कहानी- … तो लॉटरी खुल जाएगी!

जब तक इस घर की कोई लड़की मरेगी नहीं तब तक लॉटरी कैसे खुलेगी? लॉटरी खुलने के लिए कम से कम एक लड़की का मरना जरूरी है।'


(यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है, सिर्फ पात्र का नाम बदल दिया गया है। मूलत: प्रकाशित- नवभारत, दी. 29-7-2001)
बच्चों को स्कूल एवं पति को दफ्तर भेजकर, सुबह के सभी कार्यो से निवृत होकर शिल्पा पेपर पढने बैठी। फ़िलहाल वह घर में बिलकुल अकेली थी। ऐसे में पेपर शांति से पढ़ा जा सकता है। आम गृहिणी सुबह के कामों से निवृत हुए बिना पेपर कहां पढ़ सकती है? मुख्य व्दार बंद कर वह फुर्सत से पढने बैठी। पढ़ते-पढ़ते अचानक शिल्पा की नजर लॉटरी के निकाल पर जम सी गई। वैसे तो लॉटरी का निकाल रोज ही पेपर में आता है लेकिन आज शायद फुर्सत की वजह से वह बचपन की यादों में खो गई। सभी घटनाएं चलचित्र की भांति उसकी आंखों के सामने आने लगी। 

शिल्पा का जन्म एक संयुक्त परिवार में हुआ था। परिवार में 20-30 सदस्य थे। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या ज्यादा और घर की आर्थिक स्थिति ठीक-ठीक थी। पिताजी-चाचाजी सब मिलकर आठ-दस धंदे करते थे। उनमे से एक लॉटरी का भी था। तब शिल्पा दस-बारह बरस की रही होगी। पिताजी सुबह जल्दी उठकर काम पर चले जाते। देर रात तक ही लौटते। तब तक शिल्पा सो जाती। बाप-बेटी के बीच संभाषण कम ही हो पाता। पिताजी पैसा कमाने के लिए जी-तोड़ मेहनत करते। उनके सर पर ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की धुन सवार थी। उसकी मम्मी हर सिरीज़ की एक-एक लॉटरी निकालकर भगवान के सामने रखती और प्रार्थना करती की  'हे भगवान, एक लॉटरी खुल जाए ताकि घर में खुशियां लौट आयें।' शिल्पा अपनी नन्हीं-नन्हीं आंखों से यह नज़ारा देखती रहती। उसका बाल मन भी लॉटरी के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता। 

उसका घर हवेलीनुमा था। घर के बीच में चौक, चौक के आजु-बाज़ू में पोर्च और पोर्च पर चौक की तरफ से रेलिंग लगी थी। रेलिंग बहुत पुरानी होने से थोड़ा सा धक्का लगने पर भी जोर से हिल जाती, मानों अभी टूट कर निचे गिर जाएगी। सभी बच्चों को रेलिंग के पास न खेलने की सख्त हिदायत दी गई थी। फिर भी बच्चें अनजाने में, खेलते-खेलते अक्सर रेलिंग से टकरा ही जाते। जब लड़कियों में से कोई भी लड़की रेलिंग से टकराती तो चौक में जो भी बड़ा व्यक्ति खड़ा होता वह कहता 'एखादी लड़की निचे आ जाओं, लॉटरी खुल जाएगी---।' यह वाक्य सुन-सुनकर शिल्पा के मन में यह बात घर कर बैठी कि जब भी कोई लड़की ऊपर से गिरकर मर जाती है, तो उस घर में लॉटरी खुलती है। छोटे से बाल मन को क्या पता था कि आज यदि कोई लड़की मर गई तो कल को दहेज़ की बचत होगी! उसे क्या मालूम कि आज यदि कोई लड़की ऊपर से गिरकर मर भी गई तो भी कोई लॉटरी नहीं खुलेगी! हां, भविष्य में लगने वाले दहेज़ की बचत होगी। शिल्पा हर वक्त सोचती रहती कि 'मम्मी हर वक्त भगवान से लॉटरी खुलाने के लिए प्रार्थना करती रहती है लेकिन जब तक इस घर की कोई लड़की मरेगी नहीं तब तक लॉटरी कैसे खुलेगी? लॉटरी खुलने के लिए कम से कम एक लड़की का मरना जरूरी है।'

महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, शिवाजी महाराज आदि सभी महापुरुषों की क़िस्से-कहानियां पढने में उसे बहुत मजा आता था। इन्हीं महापुरुषों से प्रेरणा लेकर वह भी अपने देश के लिए, समाज के लिए, परिवार के लिए कुछ करना चाहती थी। उसके मन में बार-बार विचार आते 'यदि मैं ऊपर से गिर कर मर गई तो मेरे घर में लॉटरी खुल जाएगी! मम्मी-पापा की सब परेशानियां दूर हो जाएगी। भाई-बहन, भूआजी-चाचाजी सभी को और अच्छा खाने-पहनने को मिलेगा। यदि सिर्फ मेरे अकेली के मरने से इतने सारे लोगों को फायदा हो सकता है तो मुझे मरना क्यों नही चाहिए?' दूसरे ही पल शिल्पा को अपनी स्वयं की जान प्यारी लगने लगती।  फिर सोचती, 'सब महापुरुषों ने दूसरों की भलाई के लिए कितने ज़ुल्म सहे, कितना बलिदान किया। क्या मैं अपने ही परिवार के लिए अपनी जान नही दे सकती?' छोटा सा बाल मन तर्क-वितर्क करता रहता। 
और एक दिन सुबह पक्का फैसला कर शिल्पा उठी। पूरा परिवार सो रहा था। सूरज भगवान ने अभी अपने दर्शन नहीं कराये थे। चारों ओर अंधेरे का ही साम्राज्य था। शिल्पा चुपके से उठी। हिम्मत से, आत्मविश्वास से, बलिदान की भावना से ओत प्रोत हो धीरे-धीरे पोर्च की सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगी। पहली सीढ़ी पर पैर रखते ही छाती धक-धक करने लगी। लेकिन उस वक्त मन में यही भावना प्रबल थी कि मैं अपने परिवार के कुछ काम आ रही हूं। हिम्मत कर एक-एक सीढ़ी चढ़कर किसी तरह पोर्च पर गई। ऊपर से चोर निगाहों से चारों और देखा कि कही कोई देख तो नहीं रहा है। धीरे-धीरे रेलिंग के बिल्कुल पास पहुंच गई। ऊपर से निचे की ओर देखा और... सांस तेज-तेज चलने लगी, घबराहट के मारे पूरा बदन पसीने से तर हो गया, हाथ-पैर कपकंपाने लगे फिर भी मन पक्का कर रेलिंग की तरफ़ थोड़ी झुकी लेकिन एक पल सिर्फ एक पल... हिम्मत ने जबाब दे दिया। बलिदान की भावना से जिंदगी की चाह बलवती हो गई। वह झट से चार क़दम पीछे हट गई। जिंदगी का मोह था जो मरने नही दे रहा था, लॉटरी का लालच था जो जीने नही दे रहा था। दस-पंद्रह मिनट तक उसी स्थिति में बैठी रही और फिर आत्मग्लानि से फुट-फुटकर रोने लगी। शिल्पा हर गई थी। बड़ी-बड़ी बातें सोचने वाली, बोलने वाली शिल्पा हार गई थी। किसी तरह अपने आप को संभाल कर, स्वयं ही स्वयं के आँसू पोंछकर फिर से बिस्तर में आकर रज़ाई ओढ़ सो गई।
इतने में दरवाज़े की घंटी से शिल्पा की तंद्रा भंग हुई। दरवाज़ा खोलने जाते-जाते वह सोचने लगी, 'लोग कहते है कि कायर लोग ही आत्महत्या करते है। लेकिन क्या खुद की हत्या करने के लिए साहस नहीं जुटाना पड़ता है? यदि उस दिन सचमुच में ऊपर से गिर कर वह मर जाती तो क्या उसके मम्मी की लॉटरी खुल जाती? घर में ख़ुशियों की बरसात होती?' 

keywords: Story, Lottery, Dowry    

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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: कहानी- … तो लॉटरी खुल जाएगी!
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