रुपये-पैसों का मान-सम्मान !!

हम रुपयों-पैसों को, जो उनका मान है वो नहीं देते। सर्वेक्षण बताते है कि दुनिया में सबसे ज्यादा कीटाणु यदि किसी चीज पर है तो वह है रुपयों पर, नोटों पर!


रुपये-पैसों का मान-सम्मान !!
शीर्षक पढ़कर चौंक गए न! भई, सब रुपयों की ही तो माया है। न बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया! सदियों से भाई-भाई, दोस्त-दोस्त, पति-पत्नी सबके बीच के झगड़े की जड़ है रुपैया। रुपैया है तो सब कुछ है। अदालतों में ज्यादातर केसेस रुपयों की वजह से ही चल रहे है। ज्यादातर खून-खराबा रुपयों की वजह से ही होता है। इस सबके बावजूद भी मुझे लगता है कि हमारी नजर में रुपयों-पैसों का कोई मान-सम्मान नहीं है। क्या कहा, आप मेरी बात से सहमत नहीं है? जरा रुकिए, पूरा लेख पढने के बाद आप भी सोचने जरूर लगेंगे। और शायद मेरी बात से सहमत भी होंगे! 
                               
घटना - १) मैं एक सगाई के कार्यक्रम में गई थी। वहांपर लड़कीवालों की तरफ से लड़केवालों को जो नेग के रुपये दिए जाते है उन नोटों की गुड़िया बनी हुई थी। गुड़िया हजार, पांच सौ, सौ, पचास रुपयों के नए-नए करारे नोटों से बनी हुई थी। नोटों की गुड़िया बहुत ही सुंदर लग रही थी। हर कोई बनाने वाली की तारीफ कर रहा था। मुझे भी गुड़िया बहुत अच्छी लगी। लेकिन साथ ही में दू:ख भी हुआ। दू:ख हुआ नोटों की दुर्दशा देखकर! नोटों को कई तरह से फोल्ड करकर गुड़िया बनाई गई थी। जैसे नोटों का कोई मान-सम्मान ही न हो! आप ही बताइये, यदि हम रुपयों-पैसों को मान देते तो क्या हम उन्हें इतनी बुरी तरह से फोल्ड करते? जीस भी चीज को हम मान देते है उसको हम बड़े हिफाजत से सहेजकर रखते है। वैसे यदि हममें क्राफ्ट की कला है, तो उसके लिए बाजार में एक से एक विभिन्न तरह के कागज उपलब्ध है। हमने तो रुपयों-पैसों को रंगबिरंगी कागज के टुकड़ों के बराबर ही लाकर खड़ा कर दिया!   

घटना - २ ) एक बार मैं एक चाट के ठेले के बाजु में खड़ी होकर चाट खा रही थी। एक सज्जन को चाटवाले को रूपयें देने थे। चाटवाला दूसरे ग्राहकों में व्यस्त था। उन सज्जन ने रूपयें ठेले में जो बड़ा सा तवा रखा था उसपर रख दिए। यद्यपि तवे के निचे स्टोव बंद था। लेकिन तवे पर तेल की बहुत चिकनाहट थी। क्या वो चिकनाहट रुपयों पर नहीं लगी होगी? बाजु में ही अच्छी सुखी जगह भी थी। लेकिन उन सज्जन ने यह सोचा ही नहीं कि रूपयें गंदे होंगे! यह बात सिर्फ उन अकेले सज्जन की ही नहीं है। हममें से ज्यादातर लोग यह सोचते ही नहीं है कि रूपयें-पैसों का भी कोई मान है! रूपया हमारी राष्ट्रीय मुद्रा है, हमें हमारी राष्ट्रीय मुद्रा का अच्छे तरीके से उपयोग करना चाहिए।   

घटना - ३) एक परिचित है, वे घर से बाहर जाते वक्त दो-चार करारे नोट जरूर साथ में रखते है। पता है क्यों, दांत कोरने के लिए! ( करारे नोट को कोन के आकर में फोल्ड करकर ) उनके मुताबिक, 'कही दांत कोरनी मिले या न मिले।' आप कहेंगे कि रूपयें उनके है अत: उन रुपयों का चाहे जैसा वापर करने की उनको आजादी है। ठीक भी है। लेकिन यहांपर रुपयों का मूल्य एक दांत-कोरनी के बराबर हो गया है। सबसे बड़ी बात, दांत कोरने के बाद वे उन रुपयों को फेकेंगे तो नहीं! वो ही नोट आगे कितने लोगों के हाथों में जाएगा---! सोच के ही कैसा लगता है की किसी ने नोट से दांत को कोरा और वो ही नोट---! यदि उनके मन में रुपयों के लिए मान-सम्मान होता तो क्या वे ऐसा करते? जैसे वे याद रखकर दांत कोरने के लिए करारे नोट रखते है, वैसे ही याद रखकर दांत कोरनी भी रख सकते थे!    

इन्ही सब घटनाओं से मुझे लगता है कि हम रुपयों-पैसों को, जो उनका मान है वो नहीं देते। मैं जानती हुं कि घर-गृहस्थी में, रोजी-रोटी कमाने में व्यस्त इंसान को इतनी फुरसत नहीं है कि वह राष्ट्रीय मुद्रा के मान-सम्मान के बारे में सोचें! लेकिन हम हमारे सेहत के प्रति तो सचेत है न? सर्वेक्षण बताते है कि दुनिया में सबसे ज्यादा कीटाणु यदि किसी चीज पर है तो वह है रुपयों पर, नोटों पर! एक नोट अपनी जिंदगी में अनगिनत लोगों के हाथों से इधर-उधर सफर करता रहता है। इस बीच किसी के हाथ गीले रहते है तो किसीके धूल-मिटटी से भरे हुए! फटे से फटे और गंदे से गंदे नोट को भी हाथ लगाने के बाद हममेँसे किसी के भी मन में यह विचार नहीं आता कि हमें शुद्धता हेतु हाथ धोने चाहिए! जो लोग शुद्धता हेतु सिर्फ मिनरल वॉटर पीते है उन्हें भी नहीं!



क्या ख्याल है आपका? आप मेरी बात से सहमत हो यह जरुरी नहीं है। सबका अपना-अपना नजरिया होता है। मैंने सिर्फ मेरा पक्ष रखा है। मैं इस सम्बन्ध में सभी तरह के विचारों का स्वागत करने के लिए उत्सुक हुं।आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।                                                                       
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल: रुपये-पैसों का मान-सम्मान !!
रुपये-पैसों का मान-सम्मान !!
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आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल
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