खाने में वो मिठास नहीं होंगी जो घर में माँ, पत्नी या बहन के हाथों से बने खाने में होंगी! क्योंकि होटल में खाना बनाने वाले के मन में प्यार की भावना नही होंगी!  

कुछ दिन पहले की बात है। मैंने पूरा खाना बना कर डायनिंग पर सजाया। बस थाली परोसने ही वाली थी कि दरवाज़े की घंटी बजी। दरवाज़ा खोल कर देखती हूं तो मेरी भूवासास, फूफाजी, उनके बेटा-बहू और उनकी पोती पुरे परिवार के साथ आएं हुए। मैंने ख़ुशी से दरवाज़े से ही इन्हें आवाज़ देकर कहा कि "ओ जी साहब, देखिए तो कौन आया है?" ये लोग 4-5 साल बाद हमारे यहां आएं थे। सभी का स्वभाव भी बहुत ही अच्छा था। अत: ख़ुशी होना स्वाभाविक ही था। मेहमानों को आदर सहित बैठक में बैठा कर जैसे ही मैं पानी लाने के लिए किचन की तरफ मुड़ी तो दिमाग में बिजली चमकी! खाना…? खाना तो पूरा बन गया था। अब इन लोगों के लिए अलग से पूरा खाना बनाना पड़ेगा! असल में उस दिन सुबह से ही मेरी तबियत कुछ ठीक नही लग रही थी। सोचा था खाना खाकर थोड़ी देर आराम करुँगी। लेकिन अब फिर से खाना बनाना याने पहाड़ खोदने जैसा कठिन काम लग रहा था। मन में आया कि पांच लोगों के पास कुल मिला कर सात मोबाइल थे। यदि वे अपने आने की सूचना पहले दे देते तो मैं पहले ही पूरा खाना एक साथ बना लेती। खाना तैयार रहता तो उन लोगों को भी खाने के लिए इंतजार नही करना पड़ता। मैं कुछ ज्यादा डिशेस बना पाती। मैं उन लोगों को ज्यादा वक्त दे पाती! लेकिन उन लोगों के मुताबिक, वे हमें सरप्राइज़ देना चाहते थे। उन्हें पहले से सुचना देने पर जो ढेर सारे व्यंजनों का तामझाम किया जाता है वो नापसंद है। लेकिन मेहमानों की पहले न बताने की सोच के कारण मुझे कितनी असुविधा हुई इससे किसी को भी कोई लेना देना नही था। 

यही बात जब अकेले में मैंने इनसे कही तो ये नाराज़ हो गए। "तुम तो बस एक बात को लेकर बैठती हो तो छोड़ती ही नही। बस पहले बताना तो था। अरे, ये लोग इतने सालों बाद आएं है लेकिन तुम खुश क्यों होगी? तुम्हारे रिश्तेदार थोड़े ही है? तुम्हें तो खाना बनाना ही जान पर आता है न! तुम भी मुझे पहले बता देती तो मैं मेरे रिश्तेदारों के लिए होटल से खाना मंगवा लेता!"

जब मैंने अपने मायके को, मायके वालों को छोड़ कर इन्हें और इनके परिवार को अपनाया तो क्या इनके रिश्तेदार मेरे रिश्तेदार नही हुए? शादी के बीस साल बाद भी ये मुझे अभी भी पराई समझते है यह सोच कर मेरी आंखों में आसूं  आ गए तो ये और गुस्सा हो गए। 
"अब इसमें रोने की क्या बात है? कुछ भी बोलों तो आँसू तो जैसे तैयार ही बैठे रहते है बाहर निकलने के लिए!"
अब आप ही बताइए, यदि मेरा हमसफ़र ही मुझे अपना नही समझेगा तो मैं और किसी से क्या अपेक्षा कर सकती हूँ?

बात सिर्फ खाना बनाने की ही नही है। एकल परिवारों के चलते कभी घर में उतनी सब्जी, दूध आदि का प्रबंध नहीं रहता। न ही घर में बच्चें रहते है। क्योंकि बच्चे स्कूल या ट्यूशन गए हुए रहते है। ऐसे में बाजार से सामान लाने वाला भी कोई नहीं रहता। ये सब बातें मैं प्रमोद को कैसे समझाऊं? उन्हें तो लगता है कि औरतें तो 24 घंटे घर में रहती है। उन्हें क्या काम है? सिर्फ खाना ही तो बनाना पड़ता है! इसलिए जब चाहे तब खाने से मना कर दो या जब चाहे तब, चाहे जितने लोगों का खाना बनवा लो!!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: कहानी - पहले बताना तो था ... !
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